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Showing posts from 2026

सब कुछ सबको नहीं मिलता

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लाख कोशिश करो तुम, फिर भी कुछ तो अधूरा रह ही जाएगा, सब कुछ करने की चाह में, कुछ तो पीछे छूट ही जाएगा। जो मिला है उसका लुफ्त उठाओ, वही तुम्हे खुशियां दे जायेगा, सब कुछ की चाह में एक दिन, सब कुछ ही मिट जाएगा।। एक फूल खिला था उपवन में, सुंदर था सबसे वो वन में, गुरूर था उसको खुशबू पर, भंवरे की उसपर चाहत में। एक रोज वो फिर मुरझा गया, भंवरा उड़कर दूर चला, कब सूखे फूलों पर भौंरे टिकते हैं, उपवन देख अब मुस्कुरा रहा।। सावन की बदली छा जाती है, चहूं ओर बसंत ले आती है, देख मौसम की रंगत को, चिड़िया भी निशदिन चहकती है। सावन भी एक दिन खत्म हुआ, पतझड़ को जैसे उसने न्योता दिया, समय की अदला बदली को, फिर सावन ने भी प्रणाम किया। मानव का भी बस ऐसा जीवन है, कुछ पा लेता है कुछ खो जाता है, लेकिन खोने पाने में क्या, वह संघर्ष कहीं करना छोड़ देता है। हर वक्त वह लड़ता है हालात से, फिर जीत का सेहरा सिर होता है, ज्यादा की तो चाह हमेशा रहती है, लेकिन थोड़ा भी कुछ कम नहीं होता है।। कह भी जाओ और अगर कर भी जाओ, भुलाये तुम फिर भी जाओगे, लाख बना लो महल मकान, राख में ही आखिर फिर मिट जाओगे। तेरा मेरा कर लो कितना, बालक परि...

इष्टदेव महिमा

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 ।।देवभूमि वंदना: हमारे इष्ट-देव।। देवभूमि की श्रृंखलाओं से,  गूँजे इष्टदेवों का जयकारा, धन्य हुई पावन यह धरती, धन्य हुआ यह जग सारा। डांडा नागराज विराज रहे यहां, सेम नागराज की माया, फन फैलाए रक्षा करते, करते सब पर शीतल छाया।। नरसिंह देवता जोशीमठ में, खम्ब फाड़ कर प्रकटे हैं, भैरव बाबा लाठ लिए, भक्तों की रक्षा करते हैं। गाँव-गाँव के भूम्याल तुम, क्षेत्रपाल रखवाले हो, संकट से हमें उबारने वाले, तुम भक्तवत्सल बड़े निराले हो। ज्वालपा माँ की ज्योति निर्मल, मां चंद्रबदनी कल्याण करे, राजराजेश्वरी माँ जगदम्बे, भक्तों के सब भंडार भरे। सिद्धबली हनुमान विराजे, खोह नदी के पावन तट, दीवा की ऊँची चोटी से, माँ काट रही सब माया-जंजाल। कंडोलिया ठाकुर कृपा बरसाएं, वन-पर्वत के राजा हैं, क्यूंकालेश्वर महादेव के दर पर, बजते शंख और बाजा हैं। तकड़ेश्वर की महिमा न्यारी, बिन्सर महादेव निराले, थलीसैंण से चौखुटिया तक, शिव ही सबको पालने वाले। अगणित रूप तुम्हारे ईष्ट, अगणित तुम्हारी शक्ति है, देवभूमि के कण-कण में, बसी तुम्हारी भक्ति है। हे पहाड़ी देवी-देवताओं, अपना आशीर्वाद बनाए रखना, इस पावन धरती की गरिमा,...

मोहब्बत की राह आसान नहीं..!

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मोहब्बत अगर कर ही ली है, फिर हर अंजाम को सहना पड़ेगा, मिल गया साथ तो फिर क्या, मगर तैयार मात को भी रहना पड़ेगा। हर युग में विरह की कहानी है, उसको भी अवश्य ही पढ़ना होगा, प्रेम अगर कृष्ण से करोगे, विष मीरा सा एक रोज पीना पड़ेगा। समय हर बार नया मोड लेगा, पास होकर भी प्रेमी से दूर रहोगे, कर के हर बात मन के उसकी, इल्जाम बेवफाई का भी सहोगे। मोहब्बत नाम है त्याग का, त्यागकर ही वो तुम्हे अपनाएगा, अगर मिल गई खोट जरा सी भी, इश्क फिर तार तार हो जाएगा।। तनहाई में वो कबूल कर ही लेंगे, तुम्हें भीड़ में साथ ढूंढना होगा, थाम जो लोगे एक बार हाथ उसका, फिर ताउम्र निभाना पड़ेगा। ये तो दरिया है आग का pari, डूबकर ही पार करना होगा, और आ गई घड़ी आखिरी अगर, हँस के उसको भी गले लगाना पड़ेगा।। मोहब्बत मुकम्मल होगी जरूरी नहीं, दायरा अपना पहचानना होगा, सब्र से काम लेना मेरे यार तुम, आशुओं को तनहाई में बहाना पड़ेगा। ज़ख्म अनेक मिलेंगे इस राह में, दर्द को दवा समझ पीना ही होगा, और ज़ख्मों की नुमाइश न करना, ये दर्द तुझे सिर्फ अकेले ही सहना पड़ेगा।। चोट दिल पर खाई है तो असर कलम में भी दिखेगा, ज़ख्म शरीर के भर जाएंगे ले...

