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सब कुछ सबको नहीं मिलता

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लाख कोशिश करो तुम, फिर भी कुछ तो अधूरा रह ही जाएगा, सब कुछ करने की चाह में, कुछ तो पीछे छूट ही जाएगा। जो मिला है उसका लुफ्त उठाओ, वही तुम्हे खुशियां दे जायेगा, सब कुछ की चाह में एक दिन, सब कुछ ही मिट जाएगा।। एक फूल खिला था उपवन में, सुंदर था सबसे वो वन में, गुरूर था उसको खुशबू पर, भंवरे की उसपर चाहत में। एक रोज वो फिर मुरझा गया, भंवरा उड़कर दूर चला, कब सूखे फूलों पर भौंरे टिकते हैं, उपवन देख अब मुस्कुरा रहा।। सावन की बदली छा जाती है, चहूं ओर बसंत ले आती है, देख मौसम की रंगत को, चिड़िया भी निशदिन चहकती है। सावन भी एक दिन खत्म हुआ, पतझड़ को जैसे उसने न्योता दिया, समय की अदला बदली को, फिर सावन ने भी प्रणाम किया। मानव का भी बस ऐसा जीवन है, कुछ पा लेता है कुछ खो जाता है, लेकिन खोने पाने में क्या, वह संघर्ष कहीं करना छोड़ देता है। हर वक्त वह लड़ता है हालात से, फिर जीत का सेहरा सिर होता है, ज्यादा की तो चाह हमेशा रहती है, लेकिन थोड़ा भी कुछ कम नहीं होता है।। कह भी जाओ और अगर कर भी जाओ, भुलाये तुम फिर भी जाओगे, लाख बना लो महल मकान, राख में ही आखिर फिर मिट जाओगे। तेरा मेरा कर लो कितना, बालक परि...

इष्टदेव महिमा

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 ।।देवभूमि वंदना: हमारे इष्ट-देव।। देवभूमि की श्रृंखलाओं से,  गूँजे इष्टदेवों का जयकारा, धन्य हुई पावन यह धरती, धन्य हुआ यह जग सारा। डांडा नागराज विराज रहे यहां, सेम नागराज की माया, फन फैलाए रक्षा करते, करते सब पर शीतल छाया।। नरसिंह देवता जोशीमठ में, खम्ब फाड़ कर प्रकटे हैं, भैरव बाबा लाठ लिए, भक्तों की रक्षा करते हैं। गाँव-गाँव के भूम्याल तुम, क्षेत्रपाल रखवाले हो, संकट से हमें उबारने वाले, तुम भक्तवत्सल बड़े निराले हो। ज्वालपा माँ की ज्योति निर्मल, मां चंद्रबदनी कल्याण करे, राजराजेश्वरी माँ जगदम्बे, भक्तों के सब भंडार भरे। सिद्धबली हनुमान विराजे, खोह नदी के पावन तट, दीवा की ऊँची चोटी से, माँ काट रही सब माया-जंजाल। कंडोलिया ठाकुर कृपा बरसाएं, वन-पर्वत के राजा हैं, क्यूंकालेश्वर महादेव के दर पर, बजते शंख और बाजा हैं। तकड़ेश्वर की महिमा न्यारी, बिन्सर महादेव निराले, थलीसैंण से चौखुटिया तक, शिव ही सबको पालने वाले। अगणित रूप तुम्हारे ईष्ट, अगणित तुम्हारी शक्ति है, देवभूमि के कण-कण में, बसी तुम्हारी भक्ति है। हे पहाड़ी देवी-देवताओं, अपना आशीर्वाद बनाए रखना, इस पावन धरती की गरिमा,...

मोहब्बत की राह आसान नहीं..!

