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Showing posts from January, 2026

Pari की कल्पना (परिकल्पना)

यूहीं तो होती नहीं होगी बरसात सावन में, किसी कहानी में इसका भी कोई किस्सा होगा। भरी आंखों से नीर बहते होंगे आसमां के शायद, टूटा जब दिल कोई उसका हिस्सा होगा.. मैं कहूं कि तुम पहली हो, तो ये झूठ हो भी सकता है, लेकिन तुम्हारे बाद अब कोई और हो नहीं सकता। तुमसे है मोहब्बत इतनी मेरी जान अगर यकीं मानो तो, तुम्हारे बाद और कोई मेरी मोहब्बत पा नहीं सकता। बताओ ताउम्र उसके एक शब्द के लिए तरसता रहा, कि कहे क्यों फिक्र करते हो तुम पूरी दुनिया की .. मैं हूं ना तुम्हारे साथ क्यों फ़िक्र तुम्हें किसी और की जब मेरा साथ और एहसास है तुम्हारे पास... हर एक बार निराली है, हर मुलाकात निराली है, जब जब मिला तुमसे, एक एक मुलाकात निराली है। बातों से तुम सहज भले, लहजा तेरा कुछ और ही है, चेहरा तेरा फूल सा कोई, निगाहों की झलक कुछ ही है। Pari✍️ 

प्रेयसी या हो तुम पत्नी या फिर दोनों.?

प्रेम की है अनुभूति अटल, प्रेम है जिसका संपूर्ण निश्छल, पत्नी है वो या प्रेयसी बताओ, बहता है जिसका प्रेम अविरल। मानव जीवन का अनूठा वो संगम, करती आहें उसकी कलकल, स्वयं तो है जैसे ठहरी वो, पर बहता है प्रेम उसका जैसे कोई जल।। प्रथम चुंबन हो उसका चाहे, या हो प्रथम उसका आलिंगन, ठहरा है मेरा तो प्रतिपल, न जाने क्यों उसपर ये मन। आभास हो उसके होठों का या उसका वो कोमल सा बदन, एहसास है मुझको आज भी लेकिन, उसका वो सादा भोलापन। आंखों की वो सकुचाहट और होठों की भीनी मुस्कान, बारिश की वो मोटी बूंदे और उसमें उसका वो सूखापन। आंखों में शर्म थी उसके और बदन में थी कोई जैसे सिकुड़न, रह गया था देखते ही उसको, आ गया था उसपर मेरा मन। प्रेम का वो आभास था पहला, पहली हो जैसे सावन की बारिश, भीनी भीनी बूंदे वो ऐसी, जैसे की हो मैने कोई ख्वाइश। क्या था वो मै समझ न पाया, प्रेम था उसका या मेरी आजमाइश, जो भी था जैसा भी था, लेकिन पूर्ण हुई मेरी एक ख्वाइश। अलग ही थी वो अनुभूति उसकी, अलग ही था वो अपनापन, अलग नशा था उसका मुझको, अलग ही था वो मेरा लड़कपन। कौन थी वो कहां से थी आई, जैसे भेजी हो कोई पारियों की रानी, एक बार तो सोच...

एक दोस्त बड़ी निराली है...!

थोड़ी नटखट थोड़ी भोली भाली सी, एक दोस्त है मेरी बड़ी निराली सी। अक्सर वो मुझसे मिलती है मन की अपने सब कहती है थोड़ा है गुस्सैल भले, लेकिन मुस्कान भी उसकी प्यारी है। एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। अभी मिला हूं उससे, बस कुछ दिन का है साथ हमारा, फिर भी ऐसे मिलती है जैसे सालों का हो कोई नाता प्यारा। व्यवहार उसका बड़ा सादा है, जैसे है वैसे दिखती है, मस्त मौला है उसका मन, खुलकर वो जीवन जीती है एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। कभी सताती, कभी बताती, कभी वो गुमसुम सी हो जाती। फिक्र है करती न जाने किसकी, लेकिन चेहरे को शांत है रखती। इधर उधर की नहीं है करती, लेकिन खबर वो सबकी है रखती, स्वाद है उसकी बातों में, करती बातें वो मतवाली है, एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। एहसास है उसको जिम्मेदारी का, रिश्तो में रखती है तालमेल, किससे कैसे रहना है, कौन है कैसा, जानती दुनिया के है सारे खेल। अंदर बाहर का समन्वय, रखती सब जग से है पूरा मेल, गोरे रंग का उसे भ्रम नहीं, स्वयं रंग में थोड़ी काली है। मेरी एक दोस्त बड़ी निराली है। Pari✍️