गर्मी की आपबीती

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अगर गर्मी का जो मौसम भी अपने दिल की बात किसी को कह पता, तो बिना कहे वह भी रह नहीं पाता। सबको झुलसा रही है गर्मी, अब मैं तो खुद भी झुलसा हूं जाता। तप रहा हूं रात दिन, चैन न कहीं अब स्वयं हूं पाता, तुम तो लगा लेते हो AC, कूलर, मेरी भला जहान में कौन सोचता।। पेड़ तुम काटो, सीमेंट तुम बिछाओ, इसमें मेरा भला क्या योगदान था, तुम झेलते अपने कर्मों का फल, देना मेरा क्यों फिर बलिदान था। कुछ मिनिट की गर्मी सहकर, तुम बिलों में अपने चले जाते हो, इसी तपती चुभती गर्मी में, मुझे अकेला छोड़ जाते हो। न कोई मेरा अब जोर चलेगा, मै यूहीं दिन दिन तपता रहूंगा, तुम अगर अभी ना सुधरे, रोज फिर तिल तिल मै मरूंगा। इसी गति से अगर जंगल, पेड़ कटेंगे, फिर सिर्फ सीमेंट के जंगल दिखेंगे, आज भला तुम खुश हो जाओ, भविष्य पीढ़ियां तुम्हे ताने देंगे। Pari ✍️ 

प्रकृति की है यही पुकार, पेड़ बचाओ अबकी बार

गर्मी का है प्रकोप अटल, सारी दुनिया पर है इसका कहर, क्या दिन क्या रात भला, त्रस्त है दुनिया चारों पहर। दिन में बाहर निकले अगर, तंदूर सा तुम जल भुन जाते हो, रात को भी तो गर्मी से, तुम चैन से कहाँ सो पाते हो।। तापमान का तो क्या कहना, 40 छोड़ो 50 पार होने को है, पसीना ऐसे बह रहा बदन से, जैसे सैलाब कोई आने को है। रह रहकर चलती है लू दिन में, फिर आता है तूफानों का कहर, बारिश की उम्मीद में मानव, छाता लिए करता है मेहर।। एक था जमाना वो भी जब, मई जून से डर लगता था, क्यूंकि आसमा सिर्फ इन्हीं दो महीनों में अधिक तपता था। आज क्या मार्च क्या जुलाई है, जैसे धूप ने पंचायत बुलाई है, अब तो दिन दिन पारा चढ़ता है, और आदमी गर्मी से मरता है।। हे ईश्वर तुमसे है अब अर्जी, सुन तो लो बाकी जैसी आपकी मर्जी, थोड़ा तो एहसान करो हम पर, सुन लो मानव की तुम अर्जी। समय समय पर बारिश कर के, कर दो सब पर तुम एक एहसान, बदल मौसम कर दो सुहाना, ताकि बची रही हम सबकी मासूम सी जान।। बात अगर समझी जाय, तो इसमें है बस हमारी भागीदारी, पेड़ काट घर बनाए हमने, कर तापमान बढ़ाने की तैयारी। फिर बची हुई कसर और निभाई, अपनी सहूलियत को तकनीक बना...

उसकी फिर वापसी इस दिल में

आज फिर जैसे वही लम्हे फिर लौट आए, सालों बाद जब उसी आंगन में वो फिर शर्माए। लगा जैसे आम का पेड़ फिर फल देने लग गया, और वो पुराना पीपल फिर से हरा भरा हो गया। कुछ तो बदला नहीं, ऐसा क्या हुआ आज की शाम में? कुछ खास नहीं बस वो वापिस आ गई अपने गांव में। उसकी वो चहकती मुस्कान, उसकी वो बातें निराली, उसके लौट आने जैसे, सभी खेतों में आ गई हरियाली।। वो सूना पनघट अब फिर से आबाद हो जायेगा वो पुराना गांव का रास्ता फिर से रौनक पाएगा। उसके आने से जैसे बाजार फिर सजने लग गया है, उसकी एक झलक के बाद मेरा दिल खिल गया है। आंखे उसकी जैसे सागर, जुल्फों में समाए जैसे काले बादल, हर बार वो अलग सा दिखती है, खनके जब जब पांव की पायल, होठों की मुस्कान तो ऐसे, बागों में खिलते लाखों फूल हो जैसे। अब तुम ही बताओ ऐसी अदाओं से बचकर दूर जाएं तो कैसे।। वो बातें उसकी मीठी मीठी, आज भी मिसरी खोल रही हैं, वो आखिरी मुलाकात की कसक, फिर आज बोल रही है। वो फिर न मिलने की कसम आज वो खुद तोड़ गई है, जाते जाते फिर मिलने की नई एक आस छोड़ गईं है।। Pari ✍️ 

प्रेम की है दोनों परिभाषा

प्रेम की है परिभाषा जैसे, प्रेम स्वरूप है उसक समर्पण, जीवन कर नाम पति के, तन मन कर देती है अर्पण। सारे दुःख सुख साथ निभाए, स्वयं हो जैसे कोई दर्पण, भूल सभी ख्वाबों सपनो को, जीवन उसका संपूर्ण समर्पण।। हाथ थामती अजनबी होकर, पल में जीवन के करती निर्णय, पिता की साख ऊंची रखती, रखती न मन कोई भी संशय। जिम्मेदारी का बोझ उठाए, कोमलता में करती वह परिणय, सहनशीलता, समझदारी का संगम, व्यवहार में रखती प्रतिपल विनय। नया घर होगा, नव परिवार होगा, मन में आता कोई न भय, हर एक वार है सहती हंसकर, लेकिन पाती कभी न शय। सबको लेकर साथ चलना है, शुरू से वह कर लेती तय, फिर तो पल पल आगे बढ़ती, नहीं बिगड़ती अब कोई लय। न कोई ख्वाइश न कोई सपना, कह देती है सबको हंसकर, लेकिन मन में हैं उसके कुछ, जानता है सिर्फ एक उसका वर। हर कोशिश में उसकी खुशियां, उसके लिए ही तो है चारों पहर, कोई दुख न आए उसको, पति के मन में रहता है ये डर।। रात अकेली कट जाती है, दिन में दोनों की चलती तकरार, झूठमूठ के इन झगड़ों में, रखा है संजो जन्मों का प्यार। एक दूजे के लिए है जीते, माने एक दूजे को ही संसार, हृदय पटल पर एक है दोनों, जैसे सिंधु और लहर।।...

सहज जीवन का सत्य अटल

मुश्किल थोड़ा होता है, दूर कहीं घर से रहना, विपरीत परिस्थितियों मे दुःख पड़ता है सहना। चारों पहर तुम स्वयं निर्णय करते हो रोजाना, अंत में सोचते हो क्या ही मैने खो और है पा लेना।। रात गुजरती है करवट बदले, नींद नहीं आंखों में होती, दिन के चारों पहर तो बस, दौड़ भाग ही हिस्से आती। न खाने का कोई समय है, न पीने का ही समय है मिलता, 12 महीने सातों दिन, बस चरखा है वो चलता।। घर छोड़कर निकले थे, सपने लाखों आंखों में बसाये, जी तोड़ की थी मेहनत हमने, करने पूरा जो सपने थे सजाये। साल बीत गए अनेकों लेकिन, सपने सारे अधूरे रह गए, रेत से बनाए थे घर जैसे, बारिश आयी और सारे बह गए।। गाँव छोड़कर शहर गए, सुकून नहीं फिर भी पाया, जो था गौरव गाँव में, शहर पहुंच उसे भी गवाया। बड़ी देर से समझ मिली, वक्त गवाकर फिर अक्ल बढ़ी। सालों के संघर्ष के बाद भी, ज़िन्दगी जस के तस थी पड़ी।। अब सपने बेचकर हक़ीक़त खरीद रहा, झूठे झांसों से बाहर निकल रहा, देखे थे जो सपने जीवन में, सपनो से उन अब बाहर निकल रहा। अब तो बस नियति अपना रहा हूं, जो चाहे वह उसे हकीकत जान रहा हूं। अब तो समय के बहाव में बह जाना है, सहज मान जीवन स्वीकारना है।...

