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मोहब्बत की राह आसान नहीं..!

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मोहब्बत अगर कर ही ली है, फिर हर अंजाम को सहना पड़ेगा, मिल गया साथ तो फिर क्या, मगर तैयार मात को भी रहना पड़ेगा। हर युग में विरह की कहानी है, उसको भी अवश्य ही पढ़ना होगा, प्रेम अगर कृष्ण से करोगे, विष मीरा सा एक रोज पीना पड़ेगा। समय हर बार नया मोड लेगा, पास होकर भी प्रेमी से दूर रहोगे, कर के हर बात मन के उसकी, इल्जाम बेवफाई का भी सहोगे। मोहब्बत नाम है त्याग का, त्यागकर ही वो तुम्हे अपनाएगा, अगर मिल गई खोट जरा सी भी, इश्क फिर तार तार हो जाएगा।। तनहाई में वो कबूल कर ही लेंगे, तुम्हें भीड़ में साथ ढूंढना होगा, थाम जो लोगे एक बार हाथ उसका, फिर ताउम्र निभाना पड़ेगा। ये तो दरिया है आग का pari, डूबकर ही पार करना होगा, और आ गई घड़ी आखिरी अगर, हँस के उसको भी गले लगाना पड़ेगा।। मोहब्बत मुकम्मल होगी जरूरी नहीं, दायरा अपना पहचानना होगा, सब्र से काम लेना मेरे यार तुम, आशुओं को तनहाई में बहाना पड़ेगा। ज़ख्म अनेक मिलेंगे इस राह में, दर्द को दवा समझ पीना ही होगा, और ज़ख्मों की नुमाइश न करना, ये दर्द तुझे सिर्फ अकेले ही सहना पड़ेगा।। चोट दिल पर खाई है तो असर कलम में भी दिखेगा, ज़ख्म शरीर के भर जाएंगे ले...

प्रकृति की है यही पुकार, पेड़ बचाओ अबकी बार

गर्मी का है प्रकोप अटल, सारी दुनिया पर है इसका कहर, क्या दिन क्या रात भला, त्रस्त है दुनिया चारों पहर। दिन में बाहर निकले अगर, तंदूर सा तुम जल भुन जाते हो, रात को भी तो गर्मी से, तुम चैन से कहाँ सो पाते हो।। तापमान का तो क्या कहना, 40 छोड़ो 50 पार होने को है, पसीना ऐसे बह रहा बदन से, जैसे सैलाब कोई आने को है। रह रहकर चलती है लू दिन में, फिर आता है तूफानों का कहर, बारिश की उम्मीद में मानव, छाता लिए करता है मेहर।। एक था जमाना वो भी जब, मई जून से डर लगता था, क्यूंकि आसमा सिर्फ इन्हीं दो महीनों में अधिक तपता था। आज क्या मार्च क्या जुलाई है, जैसे धूप ने पंचायत बुलाई है, अब तो दिन दिन पारा चढ़ता है, और आदमी गर्मी से मरता है।। हे ईश्वर तुमसे है अब अर्जी, सुन तो लो बाकी जैसी आपकी मर्जी, थोड़ा तो एहसान करो हम पर, सुन लो मानव की तुम अर्जी। समय समय पर बारिश कर के, कर दो सब पर तुम एक एहसान, बदल मौसम कर दो सुहाना, ताकि बची रही हम सबकी मासूम सी जान।। बात अगर समझी जाय, तो इसमें है बस हमारी भागीदारी, पेड़ काट घर बनाए हमने, कर तापमान बढ़ाने की तैयारी। फिर बची हुई कसर और निभाई, अपनी सहूलियत को तकनीक बना...

