गलती हर बार मेरी ही

क्यूं भला मैं बदला सा दिख रहा, क्यों मेरा मिजाज बिगड़ा,

सवाल था उसका फिर वही, काश उसने पूछा होता खुद से कभी।

मैं दुनिया से लड़कर भी उसी का था, वो एक खुद से भी न लड़ सकी,

फिर भी मैं गलत मेरी गलती, वो तो बस मासूम ही रही तब भी।


मैं जितना पास जाने की कोशिश करूं, वो दूर दूर हो जाती है,

मेरी चाहत को वो न जाने, क्यों खुद से ही ठुकराती है।

आज मोहब्बत है उससे मेरी, वो दूरी बनाने लगी है न जाने क्यों,

मैं बदल गया अगर तो, फिर सवाल होगा कि तुम ऐसे क्यों।


यकीनन मर्द ही गलत होता है, ऐसा नज़रिया है जमाने भर का,

लेकिन ख्वाइश तो होती है, कुछ तो अधिकार होंगे न उसके भी।

बस बहाने बना वो अलग हो जाते हैं और दोष फिर वही हम पाते हैं,

शायद हम भी गलत हों, क्योंकि स्वयं के अधिकार की बात करते हैं।


ए मर्द तेरी कोई औकात नहीं है, तू बस पिसने को मात्र आया है,

तू निभाता रह फर्ज अपने, और खो जाना फिर कहीं जहां में।

तेरी चाहत बस दबी रहेगी, तू बस पिसते ही रहना चक्की में,

और फिर हो जाना गुम ढूंढ कोई बिल दुनिया की मस्ती में।।

Pari✍️

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