पंछी पिंजरे सा उड़ जाऊंगा

प्रेम है उससे मेरा निश्छल, नहीं कोई उसमें स्वार्थ भरा, हर सांस है मेरी उसके नाम, कुछ भी नहीं अपने पास धरा। मेरी परीक्षा वो कभी भी करे, मै हरदम ही रहता तत्पर हूं, प्रेम में उसके मै डूबा प्रतिपल, उसी के लिए जैसे अब जीता हूं।। हर रोज उसकी याद है आती, नम आंखे अपनी छिपाता हूं, जान न सके कोई राज ये मेरा, आंखों में चश्मा लगाता हूं। मेरे प्रेम की वो परिभाषा, जीवन के मेरे है इक अभिलाषा, मैं बस उसको देखता हूं, वो पढ़ती है मेरे नयनों की भाषा।। अनेकों बार समझा चुका हूं, लेकिन वो कहां राजी होती है, मैं हूं उसके प्रेम में डूबा, वो बस इसे पागलपन बताती है। मेरी है नादानी या कुछ और, हर पल याद उसकी सताती है, मैं हूं तनहा आज भी यारो, वो बस ख्वाबों ख्यालों में आती है।। मेरे प्रेम को आजमा रही, मुझसे खेला वो करने है लगी, सब कुछ है न्यौछावर उसपर, सबको ढोंग वो बताने लगी। प्रेम है मेरा उससे अविरल, तन की भूख वो समझने लगी, दूर जाने पर सोचेगी वो, आज भले नासमझी है करने लगी।। यादों का पिटारा दे जाऊंगा, झोली में सितारे भर जाऊंगा। प्रेम करूंगा निश्छल अविरल, काया छूने का प्रयास नहीं करूंगा। प्रेम परीक्षा है अगर बिछड़न...

बिन तेरे अब कोई आस नहीं है "वैराग्य"

थोड़ा समय अवश्य लगता है, लेकिन फिल्म समझ में आ जाती है, हर बार नायक सही नहीं होता, कभी कभी कहानी बदलनी पड़ती है। सावन तो यूहीं बदनाम होता है, मौसम तो प्रेमिकाएं बदलती हैं, रंग बिरंगे धर के रूप, नायकों को ये निशदिन ही छलती हैं। बादल तो बरस कर चल देते हैं, बस रह जाती है बारिश तनहा, जैसे पतझड़ के आने पर, पेड़ सहे पत्तो का बिछड़ना। हर एक पत्ता टूट जाता है, खाली बच जाती है ठूंठ, तेरी विरह में मै भी लुट गया, खंडर पीछे गया बस छूट। आखिर कब तक विरह सहें, यादों के सहारे हम जियें, कौन सी देहली अब तन रगड़ें, कौन सी सजा अब हम सहें। आखिर कब तक तप करना होगा, कितने साल अभी जपना होगा। अब तो आ जा टीस मिटा जा, कब तनहा बिन तेरा रहना होगा।। ख्वाब भी सारे बिखर गए, अब तो बस एक आस बाकी है, दुनिया सारी पीछे छूटी, तेरे मिलन की बस प्यास बाकी है। अब तो बंधन तोड़ के आ जा, सारे झरोखे मोड के आ जा, तेरे लिए ही ये सांस बाकी है, तेरे मिलन को ये जान बाकी है।। अधिक लिखने का हाल नहीं है, प्रेम के अलावा कोई जाल नहीं है, कलम की स्याही बिखर गई है, कलम में अब वो ताकत नहीं है। मुझको अंतिम दर्शन दे जा, बिन तेरे जीना कोई आस नहीं...

तेरी यादों की बारात रुक गई

कुछ सुकूँ तो दिल को जरूर मिल गया है, तेरी मुस्कान का दीदार जो हो गया है। वर्षों से प्यासी थी जो आँखे एक झलक को, जैसे आज कोई अमृत रस पान हो गया है।। क्या कहूँ तुझे कैसा ये इंतज़ार था मेरा, बिन तेरे जैसे हर तरफ बस था अँधेरा। हर आस भी अब दम तोड़ने को थी जैसे, आने से तेरे एक जीवन प्राण मिला इसे। अगर होती कोई तपस्या तेरे मिलन को, हंस कर वर्षों किया करते हम भी तेरे लिए। दुवाओं के सिवा कोई विकल्प न था पास यारा, बस ताउम्र बस एक वही तो करते रहे। साथ जो छूट गया एक बार, फिर कहां मुलाकात होती है, दूर जाने के बाद तो बस, अपनी भी जैसे परायी होती है। आखिरी मुलाकात से लेकर आखिरी झुकी निगाहें तेरी। फिर सारे गम मेरे हो गए और खुशियां तमाम हो गई तेरी।। चल अब वादा कर की भूल जाएंगे हम एक दूजे को, अगर हुई मुलाकात तो समझेंगे अजनबी हम दोनों को। सारी यादों मुलाकातों को बस सीने में छुपाकर रखेंगे, सिले होंठों के साथ ही दुनियां को अलविदा हम कहेंगे।। Pari ✍️ 