प्रेम की है दोनों परिभाषा

प्रेम की है परिभाषा जैसे, प्रेम स्वरूप है उसक समर्पण, जीवन कर नाम पति के, तन मन कर देती है अर्पण। सारे दुःख सुख साथ निभाए, स्वयं हो जैसे कोई दर्पण, भूल सभी ख्वाबों सपनो को, जीवन उसका संपूर्ण समर्पण।। हाथ थामती अजनबी होकर, पल में जीवन के करती निर्णय, पिता की साख ऊंची रखती, रखती न मन कोई भी संशय। जिम्मेदारी का बोझ उठाए, कोमलता में करती वह परिणय, सहनशीलता, समझदारी का संगम, व्यवहार में रखती प्रतिपल विनय। नया घर होगा, नव परिवार होगा, मन में आता कोई न भय, हर एक वार है सहती हंसकर, लेकिन पाती कभी न शय। सबको लेकर साथ चलना है, शुरू से वह कर लेती तय, फिर तो पल पल आगे बढ़ती, नहीं बिगड़ती अब कोई लय। न कोई ख्वाइश न कोई सपना, कह देती है सबको हंसकर, लेकिन मन में हैं उसके कुछ, जानता है सिर्फ एक उसका वर। हर कोशिश में उसकी खुशियां, उसके लिए ही तो है चारों पहर, कोई दुख न आए उसको, पति के मन में रहता है ये डर।। रात अकेली कट जाती है, दिन में दोनों की चलती तकरार, झूठमूठ के इन झगड़ों में, रखा है संजो जन्मों का प्यार। एक दूजे के लिए है जीते, माने एक दूजे को ही संसार, हृदय पटल पर एक है दोनों, जैसे सिंधु और लहर।।...

सहज जीवन का सत्य अटल

मुश्किल थोड़ा होता है, दूर कहीं घर से रहना, विपरीत परिस्थितियों मे दुःख पड़ता है सहना। चारों पहर तुम स्वयं निर्णय करते हो रोजाना, अंत में सोचते हो क्या ही मैने खो और है पा लेना।। रात गुजरती है करवट बदले, नींद नहीं आंखों में होती, दिन के चारों पहर तो बस, दौड़ भाग ही हिस्से आती। न खाने का कोई समय है, न पीने का ही समय है मिलता, 12 महीने सातों दिन, बस चरखा है वो चलता।। घर छोड़कर निकले थे, सपने लाखों आंखों में बसाये, जी तोड़ की थी मेहनत हमने, करने पूरा जो सपने थे सजाये। साल बीत गए अनेकों लेकिन, सपने सारे अधूरे रह गए, रेत से बनाए थे घर जैसे, बारिश आयी और सारे बह गए।। गाँव छोड़कर शहर गए, सुकून नहीं फिर भी पाया, जो था गौरव गाँव में, शहर पहुंच उसे भी गवाया। बड़ी देर से समझ मिली, वक्त गवाकर फिर अक्ल बढ़ी। सालों के संघर्ष के बाद भी, ज़िन्दगी जस के तस थी पड़ी।। अब सपने बेचकर हक़ीक़त खरीद रहा, झूठे झांसों से बाहर निकल रहा, देखे थे जो सपने जीवन में, सपनो से उन अब बाहर निकल रहा। अब तो बस नियति अपना रहा हूं, जो चाहे वह उसे हकीकत जान रहा हूं। अब तो समय के बहाव में बह जाना है, सहज मान जीवन स्वीकारना है।...

पंछी पिंजरे सा उड़ जाऊंगा

प्रेम है उससे मेरा निश्छल, नहीं कोई उसमें स्वार्थ भरा, हर सांस है मेरी उसके नाम, कुछ भी नहीं अपने पास धरा। मेरी परीक्षा वो कभी भी करे, मै हरदम ही रहता तत्पर हूं, प्रेम में उसके मै डूबा प्रतिपल, उसी के लिए जैसे अब जीता हूं।। हर रोज उसकी याद है आती, नम आंखे अपनी छिपाता हूं, जान न सके कोई राज ये मेरा, आंखों में चश्मा लगाता हूं। मेरे प्रेम की वो परिभाषा, जीवन के मेरे है इक अभिलाषा, मैं बस उसको देखता हूं, वो पढ़ती है मेरे नयनों की भाषा।। अनेकों बार समझा चुका हूं, लेकिन वो कहां राजी होती है, मैं हूं उसके प्रेम में डूबा, वो बस इसे पागलपन बताती है। मेरी है नादानी या कुछ और, हर पल याद उसकी सताती है, मैं हूं तनहा आज भी यारो, वो बस ख्वाबों ख्यालों में आती है।। मेरे प्रेम को आजमा रही, मुझसे खेला वो करने है लगी, सब कुछ है न्यौछावर उसपर, सबको ढोंग वो बताने लगी। प्रेम है मेरा उससे अविरल, तन की भूख वो समझने लगी, दूर जाने पर सोचेगी वो, आज भले नासमझी है करने लगी।। यादों का पिटारा दे जाऊंगा, झोली में सितारे भर जाऊंगा। प्रेम करूंगा निश्छल अविरल, काया छूने का प्रयास नहीं करूंगा। प्रेम परीक्षा है अगर बिछड़न...

