उठाओ तलवार फिर रानी लक्ष्मीबाई
कैसे चुप हम रह सकते हैं, कैसे सब चुप सह सकते हैं, खुद को सिहँ बताने वाले, कैसे हम सहम सकते हैं। नारी प्रधान नारी सम्मान, सिर्फ नारों तक सीमित होगा क्या? बड़ी बड़ी बातों से ही, निर्भया को इंसाफ मिलेगा क्या? परंपरा सी बनती जा रही, दो दिन कैंडल मार्च निकालने की, फिर सब भुला देते हैं, जैसे पूरी हो चली हो ज़िम्मेदारी सी। इंसाफ मांगना आदत है, इंसाफ करने की आदत डालनी होगी, नारी के सम्मान के लिये, रानी लक्ष्मीबाई सी हुंकार लगानी होगी। स्वयँ हमे ही लड़ना होगा, हाथोँ में तलवार लिये, शीश धरा को चढ़ाने होंगे, सभी धरा के कातिलों के। बहुत खेल लिया धर्मनिरपेक्ष का खेल, बहुत बन लिए सेक्युलर, हम जैसे थे वैसे अच्छे, अब धर ला दो अत्याचारियों का सर। विनम्र निवेदन है मेरा आज, कानून के सब रखवालों से, छोड़ दो पैरवी करना अब तुम, अपनी माँ बहनों के कातिलों के। एक जुट होकर अपनी पहचान बताओ, सजा दिलाओ उन बेरहमो को, जिनसे लज्जित हो रहा समाज, फाँसी पर लटकाओ उन हरामियों को। pari