जीवन आम आदमी का✍️

ज़िम्मेदारी के बोझ तले आम आदमी इतना दब जाता है, की हजार तकलीफ क्यों न हो डॉक्टर के पास नहीं जाता है। हो अनेकों कष्ट फिर भी, हसकर टाल जाता है, कोई बीमारी न निकल आये सोच अस्पताल नहीं जाता है। अक्सर ही वो दवाई केमिस्ट से ले कर चुपचाप खाता है, कुछ नहीं कुछ नहीं कहकर सारे दर्द यूहीं वो छुपाता है। पैसे खर्च न हो जाएं कहीं, टेस्ट की पर्ची छुपा लेता है, सब ठीक है डॉक्टर है बोला, सबको जाकर फिर कहता है। ना कोई उसकी फिक्र है करता, ना कोई रखता उसका ध्यान, अक्सर ही तो सिर्फ जरुरत पर ही, होता है उसका सम्मान। बारिश हो या फिर धूप कभी, दिन हो या फिर रात घनी, बेहिचक ही निकल पड़ता है, वो चाहे हो कोई आगजनी। आम आदमी का जीवन, जैसे कोई हलाहल पीना है, जीवन के संघर्ष अनेकों संग, घुटघुट कर ही तो जीना है। Pari ✍️ 

Pari की कल्पना "परिकल्पना"

मैं लिखू जो कुछ तो तुम उसे सिर्फ तारीफ न समझना, दिल की बात होठों से कहो, यूँ बस आहें न भरना। थोड़ी देर से भले लेकिन मुलाकात तो होगी ही जनाब, पूरा न हो ऐसा दुनिया में, होता नहीं है कोई ख्वाब। न कोई किस्सा था न ही कोई कहानी थी, मोहब्बत तो होनी ही थी, छायी जो जवानी थी। सर्द हवाओं के मौसम संग लाये मोहब्बत की गर्माहट, लौट आये हम पास तुम्हारे, अब गले लगा लो हमें फटाफट। दिल से सोची हुयी हर मुराद कुदरत अक्सर निभाती है, सच्चे दिल से हो अगर मोहब्बत तो मुलकात भी हो ही जाती है। किया था बयाँ शब्दो में, तेरी यादों और तेरी कमी दोनो को, कुछ समझे और चुप रह गए, बाकी तारीफ में वाह वाह कर गए।। यूहीं नहीं है तनहा हम, तेरा इंतजार आज भी है, तू कहां कैसी है खबर न सही, तेरा ख्याल तो आज भी है। दिल में मलाल आज भी है, तेरा ख्याल आज भी है, वादा था तुझसे मिलने का, वो सवाल आज भी है। भूल जाएं तुम्हे हम, या फिर अभी और इंतज़ार किया जाए, तुम ही बताओ "Pari" आगे और क्या किया जाए। Pari ✍️ 

पिता का जीवन आसान नहीं..!

भाव जागते है मन में, लेकिन शब्द सटीक नही मिल पाते है, सब को साथ लेकर चलते है, फिर पिता को क्यों भूल जाते है। माना थोड़ा दूरी है उनसे, लेकिन सबसे अधिक विश्वास वहीं है, अनेक कष्टों को दबाकर, मुस्कान चेहरे पर लाये वही पिता है।। शब्दो मे शख्ती है उनके हरदम, क्योंकि फिक्र है सबकी पल पल, अंदर से कोमल पर कठोर दिखावा, प्यार पिता का है निश्छल। राह कठिन है चलना मुश्किल, लेकिन फिर भी धैर्य रखे जो, आये कितने आंधी तूफान, संयम बनाये रखना पिता से तुम सीखो।। चाहे कितने दोस्त बना लो, बनालो चाहे कितना दौलत शोहरत, मिले सुकुन जिस छांव में तुमको, मिलेगी बस वो पिता के घर पर। खुद से तुम एक सवाल कर लेना, पिता का जीवन तुम खुद जी लेना, कितना भार है कंधो पर, खुद उठा कर फिर तुम तुलना करना।। बहुत ही आसान जान पड़ता है, जीवन किसी पिता का जग में, चिन्ता फिक्र से हटकर जैसे, सुकून भरा हो सारा जीवन। कैसे कैसे मौसम आये फिर, कैसा तुमने वक़्त है देखा, कितने पतझड़ मौल्यार है देखे, न जाने कितनी बरसातें है देखी। खुद को डुबाकर उलझनों में, परिवार सुरक्षित हैं रखते, भरा हो गला या दिल टूट चुका हो, शिकन माथे पर न ...

माँ की गोद और असमां के तारे

सांझ हुई तो छत पर आया, आसमान को देखा आज, टिमटिम करते तारे अनेक, लगा जैसे सिर पर रखा हो ताज। कुछ पल तो बस सोचता रहा, आसमान में हैं कितने सारे, बचपन फिर याद आ गया, गांव का आंगन और ढेरों तारे।। नटखट था तब मैं भी बहुत, इठलाता चलता था घर के चारों ओर, दिन भर चलती थी शरारत अपनी, माँ बाबा न होते कभी भी बोर। तुतलाती थी बोली मेरी, शब्द कुछ सुलझे तो कुछ उलझे रहते, सुंदर है देखो कान्हा कितना अपना, बस पल पल यही तो कहते।। दिन थे वो बड़े की प्यारे, सब रहते थे गांव में हमारे, चूल्हे पर खाना बनता था, बैठकर खाते एक साथ सारे। मां खिलाती प्यार से रोटी, बाबा भी तो लाड लड़ाते, दादा दादी चाचा चाची सब ही तो मुझे रिझाते।। बचपन की वो यादें हैं, रह रहकर मुझे याद आ जाती है, जीवन के संघर्ष के बीच, मुझे बड़ा सुकून दिलाती हैं। दिन वो मेरे बचपन के, देखो कितने प्यारे थे, मां की गोद में सोता था, और आसमान में लाखों तारे थे। Pari ✍️ 

पिता की प्रीत, छुपी रहने की रीत

टीस मन की वो मन में रह गयी, बात पूरी न हो सकी अधूरी रह गयी। मैंने सोचा था अब दिन खुशहाल हो गए, लेकिन हम आज भी जस के तस रह गए। गर्भवती हुई स्त्री, सबको सहर्ष ज्ञात हो था चला, फिर क्या था हुआ शुरू बधाईयों का सिलसिला। नौ महीने सबको तब स्त्री का संघर्ष दिखा, पुरुष तो बस चहुं ओर मुस्काता दिखा। इसमें कोई संशय नहीं, कि कष्ट मां ने सहा जीवन सृजन के लिए। लेकिन पिता-पति की दशा सबसे छुपी रह गई, सबने दिलासा दिया मां को और खुशी घर आयी। पुरुष की विडंबना भी क्या है जानो अगर, जच्चा बच्चा दोनों की साथ साथ है उसे फ़िकर। पलभर को भी कोई हाथ कंधे पर न रहा, जाने कैसे वो खुद ही खुद संभलता रहा, कशमकश में दिन बीते, दिलासा पत्नी को देता रहा। कन्या जन्म से हुआ अलंकृति, तब जाकर शांत हुआ। खुशियों की जैसे बारिश हो गयी, आंखें नम थी हुई जैसे स्वर्ग की प्राप्ति आज हुयी। स्वपन जैसे आज सरोकार हो गया, एक पिता को बेटी का वरदान मिल गया। छोड़ हर काम बस प्रेम बिटिया का था, उसकी परवरिश को लेकर कभी थकता न था। सारी खुशियां न्योछावर थी आंखों का सुकून था, बेटी की ही खुशी में अब तो संसार था। हुई वो सयानी तो विवाह की सोच होने लगी, ख...

