फिर वो फरवरी नहीं आई

पहली मुलाकात का वो गुलाब याद आता है,
तुझे दिया वो मेरा प्रीत वाला कार्ड याद है।
तुम कितनी खूबसूरत हो कहा था मैने याद है मुझे,
तेरी वो खूबसूरत दबे होठों की मुस्कान याद है मुझे।

वो आखिरी बेंच स्कूल का, वो तीसरी पंक्ति में तुम थी,
वो पांचवीं घंटी स्कूल की, वो बेरुखी भरी निगाहें तब थी।
वो 30 में से 27 मिनट देखना तुम्हें, वो गुस्साई नाक याद है,
फिर तेरा थोड़ा सकुचा के देखना और वो सुकून याद है।

वो पहली बार तुम्हारा मुझे देखकर मुस्कुराना,
वो सहेलियों संग फिर नजरअंदाज कर चले जाना,
इक पल को तो बस ऐसा लगा जैसे सब सिमट गया है
फिर दूर जाकर तेरा वो पलटकर देखना आज भी याद है।

एक सप्ताह बाद की वो मुलाकात थोड़ी असहज तो थी,
लेकिन खूबसूरत इतनी की जैसे कब से अधूरी सी थी।
पहली मुलाकात की खाली क्लास आज भी याद आती है,
तेरे गाल की वो लाली और पहली बार की वो छुवन याद आती है।

पहले दोस्त और फिर अनकही वो मोहब्बत खूबसूरत थी,
वो स्कूल जाने की ललक और तुझसे मिलने की चहक खूबसूरत थी।
न जाने फिर कब वो आखिरी और तीसरी बेंच एक हो गई,
संग तेरे फिर मेरी अकाउंटस भी जैसे केमिस्ट्री हो गई।

तेरे संग समय बिताने की अब तो बस वजह तलाशते थे हम,
कॉमर्स के थे विद्यार्थी लेकिन साइंस भी जैसे पढ़ने लगे हम।
फिर तो कल तक जो मैदान दूसरा घर हुआ करता था उसने लड़के का,
अब उसे भी जैसे कोई क्लास में रहने की आदत सी लग गई।

वो तेरे साथ का लंच भी याद है, तेरी नापसन्द भिंडी भी याद है,
वो दोस्तों की टोंट तेरे नाम से, वो तेरी पिंक पेंसिल भी याद है।
वो तेरा पहला हाथ छूने से लेकर तेरी आखिरी नम आंखे भी याद है।
तुझे आखिर बार देखकर दिल का वो भारी होना भी याद है।

यार न जाने कब वो दिन, महीने और फिर साल बन गए,
हम अजनबी से लेकर न जाने कब इतने खास बन गए।
वो लड़कपन का आकर्षण ही शायद निस्वार्थ प्रेम था हमारा,
फिर कभी उस एहसास को न हम महसूस कर पाए।

देख फिर फरवरी का वो महीना आ गया है,
अब मत कहना कि विराम दे दो कलम को यहीं पर।
पर हां उस एहसास को मैं शब्द नहीं दूंगा तुझसे वादा जो है,
पूर्णविराम से पहले लेकिन तुझे देखने की वो चाह आज भी है।
Pari✍️ 



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