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Showing posts from December, 2025

वो बारिश तेरी वाली✍️

 एक अरसा हो गया तुमसे मुलाकात हुए, शायद अब तुम  हमारी झलक भी हो भूल गए। क्या वो पार्क का बेंच तुम्हे अब याद आता नहीं? वो आखिरी मुलाकात की अधूरी बात सताती नहीं..? आज फिर तुम शिकायत करोगी, जिक्र क्यों करते हो मेरा सावन में, मैं समझती हूँ याद कर रहे हो, हिचकियां बता रही हैं, पर क्या लिखना और एहसास को शब्द रूप देना जरूरी है, क्यों लिख रहे वो किताब, जिसकी कहानी अधूरी है। पर मैं भी क्या करूं यार, कलम खुद ही तुझे लिख देती है, वो तेरा बालकनी से बरसती बूंदों को निहारना.... तुम अब शायद नहीं आती होंगी बाहर पहले की तरह, लेकिन मेरी आँखें तो बस वही सावन खोजती हैं। आज फिर सफर में हूं, फिर वही बारिश है.. हाँ! तेरे वाली, यूं तो बारिश शायद एक सी होगी, तेरे वाली कुछ खास थी। अब न वो सावन आता है, न ही वो बादल फिर कभी बरसे, वो ख्वाइश अधूरी ही रही, हम ताउम्र बस एक तुझको तरसे। तुम दूर हो आज याद आ गई, मुस्कुराते रहना बस यही ख्वाइश है, देखते है कब तक यादों में रहोगे, अब तो सांसों की यही आजमाइश है। तुम भूल जाना तुम्हारे लिए आसान होगा, मै यादें संजो के रख लूंगा दिल में रखूंगा तस्वीर तेरी और तेरी यादों सं...

अपने अपने युग के भगवान..!

राम अगर रामत्व छोड़ दें तो फिर मर्यादा कौन सिखाएगा कृष्ण अगर छल न करें, तो कौरवों को कौन हराएगा। न त्रेता कृष्ण को अपनाए न द्वापर में राम आ पाएंगे, हर युग की अपनी कथनी है, अदला बदली न सह पाएंगे। राम तो बस मानव सा जीते, कृष्ण अपना अस्तित्व दिखाते, हनुमान जी बस आज्ञा मानें, अर्जुन बिन तर्क तीर न साधे। स्वयं प्रभु होकर भी राम जी, वानर सेना से सहमति लेते, मैं ही हूं त्रिभुवन का स्वामी, कृष्ण जगत को स्वयं बताते। हर युग की अलग है चाल, हर युग की अलग है माया, सतयुग में तप होते थे, द्वापर में यज्ञ से काम बन जाता। द्वापर में जपतप के संग स्वयं कृष्ण गीता ज्ञान दे रहे, कलयुग बड़ा सौभाग्यशाली सिर्फ नाम से काम  बन जाता। राम भटकते जंगल जंगल, कृष्ण विश्राम करें वृंदावन, राम सिखा रहे संघर्ष जीतना, कृष्ण संघर्ष के कारण बताते। राम सिखाएं मर्यादा ने रहना, कृष्ण स्वयं जाते हैं तपोवन, राम चलते हैं समाज के साथ, कृष्ण समाज को साथ चलाते राम व्यथित हैं जनकल्याण को लेकर, कृष्ण स्वयं नियम बनाते, राम पांव छूआकर अहिल्या तारे, कृष्ण द्रौपदी चीर बढ़ाए। राम सबरी के बेर को खाएं, कृष्ण घर घर जाकर माखन चुराएं, राम ना...