खेल खरा है पैसे का, बाकी सब बकवास

सबको खुश रखकर आप खुद खुश नहीं रह सकते, जैसे खाली गिलास से आप, किसी की प्यास नहीं बुझा सकते। ये मृत्युलोक है यहां आप हर किसी को सही नहीं साबित कर सकते, आप स्वयं खुश रहो, तभी सभी को खुश हो रख सकते ।। पेट में रोटी और आंखों में नींद, तब आप ज्ञान दे सकते हो, खाली पेट तो आप बस एक उसे भरने के जुगाड में रहते हो। दुनिया के अनेक मसलों के सामने, आप इसे नजरंदाज कर सकते हो, लेकिन यकीन मानिए आप इसे कभी भुला नही सकते हो। यहां हर कोई किसी न किसी को समझा रहा, लेकिन ऐसा क्यूं है, जबकि हर कोई तो खुद को, सबसे बड़ा समझदार भी बता  रहा है। तुम नहीं जानते से लेकर, तुम्हे मैं बताता हूं कि बात चल रही है, लेकिन असल में यहां सबकी, किसी न किसी तरह बैंड बज रही है।। अब कहे pari सबको, दिल खोलकर मन की बात, पैसे का है ये ज़माना, कमाते रहो हर कोई इसे दिन रात। बिन इसके तुम्हारी इस जहां में, नहीं होगी कहीं कोई पूछताछ, मक्खन की तो बात छोड़ दो, कोई न देगा पीने खाली छाछ।। Pari ✍️

देवभूमि उत्तराखंड, मेरी जन्मभूमि

मन मेरा है चंचल जैसे, पल पल भटके यहां वहां, ढूंढ रहा हो जैसे हरपल, कोई अपने लिये नया जहाँ। सुकून शान्ति की राह चले, नहीं है कोई एक ठिकाना, नही यह रहता एक जगह, निकले हर दिन ढूंढ नया बहाना। देवभूमी का वासी हूँ मै, जन्म कर्म है देवभूमी, समर्पित जीवन करना है, चाहे कहीं और हो कर्मभूमि। स्वर्ग से सुंदर जगह है, धन्य स्वयं को मै पाता हूं, जब जब कहता दुनिया को, मै देवभूमि का वासी हूं। कण कण में बसते हैं ईश्वर, कदम कदम पर मंदिर मंदिर, हरदम रहती छाया प्रभु की, शीतल मन काया भी सुन्दर। मन आतुर रहता है सबका, दर्शन तीर्थ देवभूमी पल पल हो, जीवन का है सार यहीं सब, प्रभु चरणों में अपना भी बसेरा हो।। सारा जगत भले घूम आओ, लेकिन देवभूमि बिन सब अधूरा है, केदारनाथ बद्रीनाथ देख लिया, समझो सफल जीवन तुम्हारा है। शब्दों में नहीं लिख सकते, ऐसी महिमा धारी देवी चारों धाम की है, स्वयं त्रिदेव विराजे जहां निशदिन, वही देवभूमि हमारी है। आवाहन करता हूं हर पल, आओ घूमो मेरी जन्मभूमि पर, लेकिन रखना स्वच्छ इसे, लगे न कोई दाग आपके आगमन पर। सारा जग है परिवार हमारा, यही मंशा हम सबके मन में है, देवभूमि है सबकी प्यार...

दोस्त, जो चश्मा लगाती है...!

हल्का हल्का मुस्काती है, जब वो मुझसे बतियाती है, कहते कहते रुक जाती है, जाने फिर क्या सोचती है। बातें उसकी खतम न होती, बस जाने क्या वो कहना चाहती है, अरे हां एक बात बताना भूल गया, दोस्त मेरी चश्मा लगाती है। गाल हैं गुलाबी और आंखें शराबी, जुल्फों को खुला ही रखती है, कहते कहते भूल है जाती, फिर थोड़ा सा तब वो इठलाती है। थोड़ी सी वो नटखट है और मन को मेरे बहुत ही भाती है, हां वही मेरी दोस्त, प्यारी सी ....जो चश्मा लगाती है। चलते चलते रुक जाती है, फिर जाने क्यूं पीछे मुड़ जाती है, पसंद है उसको चटपट खाना, किस्से फिर वो सभी सुनाती है। सुबह से लेकर शाम की वो, बड़े ही चाव से मुझको बताती है, हां वो मेरी दोस्त, सही समझे आप...जो चश्मा लगाती है मन की है स्वाणी वो, प्रेम उसका निश्छल, आली जाली नहीं लगाती है, पूर्ण है समर्पण, प्रेम उसका पवित्र, पूर्णता से पहचानी जाती है। पल पल देखूं उसे, निहारूं चारों पहर, आंखों में समा मेरे जाती है, प्रेम की है परिभाषा मेरी वो दोस्त, जो आंखों में चश्मा लगाती है।। Pari✍️ 

