समय की अनोखी चाल

मुस्कान चेहरे पर अक्सर है आती, दुनिया की ये तस्वीर है हसाती,
व्यक्ति विशेष का निर्णय होता, फिर शब्दों की है परिभाषा बदलती।
मेरा मन जो चाहे वही सही है, दूसरे की मंशा को आंख दिखाती,
मेरा वकतव्य रहे ऊपर हमेशा, यही चाहत अब दिल मे घर है करती।।

त्यौहारों का मौसम है अब, हर दूजे दिन उत्सव होगा,
भूले बिसरे रिश्ते वादों को, फिर से जीने का वक्त मिलेगा।
लेकिन बात सिर्फ इतने तक, नहीं सिमट के रह जाएगी,
खुद को ऊँचा और तुझको नीचाँ, दिखाने की भी कोशिश की जायेगी।।

मैं तो कहता हूं अब भी वक्त है, समय का फेर समझो अब तो,
नष्वर शरीर और है वक़्त चलायमान, इसकी चाल को तुम तो बूझो।
फिर न समय पास में होगा, सिर्फ खुद के निर्णयों में उत्तर होगा,
रात ढलेगी दिन बदलेगा, समय न फिर एक सा होगा।

परिवार बचाओ संयम से, हर बार ऐठन ठीक नहीं,
मतों का तुम मतभेद रख लो, मन भेदों में पड़ना ठीक नहीं।
सारी दुनिया भूल जाती है, अगर तुम्हारे तुमसे रूठ गए,
परायों से फिर क्या ही मिलेगा, जब देखोगे रिश्ते अपने छूट गए।।

समय का तो है खेल निराला,  हर दिन बदले अपनी चाल,
कभी करे वो खींचातानी, तो कभी तलवार को भी बना ले ढाल।
मन की कहता pari सबसे आज, बड़ी दुर्गम है समय की चाल,
 संभल गए तो ठीक है, नहीं तो फिर बजवाता ये सबसे अपनी ताल।।
Pari ✍️

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