देवभूमि उत्तराखंड, मेरी जन्मभूमि

मन मेरा है चंचल जैसे, पल पल भटके यहां वहां,
ढूंढ रहा हो जैसे हरपल, कोई अपने लिये नया जहाँ।
सुकून शान्ति की राह चले, नहीं है कोई एक ठिकाना,
नही यह रहता एक जगह, निकले हर दिन ढूंढ नया बहाना।

देवभूमी का वासी हूँ मै, जन्म कर्म है देवभूमी,
समर्पित जीवन करना है, चाहे कहीं और हो कर्मभूमि।
स्वर्ग से सुंदर जगह है, धन्य स्वयं को मै पाता हूं,
जब जब कहता दुनिया को, मै देवभूमि का वासी हूं।

कण कण में बसते हैं ईश्वर, कदम कदम पर मंदिर मंदिर,
हरदम रहती छाया प्रभु की, शीतल मन काया भी सुन्दर।
मन आतुर रहता है सबका, दर्शन तीर्थ देवभूमी पल पल हो,
जीवन का है सार यहीं सब, प्रभु चरणों में अपना भी बसेरा हो।।

सारा जगत भले घूम आओ, लेकिन देवभूमि बिन सब अधूरा है,
केदारनाथ बद्रीनाथ देख लिया, समझो सफल जीवन तुम्हारा है।
शब्दों में नहीं लिख सकते, ऐसी महिमा धारी देवी चारों धाम की है,
स्वयं त्रिदेव विराजे जहां निशदिन, वही देवभूमि हमारी है।

आवाहन करता हूं हर पल, आओ घूमो मेरी जन्मभूमि पर,
लेकिन रखना स्वच्छ इसे, लगे न कोई दाग आपके आगमन पर।
सारा जग है परिवार हमारा, यही मंशा हम सबके मन में है,
देवभूमि है सबकी प्यारी, इस स्वच्छ रखना भी हमारी जिम्मेदारी है।।
Pari ✍️ 





Pari..
Incredible Uttrakhand (देवभूमी)

Comments

Popular posts from this blog

कुछ कल्पनाओं के शहर

प्रेयसी या हो तुम पत्नी या फिर दोनों.?

व्यथा आज पहाड़ की