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Showing posts from July, 2020

मेरी पसंद मेरा गाँव

लौट आया हूँ जो घर को अपने, बड़ा सुकूँ महसूस करता हूँ, जिस माटी में जन्म लिया, आज उसी में बैठ जब खाता हूँ। देख निराली छटा देवभूमी की, मैं पुलकित हो उठता है, खेलना, बोलना, चलना सीखा, जहाँ जन्म मैं पाया हूँ। शुद्ध हवा और ताजा पानी, चौमास की वो हरियाली, फ्यूंली-बुराँश और फूल बुग्याल, खिल्या मेलु की खुश्बू निराली। आरू, खुबानी, माल्टा नारंगी, तिमला, काफल की गज्ज डाली, सौंण भादो की बरखा रुमझुम, डान्ड्यू लॉकदी वा कुयेडी। दादा दादी का प्यार दुलार, माँ पापा की झूठी फटकार, कहने को सब था शहर में, बस इसी की थी दरकार। न अपनापन मिला कभी, न अपनों का साथ शहर में, हो सके तो तुम भी लौटो, जीवन ढूंढ़ो अपनी जड़ों में।। राह कठिन है अब माना, लेकिन संभव है कर पाना, थोड़ी मेहनत जरूर है लेकिन, आजादी को खुलकर जीना। परी कलम बस इतना कहती, नहीं शहर अब है मुझको रहना, जीवन का मर्म है खुशी, जिसे मैंने बस गाँव मे है जाना।। pari Love is life......Love is god....Love is everything

मेरा जन्मस्थल, देवभूमि उत्तराखंड

सर्द हवाओं का होता है सिलसिला, मौसम एक सा रहता है हर जगह, देवताओं का निवास है जहाँ, देवभूमि नाम से प्रसिद्ध है वह जगह। प्रकृति का अनूठा है संगम, होते हैं यहाँ अक्सर चमत्कार, चेहरों में मासूमियत है होती, रहता है दिलों में सबके प्यार। दुनिया मे सब करते है भरोसा, और रखते है सुलझा व्यवहार, ऐसी है पहचान मेरी और ऐसी है मेरी जन्मभूमि मेरे यार। जीवनदायनी गंगा का उदगम, है बद्रीविशाल का यहां निवास, पार्वती संग भोलेबाबा नाम केदारनाथ करते है जहां वास, नरसिंह, घंडियाल, भूम्या और भैरों देते शुभ आशीष, नमन मेरा सदा देवभूमि तुझे, झुकता है मेरा तुझमें शीश।। क्या गाँव और क्या बाजार, मनते हैं यहां रोज त्योहार, देवता जहाँ रहते प्रतिपल, कराते रहते एहसास हर बार। बारह महीनों यहाँ ऋतु बसंत, आ जाता है चेहरे पर मौल्यार, आओ तुम भी देवभूमी दोस्तो, मिलेगा अतुल्य यहाँ सबको प्यार। ©®प्रदीप पोखरियाल (pari) Love is life......Love is god....Love is everything....

प्रेम भाव जीवन सार

समय का खेल सिर्फ समय जान सकता है, नियम कानून भी वह खुद ही तय करता है। कब, कहाँ, क्यूँ, कैसे और क्या क्या होगा, इसका निर्णय भी सिर्फ समय ही करता है।। खुद को अजय जानने वाले, कब्रों में दफन हो गये, दुनिया पर हुकुमत करने वाले, शमशानों की राख हो गये। इतना सब कुछ देख भाल कर, अब भी मानव अबोध बना है, इससे ज्यादा हँसी ठिठोली, समय की और क्या हो सकती है।। घर त्याग दिया, रिश्ते तोड़े, बिन्डया खाने को फिर घर छोड़े, देश-परदेश को चले गये, विलासिता में अनेकों दिल तोड़े। समय का फिर फेर हुआ, खालीपन का फिर तुम शिकार हुये, न फिर दौलत रास आयी, विलासिता भी आज डराने लगी।। हे मानव तू अब भी समझ, तू चाबी का बस खिलौना मात्र है, कितना भी ऊंचा उड़ ले, अंत में तो बस जमीं पर तेरा वजूद है। परी की बात बस इतनी सी है, समझ सके तो समझ लो यारो, प्रेम भाव ही जीवन का सार है, इससे ही ये जग संसार है।। ©®Pari