मेरा उससे मिलना तन्हाई में..
कुछ पल जो मैं बैठा तन्हाई में, तुम आ गई ख्यालों में,
थोड़ी सी शर्माई तुम और थोड़ी सी थी तुम मुस्कायी।
इक पल तो बस ऐसा लगा तुम हो पास मेरे बैठे प्रिये,
फिर दूजे ही पल जैसे मुझे अपनी फिर सुध आयी।
देखा मैने इधर उधर, ढूंढा तुझे फिर किधर किधर,
बस एक अकेला था मै, और तन्हाई थी फैली तब।
फिर आया एक ख्याल मन में, तुझको भी लेकर।
सपनों में है आती जो हकीकत में मिलेगी जाने कब।
तेरा वो मुस्काता चेहरा, तेरी वो शर्माती आँखें,
तेरी वो बातें अलबेली, तेरी वो गुस्साई आंखे।
तेरी वो बेपरवाही संग, तेरी वो जल्दी बाजी।
तेरा वो बिछड़न का डर, तेरी वो भीगी आंखे।
तनहाई तो तनहाई है, कुछ भी याद दिलाती है,
भूले बिसरे ज़ख्मों को, अक्सर ही ताजा कर जाती है।
जितना चाहो रहना दूर, यादें तो याद आ जाती हैं,
तनहाई कहने को है बस, असल में तो तुझसे मिलाती है।
माना तनहाई थोड़ी खराब है, लेकिन खुद से मिलने का मौका है,
भूले बिसरे लम्हों को, फिर से जीने का एक सलीका है।
अगर सीख लो तुम तनहाई में, खुद ही खुद से मिलना,
तो फिर उससे बेहतर नहीं लगेगा, जीवन तुमको जीना।
Pari ✍️
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