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Showing posts from August, 2018

बहुत हो चला अब सब्र

शब्द नही मिलते है कभी कभी, समझ नही आता कहाँ से शुरू करू, कलम भी मेरी रुक जाती है अक्सर, होती है जब इंसानियत शर्मसार। कैसे चुप रह जाऊं मैं भी आज, कैसे सिर्फ निंदा तक सीमित हो जाऊं, अभी ज़िंदा है जमीर मेरे अंदर, कैसे बहनों पर अत्यचार सह जाऊं। खुले घूम रहे भेड़िये अब भी, चुप बैठी है फिर क्यों सरकार, बना चुके कानून अगर तुम, फिर क्यों जिंदा हैं वो मक्कार। सिर्फ कहने भर को बात कही, या फिर उठेंगें कोई ठोस कदम, अभी बनाकर सब्र है हम भी, समय से कर दो अब इंसाफ।। देर लगी तो हम देर न करेंगे, फिर जो समझ आये वही करेंगे, चुप बैठे है कमजोर न समझना, हमको फिर लाचार न समझना। फिर होगा इंसाफ धरा पर, बीच सड़क पर फैसले होंगे, नहीं जरूरत कानून की रहेगी, भेड़िये फिर कफन में होंगें।। जाग उठो अब हिमालय के बीरो, उठा चलो फिर खड्ग हाथ मे, समय आ चला अब निर्णय का, गर्दन काटो महिसासुर की, नही तो धरती कांप उठेगी, भीषण इसमें ज्वार उठेगा। तांडव नृत्य फिर शिव करेंगे, काली दुर्गा संहार करेगी।। राग अलापना अब बंद करो, कयास लगाना बंद करो, छोड़ फ़िक्र अब सिर्फ अपनी, माँ बहनों के लिये घर से निकलो। नहीं जरूरत कान...

अटल धरा का अटल रत्न

बहुत ही ब्याकुल हूँ मैं आज, स्तब्ध निशब्द हूँ मैं आज, शब्दों से कीर्ति लिखी कभी, किया अनेकों बार गुणगान फिर भी खुद को बेबस जानकर, सोचता हूं कैसे करूँ तुम्हें प्रणाम, अंत हुआ है आज एक युग का, हे अटल तुम रहोगे सदा महान।। दृढ़ संकल्प था मन मे सदा, किये काम आपने बहुत महान, पोखरण हो या कारगिल युद्ध, देशहित मे करते थे काम। बसुधैव कुटम्ब को बना मूलमंत्र, फैराया दुनिया मे परचम, जन जन के मन मे थे आप, आज कर गए सबकी आंखे नम।। सत्ता मोह नही किया कभी, जिये हमेशा अटल नियम से, साथी संग विरोधी भी जिनको, मानते थे आदर्श हरदम। ऐसी हस्ती ऐसा व्यक्तित्व, नहीं मिलेगा आगे फिर से, अटल सत्य थे अटल ईरादे थे, तुम रहोगे दिलों में हरदम।। नहीं मिल रहे शब्द आज, कैसे लिखुँ महान सख्शियत को, नम आंखें है हाथ काँपते, नही कागज पर चलती है आज कलम। ऐसी क्षति हुई धरा पर, जिसका पूरा होना नहीं मुमकिन, आप अटल थे अटल रहोगे, अमर रहो हमारे भारतरत्न।। सादा जीवन निर्मल वाणी, मधुभाषी शब्दों के ज्ञानी, सरल था जीवन सदा ही उनका, हर इंसान को प्रेरणादायी। छोड़धरा को सदा के लिये, निकल चला देश का अनुयायी, श्रद्धा सुम...

स्वतंत्रता दिवस की महक

राह नहीं आसान थी वो, फिर भी खुद को तैयार किया, काँटों से पथ था भरा हुआ, फिर भी मुस्कुरा चलने का निर्णय किया। लेकर जान को हाथों में तब, देशहित को अपना कर्तव्य बना लिया, लाखों कुर्बानियो का फल था यारों, यूँही नही आजादी का पुष्प खिला।। लाखों जिंदगियो ने दाव था खेल, लगा हुआ था मौत का मेला, मिलनी थी आजादी जीत में, हार गये तो जान थी जानी। नही फिक्र अंजाम किये फिर, खेल सबने जी जान से खेला, किसी ने सुख चैन गवाया फिर, तो किसी ने गवा दी थी जवानी।। रात दिन का होश नही था, न फिक्र थी कोई जीवन जीने की, मिला हाथ फिर सब देशभक्तों ने, पाने आजादी की कसम थी खानी। नहीं था कोई धर्म का पहरा, बस राह पकड़ी थी अब देशधर्म की, तोड़ दीवारें रिस्ते नातों की, अब निकल पड़े सब स्वराज दिलाने।। न जाने कितनी माँगे सूनी हुयी, न जाने कितने बच्चे अनाथ हुये, पाने स्वराज को अपना यारो, न जाने कितने मा बाप बेसहारा हुये। जरा संभाल कर रखो इसे, बहुत ही महँगी मिली बिरासत, प्रेम भाईचारे संग रहो मिलजुल, कहीं खो न जाये ये सौगात जय हिन्द जय भारत Pari ©   ® Pari.... Love is life......Love is god....Love is...