गलती हर बार मेरी ही

क्यूं भला मैं बदला सा दिख रहा, क्यों मेरा मिजाज बिगड़ा, सवाल था उसका फिर वही, काश उसने पूछा होता खुद से कभी। मैं दुनिया से लड़कर भी उसी का था, वो एक खुद से भी न लड़ सकी, फिर भी मैं गलत मेरी गलती, वो तो बस मासूम ही रही तब भी। मैं जितना पास जाने की कोशिश करूं, वो दूर दूर हो जाती है, मेरी चाहत को वो न जाने, क्यों खुद से ही ठुकराती है। आज मोहब्बत है उससे मेरी, वो दूरी बनाने लगी है न जाने क्यों, मैं बदल गया अगर तो, फिर सवाल होगा कि तुम ऐसे क्यों। यकीनन मर्द ही गलत होता है, ऐसा नज़रिया है जमाने भर का, लेकिन ख्वाइश तो होती है, कुछ तो अधिकार होंगे न उसके भी। बस बहाने बना वो अलग हो जाते हैं और दोष फिर वही हम पाते हैं, शायद हम भी गलत हों, क्योंकि स्वयं के अधिकार की बात करते हैं। ए मर्द तेरी कोई औकात नहीं है, तू बस पिसने को मात्र आया है, तू निभाता रह फर्ज अपने, और खो जाना फिर कहीं जहां में। तेरी चाहत बस दबी रहेगी, तू बस पिसते ही रहना चक्की में, और फिर हो जाना गुम ढूंढ कोई बिल दुनिया की मस्ती में।। Pari✍️

तुम बस एक एहसास हमारा

सोचा कि लिखें कुछ तेरे बारे में भी आज हम, फिर कलम तोड़ दी हमने और मुस्कुरा दिए। तेरे लिए जो एहसास है मेरे दिल में हमेशा से, वो बस महसूस करना है, इसलिए उसे शब्द नहीं दिए। वो मुलाकात पहली, वो बात तुमसे पहली, वो मुस्कुराना तेरा, वो झुकी नजरे तेरी पहली। वो तेरा शर्माना मुझसे, वो अदाएं तेरी सब निराली, बड़ी मासूम सी दिखती थी, वो तुम बिलकुल भोली भाली। याद है मुझे तुम्हारी वो घबराहट, डर डर के बातें करना, जानती थी तुम सब, फिर भी मुझसे दूर दूर रहना। मन तुम्हारा भी मिलने को करता था, लेकिन रोज एक नया बहाना, यूंही तुम रूठ जाती थी तब, और भी जल्दी तेरा मान जाना। वो फिर मुलाकातें बढ़ी हमारी, वो मिलन की चाहतें हमारी, तुम थी बंदिशों में तब भी, और पास आने की जिद्द वो हमारी। बस एक पैगाम तेरा फिर आता, कि क्यों तुम्हें यार समझ नहीं आता, वो चिट्ठी से समझाना तुम्हारा, और तुम पर मुझे फिर और प्यार आता।  वो आखिरी बात तुमसे, वो आखिरी मुलाकात तुमसे, वो आखिरी वादा तुमसे, वो फिर न मिलने की बात तुमसे। वो भीगी आंखे तुम्हारी, वो भारी कदमों से बिछड़ना तुमसे। वो आखिरी चुम्बन तेरे गालों का, वो आखिरी गले लगना तुमसे। सच...