अब न कोई ख्वाब सजाएंगे

ख्वाब सजाए थे मैंने भी, लेकिन हर एक चकनाचूर हुआ, जिस जिस को दिल में बसाया, हर एक मुझसे दूर हुआ। खुशियों की थाल सजाकर, कोशिश की थी परोसने की, ठोकर मार मुझे दूर कर दिया, कोशिश रही मुझे गिराने की।। हर एक बंधन टूट गया, वह मेरा मुझसे रूठ गया, लाख कोशिशों के बाद भी, जन्मों का रिश्ता टूट गया। पल पल कोशिश थी जिसके संग, सपनों की दुनिया बसाने की, राहों में काटें बिछा, फिर कोशिश की उसने मुझे मिटाने की। मेरा अपना गुरूर भी टूट गया, जब सबसे अजीज छूट गया, क्या दिन क्या रात भी अब तो, जैसे गमों से रिश्ता जुड़ गया। मैं भला अब क्या ही करता, जब ठान ली उसने दूरी बनाने की, परत दर परत तोड़ा मुझको, थी कोशिश शायद मुझे राख बनाने की। चलो तुमने अगर कह ही दिया, हमने भी भ्रम पालना छोड़ दिया, सांसों की डोर तोड़कर, दुनिया को अलविदा बोल ही दिया। अब न रहेगी शिकायत तुम्हें, न जरूरत पड़ेगी हमसे मिलने की, जाओ अब आजाद हुए तुम, जी लेना ज़िंदगी अपनी मर्जी की। आखिर में बस एक सवाल रहेगा, जरूरत नहीं है उसे भी बुझाने की। क्या कमियां थी मुझमें ऐसी, उम्मीद नहीं थी जिन्हें मिटाने की। जाओ तुमको एक सवाल दिया है, जरूरत नहीं है जवाब बत...

परी की डायरी...मेरी तुम्हारी हमारी कहानी

 जय श्री राम🚩 आज दिन रोज की तरह ही था, सुबह उठना और अपनी दिनचर्या को पूर्ण करना यही तो होता है...लेकिन जब कोई याद करे फोन करे...वह थोड़ा और अच्छा महसूस करवाता है...आजकल विश्व में त्राहि हो रही..युद्ध में अनेक आहूति देने को उतारू हैं..लेकिन इसका लाभ किसे मिलेगा वह तो भविष्य के गर्भ में ही सुरक्षित है...पहाड़ मेरे करीब हमेशा रहा और रहेगा... जीवनपर्यंत...फिर भी मैं पहाड़ अब कम ही जा पाता हूं..  पहाड़ न जा पाने की टीस मुझे अक्सर विचलित तो करती है, लेकिन मैं संभल जाता हूँ... नाश्ता हुआ, वही रोज की तरह वॉट्सउप देखा और शुभ प्रभात....कुछ देर वीडियो देखने के बाद...ऑफिस जाने की तैयारी हो चली...ड्राइवर रोज की तरह हरकत से मजबूर...समय से पहले बुलाने लगा...मै भी सहज कुछ मिनिट पहले तो चला ही जाता हूँ... ऑफिस पहुंच मिलना सबसे....कुछ खिले तो कुछ मुरझाए चेहरे मिले.... और हां उसकी मुस्कान भी आज कायम थी...प्यारी सी...मित्रता और प्रेम ही जीवन में संगिनी को ला सकते हैं.. समाज कहता है.. अन्यथा आप पर शक किया जायेगा, दोषारोपण होगा...पर मै अक्सर मनमौजी सा रहता हूं...कोई पसंद आए तो कह देता हूं..लेकिन म...

होली आई फिर पहाड़ म

 बसंत फिर बॉडी ए ग्याई, दगड़ी म स्वाणु मौल्यार लाई, खिलनी फूल डाली मौली गैनी, धरती थै स्वाणी बणाई मौ (माघ) फर्की फाल्गुन बॉडी, पंचमी मनै अब होली आई। गितेरू का गीत अर ढोलक की‌ थाप से सारू पहाड़ गूंजी ग्याई। फ्यूली खिली बुरांश खिलनी, मेलू-पयां मौली गैनी, गैल्यो दगड़ी गैल्या सभी रंगू मा रंगमत ह्वेनी  याद करी इसकुल्या दिन, मुखड़ी मेरी भी खिली ग्याई, हाथ म गुलाल लेकी, मुखड़ी विंकी मिन पिंगली काई। हैरा बण..फूलों की खुश्बू, डांडियों मा बुरांश की भौंण, पिंगला फूल लया खिलिगे, इन मा मन उदास कन‌मा रौण। फौजी भेजी की जग्वाल अर जरा जरा की आस हम भी, ऐगे बसंत ऐगे मौल्यार, आओ मिली खेला होली सभी। खुद कैकी मन म बसीं, क्वि कनु कैकी जगवाल, पधनी बॉ भी सारा लगी, भाईजी आला घौर  भ्वाल। क्वि ख्यालु का खूयूं कैका, कैक मन रे ग्या मलाल। मेरी भी आस बस आस रै, अर हाथुम कैका नौ कु गुलाल। Pari✍️  

वो गुलाब किताब का

कल फिर शाम वही पुरानी सी आयी, भूले बिसरे जज्बात संग यादें संजो लायी। मिल गए कुछ पुराने ख्वाब कल फिर अलमारी में, कल फिर मिला एक गुलाब उसी पुरानी किताब में। सालों बाद कल वो पन्ना फिर से खोला, ऐसे लगा जैसे गुलाब में से यार मेरा फिर बोला। अरे यार कहां हो तुम, कितनी देर कर दी मुझसे मिलने में, अब तो बताओ क्यों कैद किया मुझे इस किताब में। सवाल वाजिब था लेकिन जवाब कुछ सूझा नहीं, शायद मेरे पास था लेकिन मैंने भी कुछ जवाब दिया नहीं। क्या कशमकश थी तब और क्या हालात थे कैसे बयां करता, बेइंतहा थी मोहब्बत, बयां नहीं कर पाया, कैसे मै बताता। कुछ पल की खामोशी के बाद फिर एक पंखुड़ी उड़ गई, जैसे वो फिर एक बार मेरी जिंदगी से दूर चली गई। उठाया मैने उसे फिर नाजों से.. जैसे कहना हो उसे आज, तब जाने दिया, मजबूरी थी.. लेकिन नहीं जाने दूंगा दूर तुझे आज। वो फूल जो सूख चुका था, जैसे जीवन का सावन बीत चुका था, फिर भी सहमी सी थी वो आज भी, सूखे पत्तों में यादों के सहारे, जीवन में अब फिर से वो वक्त लौटकर नहीं आ सकता था, और शायद वो भी कहीं दूर इंतजार में हो, आखिरी मुलाकात सहारे। Pari 