पहाड़ और पहाड़ी बचाओ

मेरी पहचान बल उत्तराखंड, मेरी शान बल देवभूमि है, मैं हूं पहाड़ी गर्व है मुझे, मेरी बोली भाषा गढ़वाली कुमाऊनी है। चारों धाम है मेरी पहचान, मेरी जान देवभूमि में बसती है, मैं हूं करता धन्यवाद प्रभु का, जो उत्तराखंड मेरी जन्मस्थली है। कितना अच्छा लगता है, कितने प्यारे बोल दिखते हैं, लेकिन क्या जीवन में मनन किया, सवाल फिर ऐसे उठते हैं। मैं पहाड़ी मै उत्तराखंडी, गर्व से नारे रोज बजते हैं, उत्तराखंड की फिक्र हम देखो, दूसरे शहरों में बस करते हैं। आज उत्तरायण है बल दिल्ली में कौथिग लगाते हैं, लेकिन क्या खुद हमारे बच्चे मकरैणी का महत्व जानते हैं? घुघतिया हो या रोटल्या बार, बस स्टेटस तक सीमित रह गए, हम तो बस अब पिज्जा बर्गर और चाउमीन के शौकिन हो गए। अच्छा है कौथीग़ लगाओ, खूब भीड़ पहाड़ की एक जुट करवाओ, लेकिन सिर्फ नाच गाने तक नहीं, पहाड़ बचाने की मुहिम भी गाओ। संस्कृति सिर्फ मेलों से नहीं, परिवार में भी घोलनी पड़ती है, डीजे पर देवता नाच रहे, क्या नहीं ये देवभूमि की बेइज्जती है। पैसे की माया है हर जगह, पैसे का हो रहा है मेल, नेता हो या इनफ्लुएंसर, व्यूज पाने का कर रहे खेल। न भू-कानून, न अतिक्रमण, न...

गुलदार मुक्त हो या गुलदार युक्त पहाड़

आंखों से नींद खो चुकी है, दिल का सुकून अब कहीं खो गया है, जब से देवभूमि में गुलदार का आतंक बेइंतहा हो गया है। हर समय एक डर लगा रहता है अब हर उत्तराखंड के वासी को। कहीं गुलदार उठा न ले जाए मुझे या मेरे किसी करीबी को। रोज की हर जरूरत को भी डर के माहौल में रहकर पूरी करना होगा, मैं पहाड़ी हूं जरूर लेकिन पहाड़ में मुझे अब डर के रहना होगा। न घास अकेले अब ला सकता हूं, न गाय-बकरी अकेले चरा सकता हूं, न सुबह जल्दी और न ही शाम देर तक खेतों में काम कर सकता हूं। भय में हूं जी रहा मैं रोज, न पी न सही से कुछ खा ही सकता हूं। अपनी आप बीती किसे बताऊं, रात सपने में भी गुलदार ही देखता हूँ। एक जगह से पकड़ रहे और दूसरी जगह गुलदार को छोड़ दे रहे, एक को दिलासा दे कर के ये दूसरे पहाड़ी की जान खतरे में डाल रहे। कल तक बस गुलदार का डर था, आज सुअर भालू और आ गए। बच्चे से लेखर बूढों तक को, ये निशदिन अपना निवाला बना रहे। बल मर जाओ कोई बात नहीं, 10 लाख मुआवजा मिल जायेगा, तुम्हारी जान जाए तो क्या, गुलदार का पेट तो भर जायेगा। आज  गढ़वाल हो या कुमाऊं क्षेत्र, गुलदार के आतंक से है त्रस्त, जनता हर रोज मर रही यहां, प्रत...

कौन जिम्मेदार? तलाश जारी..!

मन व्यथित होता है देख, खाली हो रहा गांव आज हर एक, वीडियो बन रहे पहाड़ पर, बल अब रहना नहीं है यहां सेफ। आपदाओं का घर है ये, तो कोई कह रहा गुलदार से बचाओ, कौन है इसका जिम्मेदार, मनन कर अब आप ही बताओ। विकास की ताल ठोक, अतिक्रमण हटाने का था बहाना, तोड़ हमारे पुस्तैनी घर बार, न जाने किसे था इनको बसाना। चौड़ीकरण के नाम पर,  पहाड़ हमारा उजाड़ दिया, कौन है जो विनाश कर रहा, और विकास का उसको नाम दिया। पहाड़ की जवानी और पहाड़ पानी, दोनों को बांध दिया किसने, कौन है वो तीर्थों को भी पर्यटक स्थल बना दिया जिसने। महायोजना है बल कोई, बद्री केदार धाम को चमकाने की, कौन समझाए इन मूर्खों को, देवों को पसंद है जगह शांति की। विकास के नाम पर योजना चला रहे, साल दर साल पहाड़ उजाड़ रहे, केदारनाथ आपदा से सीख नहीं ली, थराली, धराली को न्योता दिया। बिजलीघर बना अनेक, बादल को फटने के लिये मजबूर था किया। रोजगार हमारा छीन लिया और बल देखो हमने तुम्हारा विकास है कर दिया। अब फ्री का लैमचूस दे रहे और इसको भी विकास कह रहे, खेती करवाकर बंजर सबकी, अब सम्मान निधि हमें वो दे रहे। न ढोल बचे न लौहार रहे, बस अब DJ और tent लग रहे...

