बिन तेरे अब कोई आस नहीं है "वैराग्य"
थोड़ा समय अवश्य लगता है, लेकिन फिल्म समझ में आ जाती है,
हर बार नायक सही नहीं होता, कभी कभी कहानी बदलनी पड़ती है।
सावन तो यूहीं बदनाम होता है, मौसम तो प्रेमिकाएं बदलती हैं,
रंग बिरंगे धर के रूप, नायकों को ये निशदिन ही छलती हैं।
बादल तो बरस कर चल देते हैं, बस रह जाती है बारिश तनहा,
जैसे पतझड़ के आने पर, पेड़ सहे पत्तो का बिछड़ना।
हर एक पत्ता टूट जाता है, खाली बच जाती है ठूंठ,
तेरी विरह में मै भी लुट गया, खंडर पीछे गया बस छूट।
आखिर कब तक विरह सहें, यादों के सहारे हम जियें,
कौन सी देहली अब तन रगड़ें, कौन सी सजा अब हम सहें।
आखिर कब तक तप करना होगा, कितने साल अभी जपना होगा।
अब तो आ जा टीस मिटा जा, कब तनहा बिन तेरा रहना होगा।।
ख्वाब भी सारे बिखर गए, अब तो बस एक आस बाकी है,
दुनिया सारी पीछे छूटी, तेरे मिलन की बस प्यास बाकी है।
अब तो बंधन तोड़ के आ जा, सारे झरोखे मोड के आ जा,
तेरे लिए ही ये सांस बाकी है, तेरे मिलन को ये जान बाकी है।।
अधिक लिखने का हाल नहीं है, प्रेम के अलावा कोई जाल नहीं है,
कलम की स्याही बिखर गई है, कलम में अब वो ताकत नहीं है।
मुझको अंतिम दर्शन दे जा, बिन तेरे जीना कोई आस नहीं है,
सब कुछ से वैराग्य हो चला, एक तेरे अब कोई चाह नहीं है।।
Pari ✍️
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