वो आखिरी खत तुम्हारा

वो आखिरी खत तुम्हारा, वो आखिरी पैगाम तुम्हारा, वो न मिल पाने की बेबसी, वो लिखना बेहिसाब प्रेम तुम्हारा। वो समाज की बंदिशों में बंधकर भी, फिक्रमंद रहना तुम्हारा, वो आखिर लिखावट लाल स्याही से, वो अलविदा कहना तुम्हारा। हर बात याद है तुमको, जैसे आज भी वहीं हो ठहरी तुम, मै हर बार ही नासमझ निकला, और मुझे हर पल ही समझाती तुम। वो पहली मुलाकात अजनबी वाली, वो मेरा तुम्हे देखते रह जाना, लिखा था तुमने वो लम्हा भी, वो लाखों की भीड़ में तनहा सा हो जाना। बहाने ढूंढकर था करता अब मैं, हर तरफ बस तलाश इक तुम्हारी, न नाम ही था मालूम मुझे तब, न पते की थी कोई जानकारी। वो शायराना अंदाज मेरा, हर शायरी में बस तारीफ तुम्हारी, लिखा था दूसरे ही पन्ने में, इंतज़ार था मुलाकात का तुमको भी हमारी। हुई थी ख्वाहिश मुकम्मल फिर, 12वें दिन दूसरी मुलाकात से, महसूस किया था मैने भी, मुस्कुराई थी तुम भी उस दिन दिल से। फिर न जाने कब खास हो गए हम, हम जैसे किसी अजनबी से, लिखा था तुमने ये भी, पास हो अधिक तुम मेरी दिल में धड़कन से। वो बारिश का दिन था याद है, वादा मुलाकात का था तेरा भी, तूफान भी था भारी आज, साथ फिर थी चमकती बिजली भी...

फिर वो फरवरी नहीं आई

पहली मुलाकात का वो गुलाब याद आता है, तुझे दिया वो मेरा प्रीत वाला कार्ड याद है। तुम कितनी खूबसूरत हो कहा था मैने याद है मुझे, तेरी वो खूबसूरत दबे होठों की मुस्कान याद है मुझे। वो आखिरी बेंच स्कूल का, वो तीसरी पंक्ति में तुम थी, वो पांचवीं घंटी स्कूल की, वो बेरुखी भरी निगाहें तब थी। वो 30 में से 27 मिनट देखना तुम्हें, वो गुस्साई नाक याद है, फिर तेरा थोड़ा सकुचा के देखना और वो सुकून याद है। वो पहली बार तुम्हारा मुझे देखकर मुस्कुराना, वो सहेलियों संग फिर नजरअंदाज कर चले जाना, इक पल को तो बस ऐसा लगा जैसे सब सिमट गया है फिर दूर जाकर तेरा वो पलटकर देखना आज भी याद है। एक सप्ताह बाद की वो मुलाकात थोड़ी असहज तो थी, लेकिन खूबसूरत इतनी की जैसे कब से अधूरी सी थी। पहली मुलाकात की खाली क्लास आज भी याद आती है, तेरे गाल की वो लाली और पहली बार की वो छुवन याद आती है। पहले दोस्त और फिर अनकही वो मोहब्बत खूबसूरत थी, वो स्कूल जाने की ललक और तुझसे मिलने की चहक खूबसूरत थी। न जाने फिर कब वो आखिरी और तीसरी बेंच एक हो गई, संग तेरे फिर मेरी अकाउंटस भी जैसे केमिस्ट्री हो गई। तेरे संग समय बिताने की अब तो बस वजह तला...

मेरा उससे मिलना तन्हाई में..

कुछ पल जो मैं बैठा तन्हाई में, तुम आ गई ख्यालों में, थोड़ी सी शर्माई तुम और थोड़ी सी थी तुम मुस्कायी। इक पल तो बस ऐसा लगा तुम हो पास मेरे बैठे प्रिये, फिर दूजे ही पल जैसे मुझे अपनी फिर सुध आयी। देखा मैने इधर उधर, ढूंढा तुझे फिर किधर किधर, बस एक अकेला था मै, और तन्हाई थी फैली तब। फिर आया एक ख्याल मन में, तुझको भी लेकर। सपनों में है आती जो हकीकत में मिलेगी जाने कब। तेरा वो मुस्काता चेहरा, तेरी वो शर्माती आँखें, तेरी वो बातें अलबेली, तेरी वो गुस्साई आंखे। तेरी वो बेपरवाही संग, तेरी वो जल्दी बाजी। तेरा वो बिछड़न का डर, तेरी वो भीगी आंखे।  तनहाई तो तनहाई है, कुछ भी याद दिलाती है, भूले बिसरे ज़ख्मों को, अक्सर ही ताजा कर जाती है। जितना चाहो रहना दूर, यादें तो याद आ जाती हैं, तनहाई कहने को है बस, असल में तो तुझसे मिलाती है। माना तनहाई थोड़ी खराब है, लेकिन खुद से मिलने का मौका है, भूले बिसरे लम्हों को, फिर से जीने का एक सलीका है। अगर सीख लो तुम तनहाई में, खुद ही खुद से मिलना, तो फिर उससे बेहतर नहीं लगेगा, जीवन तुमको जीना। Pari ✍️ 

Pari की कल्पना (परिकल्पना)

यूहीं तो होती नहीं होगी बरसात सावन में, किसी कहानी में इसका भी कोई किस्सा होगा। भरी आंखों से नीर बहते होंगे आसमां के शायद, टूटा जब दिल कोई उसका हिस्सा होगा.. मैं कहूं कि तुम पहली हो, तो ये झूठ हो भी सकता है, लेकिन तुम्हारे बाद अब कोई और हो नहीं सकता। तुमसे है मोहब्बत इतनी मेरी जान अगर यकीं मानो तो, तुम्हारे बाद और कोई मेरी मोहब्बत पा नहीं सकता। बताओ ताउम्र उसके एक शब्द के लिए तरसता रहा, कि कहे क्यों फिक्र करते हो तुम पूरी दुनिया की .. मैं हूं ना तुम्हारे साथ क्यों फ़िक्र तुम्हें किसी और की जब मेरा साथ और एहसास है तुम्हारे पास... हर एक बार निराली है, हर मुलाकात निराली है, जब जब मिला तुमसे, एक एक मुलाकात निराली है। बातों से तुम सहज भले, लहजा तेरा कुछ और ही है, चेहरा तेरा फूल सा कोई, निगाहों की झलक कुछ ही है। Pari✍️ 

प्रेयसी या हो तुम पत्नी या फिर दोनों.?