स्कूल फिर से, वही पुराने दोस्तों संग

आज फिर स्कूल के प्रांगण में खड़ा था, पुरानी वो सारी बातें याद आ गई। एक पहला दिन था न जाने की जिद्द थी, एक वो आखिरी दिन यादें भरपूर थी। पहला दिन जब गए तो जेल सा महसूस हुआ मां पापा दुश्मन लगे स्कूल जाना सजा सा अखरा। गुरुजी में कोई शैतान जैसे नजर आया था, वो पहला दिन लगा जैसे कोई खराब साया था। फिर आदत सी होने लगी और स्कूल से प्यार होने लगा, किताबें थोड़ी बोझिल जरूरी थी लेकिन बस्ता हल्का होने लगा। पढ़ाई का बोझ था जो कंधे झुका देने की क्षमता रखे था, लेकिन वो हाफ टाइम की घंटी में सुख कुछ अलग ही था। दिन बीतने लगे कक्षाएं 1 से शुरू हो सीढ़ियों सी बढ़ने लगी, पांच साल का वो बच्चा अब किशोर अवस्था में आने लगा। खेल खिलौने से दूरी और किताबें करीब होने लगी, जिंदगी ठहरी थी जो अब तेजी से दौड़ने लगी। वो स्कूल की कक्षा वो गुरुजी की डांट और वो दोस्तो का साथ, क्या नहीं था बताओ जीवन में मेरे तब खास, अब तो बस घर से निकलने की देरी थी, पढ़ाई जैसे करने का बस अब अबेरी थी। कब मैट्रिक और फिर 12वीं पूरी हो गई पता ही नहीं पता जब मस्ती जिम्मेदारी बन गई, विश्वविद्यालय तो बस एक सीढ़ी भर रह गया था, उम्मीदों पर खरे उतरने ...

पहाड़ अब आपदा कु भंडार

विकास का नौ फर विनाश कना किलै तुम। हमरी पुंगडी बाँजा  करी, अफ्फू देहरादून बस्याँ किलै तुम। पाणी रोकी बांध बणै, आपदा थै न्यूतू दीणा किलै तुम? सड़क बणै गौ कु रस्ता बाघ थै बताणा किलै‌ तुम..? रोड टुटी लोग‌ मरी, बस मुआवजा तक सीमित तुम, आपदा आई कुड़ी बोगनी बस तमसु देखणा रया‌ं तुम। फसल फूकी सुंगरु न, देहरादून सुनिदं सियाँ तुम। न क्वि देखणु, न खोज होई, बस बौंहडा प्वण्या तुम। पलायन फर ज्ञान दीणा, पर योजना कुछ नि बणांदा तुम, रोजगार फंडू फूका, शिक्षा स्वास्थ्य भी नि दे सक्यां तुम। कनु कै रालू पहाड़ी पहाड़ मा, जब मूलभूत सुविधा भी हुयीं गुल, बाघ, सुंगर, और भालू से आज, सरू पहाड़ देखा हुयूं फुल। अब त चेती जाओ सरकार, आपदा की आयीं भरमार, कभी भालू, कभी सुन्गर त कभी गुलदार कु करूं अत्याचार। भोल दोष नि दियां जनता थै, जब सुरक्षा म उठाली हथियार। कनु कै संघर्ष‌ इनमा करलो "Pari," कुछ त करा अब तुम विचार। ©®Pari✍️