बिन तेरे अब कोई आस नहीं है "वैराग्य"

थोड़ा समय अवश्य लगता है, लेकिन फिल्म समझ में आ जाती है, हर बार नायक सही नहीं होता, कभी कभी कहानी बदलनी पड़ती है। सावन तो यूहीं बदनाम होता है, मौसम तो प्रेमिकाएं बदलती हैं, रंग बिरंगे धर के रूप, नायकों को ये निशदिन ही छलती हैं। बादल तो बरस कर चल देते हैं, बस रह जाती है बारिश तनहा, जैसे पतझड़ के आने पर, पेड़ सहे पत्तो का बिछड़ना। हर एक पत्ता टूट जाता है, खाली बच जाती है ठूंठ, तेरी विरह में मै भी लुट गया, खंडर पीछे गया बस छूट। आखिर कब तक विरह सहें, यादों के सहारे हम जियें, कौन सी देहली अब तन रगड़ें, कौन सी सजा अब हम सहें। आखिर कब तक तप करना होगा, कितने साल अभी जपना होगा। अब तो आ जा टीस मिटा जा, कब तनहा बिन तेरा रहना होगा।। ख्वाब भी सारे बिखर गए, अब तो बस एक आस बाकी है, दुनिया सारी पीछे छूटी, तेरे मिलन की बस प्यास बाकी है। अब तो बंधन तोड़ के आ जा, सारे झरोखे मोड के आ जा, तेरे लिए ही ये सांस बाकी है, तेरे मिलन को ये जान बाकी है।। अधिक लिखने का हाल नहीं है, प्रेम के अलावा कोई जाल नहीं है, कलम की स्याही बिखर गई है, कलम में अब वो ताकत नहीं है। मुझको अंतिम दर्शन दे जा, बिन तेरे जीना कोई आस नहीं...

तेरी यादों की बारात रुक गई

कुछ सुकूँ तो दिल को जरूर मिल गया है, तेरी मुस्कान का दीदार जो हो गया है। वर्षों से प्यासी थी जो आँखे एक झलक को, जैसे आज कोई अमृत रस पान हो गया है।। क्या कहूँ तुझे कैसा ये इंतज़ार था मेरा, बिन तेरे जैसे हर तरफ बस था अँधेरा। हर आस भी अब दम तोड़ने को थी जैसे, आने से तेरे एक जीवन प्राण मिला इसे। अगर होती कोई तपस्या तेरे मिलन को, हंस कर वर्षों किया करते हम भी तेरे लिए। दुवाओं के सिवा कोई विकल्प न था पास यारा, बस ताउम्र बस एक वही तो करते रहे। साथ जो छूट गया एक बार, फिर कहां मुलाकात होती है, दूर जाने के बाद तो बस, अपनी भी जैसे परायी होती है। आखिरी मुलाकात से लेकर आखिरी झुकी निगाहें तेरी। फिर सारे गम मेरे हो गए और खुशियां तमाम हो गई तेरी।। चल अब वादा कर की भूल जाएंगे हम एक दूजे को, अगर हुई मुलाकात तो समझेंगे अजनबी हम दोनों को। सारी यादों मुलाकातों को बस सीने में छुपाकर रखेंगे, सिले होंठों के साथ ही दुनियां को अलविदा हम कहेंगे।। Pari ✍️ 

जीवन आम आदमी का✍️

ज़िम्मेदारी के बोझ तले आम आदमी इतना दब जाता है, की हजार तकलीफ क्यों न हो डॉक्टर के पास नहीं जाता है। हो अनेकों कष्ट फिर भी, हसकर टाल जाता है, कोई बीमारी न निकल आये सोच अस्पताल नहीं जाता है। अक्सर ही वो दवाई केमिस्ट से ले कर चुपचाप खाता है, कुछ नहीं कुछ नहीं कहकर सारे दर्द यूहीं वो छुपाता है। पैसे खर्च न हो जाएं कहीं, टेस्ट की पर्ची छुपा लेता है, सब ठीक है डॉक्टर है बोला, सबको जाकर फिर कहता है। ना कोई उसकी फिक्र है करता, ना कोई रखता उसका ध्यान, अक्सर ही तो सिर्फ जरुरत पर ही, होता है उसका सम्मान। बारिश हो या फिर धूप कभी, दिन हो या फिर रात घनी, बेहिचक ही निकल पड़ता है, वो चाहे हो कोई आगजनी। आम आदमी का जीवन, जैसे कोई हलाहल पीना है, जीवन के संघर्ष अनेकों संग, घुटघुट कर ही तो जीना है। Pari ✍️ 