प्रेम की है अनुभूति अटल, प्रेम है जिसका संपूर्ण निश्छल, पत्नी है वो या प्रेयसी बताओ, बहता है जिसका प्रेम अविरल। मानव जीवन का अनूठा वो संगम, करती आहें उसकी कलकल, स्वयं तो है जैसे ठहरी वो, पर बहता है प्रेम उसका जैसे कोई जल।। प्रथम चुंबन हो उसका चाहे, या हो प्रथम उसका आलिंगन, ठहरा है मेरा तो प्रतिपल, न जाने क्यों उसपर ये मन। आभास हो उसके होठों का या उसका वो कोमल सा बदन, एहसास है मुझको आज भी लेकिन, उसका वो सादा भोलापन। आंखों की वो सकुचाहट और होठों की भीनी मुस्कान, बारिश की वो मोटी बूंदे और उसमें उसका वो सूखापन। आंखों में शर्म थी उसके और बदन में थी कोई जैसे सिकुड़न, रह गया था देखते ही उसको, आ गया था उसपर मेरा मन। प्रेम का वो आभास था पहला, पहली हो जैसे सावन की बारिश, भीनी भीनी बूंदे वो ऐसी, जैसे की हो मैने कोई ख्वाइश। क्या था वो मै समझ न पाया, प्रेम था उसका या मेरी आजमाइश, जो भी था जैसा भी था, लेकिन पूर्ण हुई मेरी एक ख्वाइश। अलग ही थी वो अनुभूति उसकी, अलग ही था वो अपनापन, अलग नशा था उसका मुझको, अलग ही था वो मेरा लड़कपन। कौन थी वो कहां से थी आई, जैसे भेजी हो कोई पारियों की रानी, एक बार तो सोच...

एक दोस्त बड़ी निराली है...!

थोड़ी नटखट थोड़ी भोली भाली सी, एक दोस्त है मेरी बड़ी निराली सी। अक्सर वो मुझसे मिलती है मन की अपने सब कहती है थोड़ा है गुस्सैल भले, लेकिन मुस्कान भी उसकी प्यारी है। एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। अभी मिला हूं उससे, बस कुछ दिन का है साथ हमारा, फिर भी ऐसे मिलती है जैसे सालों का हो कोई नाता प्यारा। व्यवहार उसका बड़ा सादा है, जैसे है वैसे दिखती है, मस्त मौला है उसका मन, खुलकर वो जीवन जीती है एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। कभी सताती, कभी बताती, कभी वो गुमसुम सी हो जाती। फिक्र है करती न जाने किसकी, लेकिन चेहरे को शांत है रखती। इधर उधर की नहीं है करती, लेकिन खबर वो सबकी है रखती, स्वाद है उसकी बातों में, करती बातें वो मतवाली है, एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। एहसास है उसको जिम्मेदारी का, रिश्तो में रखती है तालमेल, किससे कैसे रहना है, कौन है कैसा, जानती दुनिया के है सारे खेल। अंदर बाहर का समन्वय, रखती सब जग से है पूरा मेल, गोरे रंग का उसे भ्रम नहीं, स्वयं रंग में थोड़ी काली है। मेरी एक दोस्त बड़ी निराली है। Pari✍️

गलती हर बार मेरी ही

क्यूं भला मैं बदला सा दिख रहा, क्यों मेरा मिजाज बिगड़ा, सवाल था उसका फिर वही, काश उसने पूछा होता खुद से कभी। मैं दुनिया से लड़कर भी उसी का था, वो एक खुद से भी न लड़ सकी, फिर भी मैं गलत मेरी गलती, वो तो बस मासूम ही रही तब भी। मैं जितना पास जाने की कोशिश करूं, वो दूर दूर हो जाती है, मेरी चाहत को वो न जाने, क्यों खुद से ही ठुकराती है। आज मोहब्बत है उससे मेरी, वो दूरी बनाने लगी है न जाने क्यों, मैं बदल गया अगर तो, फिर सवाल होगा कि तुम ऐसे क्यों। यकीनन मर्द ही गलत होता है, ऐसा नज़रिया है जमाने भर का, लेकिन ख्वाइश तो होती है, कुछ तो अधिकार होंगे न उसके भी। बस बहाने बना वो अलग हो जाते हैं और दोष फिर वही हम पाते हैं, शायद हम भी गलत हों, क्योंकि स्वयं के अधिकार की बात करते हैं। ए मर्द तेरी कोई औकात नहीं है, तू बस पिसने को मात्र आया है, तू निभाता रह फर्ज अपने, और खो जाना फिर कहीं जहां में। तेरी चाहत बस दबी रहेगी, तू बस पिसते ही रहना चक्की में, और फिर हो जाना गुम ढूंढ कोई बिल दुनिया की मस्ती में।। Pari✍️

तुम बस एक एहसास हमारा

सोचा कि लिखें कुछ तेरे बारे में भी आज हम, फिर कलम तोड़ दी हमने और मुस्कुरा दिए। तेरे लिए जो एहसास है मेरे दिल में हमेशा से, वो बस महसूस करना है, इसलिए उसे शब्द नहीं दिए। वो मुलाकात पहली, वो बात तुमसे पहली, वो मुस्कुराना तेरा, वो झुकी नजरे तेरी पहली। वो तेरा शर्माना मुझसे, वो अदाएं तेरी सब निराली, बड़ी मासूम सी दिखती थी, वो तुम बिलकुल भोली भाली। याद है मुझे तुम्हारी वो घबराहट, डर डर के बातें करना, जानती थी तुम सब, फिर भी मुझसे दूर दूर रहना। मन तुम्हारा भी मिलने को करता था, लेकिन रोज एक नया बहाना, यूंही तुम रूठ जाती थी तब, और भी जल्दी तेरा मान जाना। वो फिर मुलाकातें बढ़ी हमारी, वो मिलन की चाहतें हमारी, तुम थी बंदिशों में तब भी, और पास आने की जिद्द वो हमारी। बस एक पैगाम तेरा फिर आता, कि क्यों तुम्हें यार समझ नहीं आता, वो चिट्ठी से समझाना तुम्हारा, और तुम पर मुझे फिर और प्यार आता।  वो आखिरी बात तुमसे, वो आखिरी मुलाकात तुमसे, वो आखिरी वादा तुमसे, वो फिर न मिलने की बात तुमसे। वो भीगी आंखे तुम्हारी, वो भारी कदमों से बिछड़ना तुमसे। वो आखिरी चुम्बन तेरे गालों का, वो आखिरी गले लगना तुमसे। सच...