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कर्मों का फल

प्रकृति को दे रहे दोष, अपने कर्म नहीं देख रहे, वाह रे मानव कैसा है तू, मतलव का भंडार भरा, दोहन करता नित प्रकृति का, न कभी ख्याल रखा, अब जब लगी चोट तो, फूट फूट क्यूं तू अब रो रहा।। मन की मंशा रखकर मन मे, दिखावे का खेल चल रहा, नियत में भरकर लोभ, बात परोपकार की कर तू रहा। खुद को जानकर सबसे ज्ञानी, सबको मूर्ख समझ रहा। नहीं चलेगा ये चरित्र तेरा, क्यों पापों को सजों रहा, पिया दूध जब गाय तो फिर, बछड़े का क्यों त्याग किया, बिन बछड़ों के जग मे मानव, गायों का क्या अस्तित्व रहा। समय बदल जब कल आएगा, कर्मो को सामने लाएगा, बेकाम हो चले मानव को भी, बस तिरस्कार मात्र मिलेगा। पेड़ काटे अनंत तो फिर क्यों नव पौध का न ख्याल किया, माना थी जरूरत तेरी, भविष्य का क्यों ख्याल न आया, आज की ख्वाइश पूरी कर दी, कल का न ख्याल रखा, अब जब मुसीबत आन पड़ी, फिर क्या तू अब कर है सका।। क्या लेकर आये थे जग में, क्या लेकर फिर जाना होगा, कर्मो की गठरी के अलावा, सब यहीं बस त्यागना होगा। फिर न मिलेगा मौका दूजा, भोगना तब कर्मों को होगा, परी की कल्पना बस इतनी सी, निष्पाप जहाँ में रहना होगा। Pari ©   ®...