बस यूहीं ख्याल में
न जाने कौन सी वो बात है, न जाने कौन से वो जज्बात है... किताब खुली फिर भी लब्ज चुप है, न जाने कौन सी ये शब्दावली है... एक पल भी गुजरा तो क्या, एक नया पल वो भी दे गया.... मैं समझने में गलती कर बैठा. वो तो इशारे भर में बहुत कुछ कह गया... बेजुबान सा था मैं सामने उसके, वो जैसे कोई ज्वालामुखी हो.. मेरी सारी कोशिश नाकाम रही... जैसे मैं कातिल वो वकील हो... न लब्ज चाहिए कहने को, बस निगाहें सब बयां कर जाती है.. जो देख लू तुझे मैं नजर भर को.. तेरी हर बात जैसे मुझे अपनी लगती है.. जुबां कुछ कह दे तो भुलाना मुमकीन है, मेरी कलम के शब्दों को मिटाना न मुमकिन है.. मैं कह भी दूं झूठ दुनियां से शायद कभी, तुझको झूठ लिखना मेरी कलम का नामुमकिन है.. Pari