प्रेम की है दोनों परिभाषा

प्रेम की है परिभाषा जैसे, प्रेम स्वरूप है उसक समर्पण,
जीवन कर नाम पति के, तन मन कर देती है अर्पण।
सारे दुःख सुख साथ निभाए, स्वयं हो जैसे कोई दर्पण,
भूल सभी ख्वाबों सपनो को, जीवन उसका संपूर्ण समर्पण।।

हाथ थामती अजनबी होकर, पल में जीवन के करती निर्णय,
पिता की साख ऊंची रखती, रखती न मन कोई भी संशय।
जिम्मेदारी का बोझ उठाए, कोमलता में करती वह परिणय,
सहनशीलता, समझदारी का संगम, व्यवहार में रखती प्रतिपल विनय।

नया घर होगा, नव परिवार होगा, मन में आता कोई न भय,
हर एक वार है सहती हंसकर, लेकिन पाती कभी न शय।
सबको लेकर साथ चलना है, शुरू से वह कर लेती तय,
फिर तो पल पल आगे बढ़ती, नहीं बिगड़ती अब कोई लय।

न कोई ख्वाइश न कोई सपना, कह देती है सबको हंसकर,
लेकिन मन में हैं उसके कुछ, जानता है सिर्फ एक उसका वर।
हर कोशिश में उसकी खुशियां, उसके लिए ही तो है चारों पहर,
कोई दुख न आए उसको, पति के मन में रहता है ये डर।।

रात अकेली कट जाती है, दिन में दोनों की चलती तकरार,
झूठमूठ के इन झगड़ों में, रखा है संजो जन्मों का प्यार।
एक दूजे के लिए है जीते, माने एक दूजे को ही संसार,
हृदय पटल पर एक है दोनों, जैसे सिंधु और लहर।।
Pari ✍️


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