ख्यालों की ओट से
खुशियों का सावन भी तुम हो ये चमचमाता शहर ये जगमगाती मिनारें, फिर भी जीवन है जैसे सड़क के किनारे। तुम खुश रहो इन चकाचौंध के शहर में, मुझे छोड़ आओ मेरे गाँव की सहर में.. शहर उसका था लोग भी उसके थे, हम तो बस एक मुसाफिर भर थे। न जाने कैसे संभले हम जानते ही नहीं, वरना तूफान जिंदगी में अपने भी बहुत थे। मुस्कुराता चेहरा तेरा जैसे कोई खिलता गुलाब है, खूबसूरत ये निगाहें जैसे आने वाला कोई सैलाब है अधरों से गिरते हैं शब्द रूपी पुष्प ऐसे ये तेरे, जैसे खिलने वाला हो कोई गुलिस्तां शहर में मेरे। ख्वाइशों के शहर को बस ख्वाइशों में रहने दो, ख्यालों में है वो अगर तो ख्यालों में रहने दो। मुद्दतों के बाद मिले हो आज हमशे अधरों को सिले और नयनों को कहने दो.... उसके नयन कितने खूबसूरत थे, ये बयां करने को लब्ज़ नहीं मिलते, बस इतना ही कह सकता हूं, कि ये जब जब मिले, हम वहीं ठहर गए.. Pari ✍️