होली आई फिर पहाड़ म
बसंत फिर बॉडी ए ग्याई, दगड़ी म स्वाणु मौल्यार लाई,
खिलनी फूल डाली मौली गैनी, धरती थै स्वाणी बणाई
मौ (माघ) फर्की फाल्गुन बॉडी, पंचमी मनै अब होली आई।
गितेरू का गीत अर ढोलक की थाप से सारू पहाड़ गूंजी ग्याई।
फ्यूली खिली बुरांश खिलनी, मेलू-पयां मौली गैनी,
गैल्यो दगड़ी गैल्या सभी रंगू मा रंगमत ह्वेनी
याद करी इसकुल्या दिन, मुखड़ी मेरी भी खिली ग्याई,
हाथ म गुलाल लेकी, मुखड़ी विंकी मिन पिंगली काई।
हैरा बण..फूलों की खुश्बू, डांडियों मा बुरांश की भौंण,
पिंगला फूल लया खिलिगे, इन मा मन उदास कनमा रौण।
फौजी भेजी की जग्वाल अर जरा जरा की आस हम भी,
ऐगे बसंत ऐगे मौल्यार, आओ मिली खेला होली सभी।
खुद कैकी मन म बसीं, क्वि कनु कैकी जगवाल,
पधनी बॉ भी सारा लगी, भाईजी आला घौर भ्वाल।
क्वि ख्यालु का खूयूं कैका, कैक मन रे ग्या मलाल।
मेरी भी आस बस आस रै, अर हाथुम कैका नौ कु गुलाल।
Pari✍️
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