वो गुलाब किताब का

कल फिर शाम वही पुरानी सी आयी,
भूले बिसरे जज्बात संग यादें संजो लायी।
मिल गए कुछ पुराने ख्वाब कल फिर अलमारी में,
कल फिर मिला एक गुलाब उसी पुरानी किताब में।

सालों बाद कल वो पन्ना फिर से खोला,
ऐसे लगा जैसे गुलाब में से यार मेरा फिर बोला।
अरे यार कहां हो तुम, कितनी देर कर दी मुझसे मिलने में,
अब तो बताओ क्यों कैद किया मुझे इस किताब में।

सवाल वाजिब था लेकिन जवाब कुछ सूझा नहीं,
शायद मेरे पास था लेकिन मैंने भी कुछ जवाब दिया नहीं।
क्या कशमकश थी तब और क्या हालात थे कैसे बयां करता,
बेइंतहा थी मोहब्बत, बयां नहीं कर पाया, कैसे मै बताता।

कुछ पल की खामोशी के बाद फिर एक पंखुड़ी उड़ गई,
जैसे वो फिर एक बार मेरी जिंदगी से दूर चली गई।
उठाया मैने उसे फिर नाजों से.. जैसे कहना हो उसे आज,
तब जाने दिया, मजबूरी थी.. लेकिन नहीं जाने दूंगा दूर तुझे आज।

वो फूल जो सूख चुका था, जैसे जीवन का सावन बीत चुका था,
फिर भी सहमी सी थी वो आज भी, सूखे पत्तों में यादों के सहारे,
जीवन में अब फिर से वो वक्त लौटकर नहीं आ सकता था,
और शायद वो भी कहीं दूर इंतजार में हो, आखिरी मुलाकात सहारे।
Pari 

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