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मोहब्बत अगर कर ही ली है, फिर हर अंजाम को सहना पड़ेगा, मिल गया साथ तो फिर क्या, मगर तैयार मात को भी रहना पड़ेगा। हर युग में विरह की कहानी है, उसको भी अवश्य ही पढ़ना होगा, प्रेम अगर कृष्ण से करोगे, विष मीरा सा एक रोज पीना पड़ेगा। समय हर बार नया मोड लेगा, पास होकर भी प्रेमी से दूर रहोगे, कर के हर बात मन के उसकी, इल्जाम बेवफाई का भी सहोगे। मोहब्बत नाम है त्याग का, त्यागकर ही वो तुम्हे अपनाएगा, अगर मिल गई खोट जरा सी भी, इश्क फिर तार तार हो जाएगा।। तनहाई में वो कबूल कर ही लेंगे, तुम्हें भीड़ में साथ ढूंढना होगा, थाम जो लोगे एक बार हाथ उसका, फिर ताउम्र निभाना पड़ेगा। ये तो दरिया है आग का pari, डूबकर ही पार करना होगा, और आ गई घड़ी आखिरी अगर, हँस के उसको भी गले लगाना पड़ेगा।। मोहब्बत मुकम्मल होगी जरूरी नहीं, दायरा अपना पहचानना होगा, सब्र से काम लेना मेरे यार तुम, आशुओं को तनहाई में बहाना पड़ेगा। ज़ख्म अनेक मिलेंगे इस राह में, दर्द को दवा समझ पीना ही होगा, और ज़ख्मों की नुमाइश न करना, ये दर्द तुझे सिर्फ अकेले ही सहना पड़ेगा।। चोट दिल पर खाई है तो असर कलम में भी दिखेगा, ज़ख्म शरीर के भर जाएंगे ले...

गर्मी की आपबीती

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अगर गर्मी का जो मौसम भी अपने दिल की बात किसी को कह पता, तो बिना कहे वह भी रह नहीं पाता। सबको झुलसा रही है गर्मी, अब मैं तो खुद भी झुलसा हूं जाता। तप रहा हूं रात दिन, चैन न कहीं अब स्वयं हूं पाता, तुम तो लगा लेते हो AC, कूलर, मेरी भला जहान में कौन सोचता।। पेड़ तुम काटो, सीमेंट तुम बिछाओ, इसमें मेरा भला क्या योगदान था, तुम झेलते अपने कर्मों का फल, देना मेरा क्यों फिर बलिदान था। कुछ मिनिट की गर्मी सहकर, तुम बिलों में अपने चले जाते हो, इसी तपती चुभती गर्मी में, मुझे अकेला छोड़ जाते हो। न कोई मेरा अब जोर चलेगा, मै यूहीं दिन दिन तपता रहूंगा, तुम अगर अभी ना सुधरे, रोज फिर तिल तिल मै मरूंगा। इसी गति से अगर जंगल, पेड़ कटेंगे, फिर सिर्फ सीमेंट के जंगल दिखेंगे, आज भला तुम खुश हो जाओ, भविष्य पीढ़ियां तुम्हे ताने देंगे। Pari ✍️ 

प्रकृति की है यही पुकार, पेड़ बचाओ अबकी बार

गर्मी का है प्रकोप अटल, सारी दुनिया पर है इसका कहर, क्या दिन क्या रात भला, त्रस्त है दुनिया चारों पहर। दिन में बाहर निकले अगर, तंदूर सा तुम जल भुन जाते हो, रात को भी तो गर्मी से, तुम चैन से कहाँ सो पाते हो।। तापमान का तो क्या कहना, 40 छोड़ो 50 पार होने को है, पसीना ऐसे बह रहा बदन से, जैसे सैलाब कोई आने को है। रह रहकर चलती है लू दिन में, फिर आता है तूफानों का कहर, बारिश की उम्मीद में मानव, छाता लिए करता है मेहर।। एक था जमाना वो भी जब, मई जून से डर लगता था, क्यूंकि आसमा सिर्फ इन्हीं दो महीनों में अधिक तपता था। आज क्या मार्च क्या जुलाई है, जैसे धूप ने पंचायत बुलाई है, अब तो दिन दिन पारा चढ़ता है, और आदमी गर्मी से मरता है।। हे ईश्वर तुमसे है अब अर्जी, सुन तो लो बाकी जैसी आपकी मर्जी, थोड़ा तो एहसान करो हम पर, सुन लो मानव की तुम अर्जी। समय समय पर बारिश कर के, कर दो सब पर तुम एक एहसान, बदल मौसम कर दो सुहाना, ताकि बची रही हम सबकी मासूम सी जान।। बात अगर समझी जाय, तो इसमें है बस हमारी भागीदारी, पेड़ काट घर बनाए हमने, कर तापमान बढ़ाने की तैयारी। फिर बची हुई कसर और निभाई, अपनी सहूलियत को तकनीक बना...

