पिता की प्रीत, छुपी रहने की रीत

टीस मन की वो मन में रह गयी,
बात पूरी न हो सकी अधूरी रह गयी।
मैंने सोचा था अब दिन खुशहाल हो गए,
लेकिन हम आज भी जस के तस रह गए।

गर्भवती हुई स्त्री, सबको सहर्ष ज्ञात हो था चला,
फिर क्या था हुआ शुरू बधाईयों का सिलसिला।
नौ महीने सबको तब स्त्री का संघर्ष दिखा,
पुरुष तो बस चहुं ओर मुस्काता दिखा।


इसमें कोई संशय नहीं,
कि कष्ट मां ने सहा जीवन सृजन के लिए।
लेकिन पिता-पति की दशा सबसे छुपी रह गई,
सबने दिलासा दिया मां को और खुशी घर आयी।

पुरुष की विडंबना भी क्या है जानो अगर,
जच्चा बच्चा की से साथ साथ है उसे फ़िकर।
पलभर को भी कोई हाथ कंधे पर न रहा,
जाने कैसे वो खुद ही खुद संभलता रहा,

कशमकश में दिन बीते, दिलासा पत्नी को देता रहा।
कन्या जन्म से हुआ अलंकृति, तब जाकर शांत हुआ।
खुशियों की जैसे बारिश हो गयी,
आंखें नम थी हुई जैसे स्वर्ग की प्राप्ति आज हुयी।

स्वपन जैसे आज सरोकार हो गया,
एक पिता को बेटी का वरदान मिल गया।
छोड़ हर काम बस प्रेम बिटिया का था,
उसकी परवरिश को लेकर कभी थकता न था।

सारी खुशियां न्योछावर थी आंखों का सुकून था,
बेटी की ही खुशी में अब तो संसार था।
हुई वो सयानी तो विवाह की सोच होने लगी,
खुशहाल मिले परिवार कामना पलने लगी।।

फिर समय आ गया उसके कन्यादान का,
भारी मन से था करना उसे स्वयं से जुदा।
एक एक लम्हा जैसे बीतता गया,
कदम हर एक अब भारी होता गया।

पग पग चला पैदल ही वो सदा,
सेहत बनी रहेगी का बनाकर बहाना।
सच था क्या वो बस वही जान पाया,
पाई पाई जोड़ एक पिता ने.. कन्यादान आज किया।।

थी जो ममता मां की सबको सहज ही दिख गयी,
प्रेम पिता का सबसे सदैव छुपा रह गया।
कठोरतम दिखा पिता सदैव ही pari,
बेटी बिदा जब हुई, आशुओं का सैलाब भी छुपा रहा।।
Pari

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