दोस्त, जो चश्मा लगाती है...!
हल्का हल्का मुस्काती है, जब वो मुझसे बतियाती है,
कहते कहते रुक जाती है, जाने फिर क्या सोचती है।
कहते कहते रुक जाती है, जाने फिर क्या सोचती है।
बातें उसकी खतम न होती, बस जाने क्या वो कहना चाहती है,
अरे हां एक बात बताना भूल गया, दोस्त मेरी चश्मा लगाती है।
गाल हैं गुलाबी और आंखें शराबी, जुल्फों को खुला ही रखती है,
कहते कहते भूल है जाती, फिर थोड़ा सा तब वो इठलाती है।
थोड़ी सी वो नटखट है और मन को मेरे बहुत ही भाती है,
हां वही मेरी दोस्त, प्यारी सी ....जो चश्मा लगाती है।
चलते चलते रुक जाती है, फिर जाने क्यूं पीछे मुड़ जाती है,
पसंद है उसको चटपट खाना, किस्से फिर वो सभी सुनाती है।
सुबह से लेकर शाम की वो, बड़े ही चाव से मुझको बताती है,
हां वो मेरी दोस्त, सही समझे आप...जो चश्मा लगाती है
मन की है स्वाणी वो, प्रेम उसका निश्छल, आली जाली नहीं लगाती है,
पूर्ण है समर्पण, प्रेम उसका पवित्र, पूर्णता से पहचानी जाती है।
पल पल देखूं उसे, निहारूं चारों पहर, आंखों में समा मेरे जाती है,
प्रेम की है परिभाषा मेरी वो दोस्त, जो आंखों में चश्मा लगाती है।।
Pari✍️
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