उसकी फिर वापसी इस दिल में

आज फिर जैसे वही लम्हे फिर लौट आए, सालों बाद जब उसी आंगन में वो फिर शर्माए। लगा जैसे आम का पेड़ फिर फल देने लग गया, और वो पुराना पीपल फिर से हरा भरा हो गया। कुछ तो बदला नहीं, ऐसा क्या हुआ आज की शाम में? कुछ खास नहीं बस वो वापिस आ गई अपने गांव में। उसकी वो चहकती मुस्कान, उसकी वो बातें निराली, उसके लौट आने जैसे, सभी खेतों में आ गई हरियाली।। वो सूना पनघट अब फिर से आबाद हो जायेगा वो पुराना गांव का रास्ता फिर से रौनक पाएगा। उसके आने से जैसे बाजार फिर सजने लग गया है, उसकी एक झलक के बाद मेरा दिल खिल गया है। आंखे उसकी जैसे सागर, जुल्फों में समाए जैसे काले बादल, हर बार वो अलग सा दिखती है, खनके जब जब पांव की पायल, होठों की मुस्कान तो ऐसे, बागों में खिलते लाखों फूल हो जैसे। अब तुम ही बताओ ऐसी अदाओं से बचकर दूर जाएं तो कैसे।। वो बातें उसकी मीठी मीठी, आज भी मिसरी खोल रही हैं, वो आखिरी मुलाकात की कसक, फिर आज बोल रही है। वो फिर न मिलने की कसम आज वो खुद तोड़ गई है, जाते जाते फिर मिलने की नई एक आस छोड़ गईं है।। Pari ✍️ 

प्रेम की है दोनों परिभाषा

प्रेम की है परिभाषा जैसे, प्रेम स्वरूप है उसक समर्पण, जीवन कर नाम पति के, तन मन कर देती है अर्पण। सारे दुःख सुख साथ निभाए, स्वयं हो जैसे कोई दर्पण, भूल सभी ख्वाबों सपनो को, जीवन उसका संपूर्ण समर्पण।। हाथ थामती अजनबी होकर, पल में जीवन के करती निर्णय, पिता की साख ऊंची रखती, रखती न मन कोई भी संशय। जिम्मेदारी का बोझ उठाए, कोमलता में करती वह परिणय, सहनशीलता, समझदारी का संगम, व्यवहार में रखती प्रतिपल विनय। नया घर होगा, नव परिवार होगा, मन में आता कोई न भय, हर एक वार है सहती हंसकर, लेकिन पाती कभी न शय। सबको लेकर साथ चलना है, शुरू से वह कर लेती तय, फिर तो पल पल आगे बढ़ती, नहीं बिगड़ती अब कोई लय। न कोई ख्वाइश न कोई सपना, कह देती है सबको हंसकर, लेकिन मन में हैं उसके कुछ, जानता है सिर्फ एक उसका वर। हर कोशिश में उसकी खुशियां, उसके लिए ही तो है चारों पहर, कोई दुख न आए उसको, पति के मन में रहता है ये डर।। रात अकेली कट जाती है, दिन में दोनों की चलती तकरार, झूठमूठ के इन झगड़ों में, रखा है संजो जन्मों का प्यार। एक दूजे के लिए है जीते, माने एक दूजे को ही संसार, हृदय पटल पर एक है दोनों, जैसे सिंधु और लहर।।...