Pari की कल्पना "परिकल्पना"

मैं लिखू जो कुछ तो तुम उसे सिर्फ तारीफ न समझना, दिल की बात होठों से कहो, यूँ बस आहें न भरना। थोड़ी देर से भले लेकिन मुलाकात तो होगी ही जनाब, पूरा न हो ऐसा दुनिया में, होता नहीं है कोई ख्वाब। न कोई किस्सा था न ही कोई कहानी थी, मोहब्बत तो होनी ही थी, छायी जो जवानी थी। सर्द हवाओं के मौसम संग लाये मोहब्बत की गर्माहट, लौट आये हम पास तुम्हारे, अब गले लगा लो हमें फटाफट। दिल से सोची हुयी हर मुराद कुदरत अक्सर निभाती है, सच्चे दिल से हो अगर मोहब्बत तो मुलकात भी हो ही जाती है। किया था बयाँ शब्दो में, तेरी यादों और तेरी कमी दोनो को, कुछ समझे और चुप रह गए, बाकी तारीफ में वाह वाह कर गए।। यूहीं नहीं है तनहा हम, तेरा इंतजार आज भी है, तू कहां कैसी है खबर न सही, तेरा ख्याल तो आज भी है। दिल में मलाल आज भी है, तेरा ख्याल आज भी है, वादा था तुझसे मिलने का, वो सवाल आज भी है। भूल जाएं तुम्हे हम, या फिर अभी और इंतज़ार किया जाए, तुम ही बताओ "Pari" आगे और क्या किया जाए। Pari ✍️ 

पिता का जीवन आसान नहीं..!

भाव जागते है मन में, लेकिन शब्द सटीक नही मिल पाते है, सब को साथ लेकर चलते है, फिर पिता को क्यों भूल जाते है। माना थोड़ा दूरी है उनसे, लेकिन सबसे अधिक विश्वास वहीं है, अनेक कष्टों को दबाकर, मुस्कान चेहरे पर लाये वही पिता है।। शब्दो मे शख्ती है उनके हरदम, क्योंकि फिक्र है सबकी पल पल, अंदर से कोमल पर कठोर दिखावा, प्यार पिता का है निश्छल। राह कठिन है चलना मुश्किल, लेकिन फिर भी धैर्य रखे जो, आये कितने आंधी तूफान, संयम बनाये रखना पिता से तुम सीखो।। चाहे कितने दोस्त बना लो, बनालो चाहे कितना दौलत शोहरत, मिले सुकुन जिस छांव में तुमको, मिलेगी बस वो पिता के घर पर। खुद से तुम एक सवाल कर लेना, पिता का जीवन तुम खुद जी लेना, कितना भार है कंधो पर, खुद उठा कर फिर तुम तुलना करना।। बहुत ही आसान जान पड़ता है, जीवन किसी पिता का जग में, चिन्ता फिक्र से हटकर जैसे, सुकून भरा हो सारा जीवन। कैसे कैसे मौसम आये फिर, कैसा तुमने वक़्त है देखा, कितने पतझड़ मौल्यार है देखे, न जाने कितनी बरसातें है देखी। खुद को डुबाकर उलझनों में, परिवार सुरक्षित हैं रखते, भरा हो गला या दिल टूट चुका हो, शिकन माथे पर न ...

दोस्त, जो चश्मा लगाती है...!

