माँ की गोद और असमां के तारे

सांझ हुई तो छत पर आया, आसमान को देखा आज,
टिमटिम करते तारे अनेक, लगा जैसे सिर पर रखा हो ताज।
कुछ पल तो बस सोचता रहा, आसमान में हैं कितने सारे,
बचपन फिर याद आ गया, गांव का आंगन और ढेरों तारे।।

नटखट था तब मैं भी बहुत, इठलाता चलता था घर के चारों ओर,
दिन भर चलती थी शरारत अपनी, माँ बाबा न होते कभी भी बोर।
तुतलाती थी बोली मेरी, शब्द कुछ सुलझे तो कुछ उलझे रहते,
सुंदर है देखो कान्हा कितना अपना, बस पल पल यही तो कहते।।

दिन थे वो बड़े की प्यारे, सब रहते थे गांव में हमारे,
चूल्हे पर खाना बनता था, बैठकर खाते एक साथ सारे।
मां खिलाती प्यार से रोटी, बाबा भी तो लाड लड़ाते,
दादा दादी चाचा चाची सब ही तो मुझे रिझाते।।

बचपन की वो यादें हैं, रह रहकर मुझे याद आ जाती है,
जीवन के संघर्ष के बीच, मुझे बड़ा सुकून दिलाती हैं।
दिन वो मेरे बचपन के, देखो कितने प्यारे थे,
मां की गोद में सोता था, और आसमान में लाखों तारे थे।
Pari ✍️ 

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