प्रेयसी या हो तुम पत्नी या फिर दोनों.?
प्रेम की है अनुभूति अटल, प्रेम है जिसका संपूर्ण निश्छल,
पत्नी है वो या प्रेयसी बताओ, बहता है जिसका प्रेम अविरल।
मानव जीवन का अनूठा वो संगम, करती आहें उसकी कलकल,
स्वयं तो है जैसे ठहरी वो, पर बहता है प्रेम उसका जैसे कोई जल।।
प्रथम चुंबन हो उसका चाहे, या हो प्रथम उसका आलिंगन,
ठहरा है मेरा तो प्रतिपल, न जाने क्यों उसपर ये मन।
आभास हो उसके होठों का या उसका वो कोमल सा बदन,
एहसास है मुझको आज भी लेकिन, उसका वो सादा भोलापन।
आंखों की वो सकुचाहट और होठों की भीनी मुस्कान,
बारिश की वो मोटी बूंदे और उसमें उसका वो सूखापन।
आंखों में शर्म थी उसके और बदन में थी कोई जैसे सिकुड़न,
रह गया था देखते ही उसको, आ गया था उसपर मेरा मन।
प्रेम का वो आभास था पहला, पहली हो जैसे सावन की बारिश,
भीनी भीनी बूंदे वो ऐसी, जैसे की हो मैने कोई ख्वाइश।
क्या था वो मै समझ न पाया, प्रेम था उसका या मेरी आजमाइश,
जो भी था जैसा भी था, लेकिन पूर्ण हुई मेरी एक ख्वाइश।
अलग ही थी वो अनुभूति उसकी, अलग ही था वो अपनापन,
अलग नशा था उसका मुझको, अलग ही था वो मेरा लड़कपन।
कौन थी वो कहां से थी आई, जैसे भेजी हो कोई पारियों की रानी,
एक बार तो सोचा मैने भी, लुटा दूं उसपर अपनी संपूर्ण जवानी।
ख्याल था मेरा वो कोई, य देखा था मैने सपना कोई आज,
बिजली सी कौंधी वो मुझपर, गिरा गई फिर एक और गाज,
महक उठा था मेरा तनमन फिर से, बदला था मेरा मिजाज,
प्रेयसी थी या पत्नी मेरी, या पहना दो उसे ये दोनों ताज।
Pari✍️
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