हल्का हल्का मुस्काती है, जब वो मुझसे बतियाती है, कहते कहते रुक जाती है, जाने फिर क्या सोचती है। बातें उसकी खतम न होती, बस जाने क्या वो कहना चाहती है, अरे हां एक बात बताना भूल गया, दोस्त मेरी चश्मा लगाती है। गाल हैं गुलाबी और आंखें शराबी, जुल्फों को खुला ही रखती है, कहते कहते भूल है जाती, फिर थोड़ा सा तब वो इठलाती है। थोड़ी सी वो नटखट है और मन को मेरे बहुत ही भाती है, हां वही मेरी दोस्त, प्यारी सी ....जो चश्मा लगाती है। चलते चलते रुक जाती है, फिर जाने क्यूं पीछे मुड़ जाती है, पसंद है उसको चटपट खाना, किस्से फिर वो सभी सुनाती है। सुबह से लेकर शाम की वो, बड़े ही चाव से मुझको बताती है, हां वो मेरी दोस्त, सही समझे आप...जो चश्मा लगाती है मन की है स्वाणी वो, प्रेम उसका निश्छल, आली जाली नहीं लगाती है, पूर्ण है समर्पण, प्रेम उसका पवित्र, पूर्णता से पहचानी जाती है। पल पल देखूं उसे, निहारूं चारों पहर, आंखों में समा मेरे जाती है, प्रेम की है परिभाषा मेरी वो दोस्त, जो आंखों में चश्मा लगाती है।। Pari✍️ 

अब न कोई ख्वाब सजाएंगे

ख्वाब सजाए थे मैंने भी, लेकिन हर एक चकनाचूर हुआ, जिस जिस को दिल में बसाया, हर एक मुझसे दूर हुआ। खुशियों की थाल सजाकर, कोशिश की थी परोसने की, ठोकर मार मुझे दूर कर दिया, कोशिश रही मुझे गिराने की।। हर एक बंधन टूट गया, वह मेरा मुझसे रूठ गया, लाख कोशिशों के बाद भी, जन्मों का रिश्ता टूट गया। पल पल कोशिश थी जिसके संग, सपनों की दुनिया बसाने की, राहों में काटें बिछा, फिर कोशिश की उसने मुझे मिटाने की। मेरा अपना गुरूर भी टूट गया, जब सबसे अजीज छूट गया, क्या दिन क्या रात भी अब तो, जैसे गमों से रिश्ता जुड़ गया। मैं भला अब क्या ही करता, जब ठान ली उसने दूरी बनाने की, परत दर परत तोड़ा मुझको, थी कोशिश शायद मुझे राख बनाने की। चलो तुमने अगर कह ही दिया, हमने भी भ्रम पालना छोड़ दिया, सांसों की डोर तोड़कर, दुनिया को अलविदा बोल ही दिया। अब न रहेगी शिकायत तुम्हें, न जरूरत पड़ेगी हमसे मिलने की, जाओ अब आजाद हुए तुम, जी लेना ज़िंदगी अपनी मर्जी की। आखिर में बस एक सवाल रहेगा, जरूरत नहीं है उसे भी बुझाने की। क्या कमियां थी मुझमें ऐसी, उम्मीद नहीं थी जिन्हें मिटाने की। जाओ तुमको एक सवाल दिया है, जरूरत नहीं है जवाब बत...

होली आई फिर पहाड़ म

 बसंत फिर बॉडी ए ग्याई, दगड़ी म स्वाणु मौल्यार लाई, खिलनी फूल डाली मौली गैनी, धरती थै स्वाणी बणाई मौ (माघ) फर्की फाल्गुन बॉडी, पंचमी मनै अब होली आई। गितेरू का गीत अर ढोलक की‌ थाप से सारू पहाड़ गूंजी ग्याई। फ्यूली खिली बुरांश खिलनी, मेलू-पयां मौली गैनी, गैल्यो दगड़ी गैल्या सभी रंगू मा रंगमत ह्वेनी  याद करी इसकुल्या दिन, मुखड़ी मेरी भी खिली ग्याई, हाथ म गुलाल लेकी, मुखड़ी विंकी मिन पिंगली काई। हैरा बण..फूलों की खुश्बू, डांडियों मा बुरांश की भौंण, पिंगला फूल लया खिलिगे, इन मा मन उदास कन‌मा रौण। फौजी भेजी की जग्वाल अर जरा जरा की आस हम भी, ऐगे बसंत ऐगे मौल्यार, आओ मिली खेला होली सभी। खुद कैकी मन म बसीं, क्वि कनु कैकी जगवाल, पधनी बॉ भी सारा लगी, भाईजी आला घौर  भ्वाल। क्वि ख्यालु का खूयूं कैका, कैक मन रे ग्या मलाल। मेरी भी आस बस आस रै, अर हाथुम कैका नौ कु गुलाल। Pari✍️