सब कुछ सबको नहीं मिलता

लाख कोशिश करो तुम, फिर भी कुछ तो अधूरा रह ही जाएगा,
सब कुछ करने की चाह में, कुछ तो पीछे छूट ही जाएगा।
जो मिला है उसका लुफ्त उठाओ, वही तुम्हे खुशियां दे जायेगा,
सब कुछ की चाह में एक दिन, सब कुछ ही मिट जाएगा।।

एक फूल खिला था उपवन में, सुंदर था सबसे वो वन में,
गुरूर था उसको खुशबू पर, भंवरे की उसपर चाहत में।
एक रोज वो फिर मुरझा गया, भंवरा उड़कर दूर चला,
कब सूखे फूलों पर भौंरे टिकते हैं, उपवन देख अब मुस्कुरा रहा।।

सावन की बदली छा जाती है, चहूं ओर बसंत ले आती है,
देख मौसम की रंगत को, चिड़िया भी निशदिन चहकती है।
सावन भी एक दिन खत्म हुआ, पतझड़ को जैसे उसने न्योता दिया,
समय की अदला बदली को, फिर सावन ने भी प्रणाम किया।

मानव का भी बस ऐसा जीवन है, कुछ पा लेता है कुछ खो जाता है,
लेकिन खोने पाने में क्या, वह संघर्ष कहीं करना छोड़ देता है।
हर वक्त वह लड़ता है हालात से, फिर जीत का सेहरा सिर होता है,
ज्यादा की तो चाह हमेशा रहती है, लेकिन थोड़ा भी कुछ कम नहीं होता है।।

कह भी जाओ और अगर कर भी जाओ, भुलाये तुम फिर भी जाओगे,
लाख बना लो महल मकान, राख में ही आखिर फिर मिट जाओगे।
तेरा मेरा कर लो कितना, बालक परिवार बनाओ भले जितना,
चाहे रखो लाखों दरवान, बचा नहीं पाता फिर यारो आ जाए अगर फरमान।।
Pari ✍️ 



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