सहज जीवन का सत्य अटल
मुश्किल थोड़ा होता है, दूर कहीं घर से रहना,
विपरीत परिस्थितियों मे दुःख पड़ता है सहना।
चारों पहर तुम स्वयं निर्णय करते हो रोजाना,
अंत में सोचते हो क्या ही मैने खो और है पा लेना।।
रात गुजरती है करवट बदले, नींद नहीं आंखों में होती,
दिन के चारों पहर तो बस, दौड़ भाग ही हिस्से आती।
न खाने का कोई समय है, न पीने का ही समय है मिलता,
12 महीने सातों दिन, बस चरखा है वो चलता।।
घर छोड़कर निकले थे, सपने लाखों आंखों में बसाये,
जी तोड़ की थी मेहनत हमने, करने पूरा जो सपने थे सजाये।
साल बीत गए अनेकों लेकिन, सपने सारे अधूरे रह गए,
रेत से बनाए थे घर जैसे, बारिश आयी और सारे बह गए।।
गाँव छोड़कर शहर गए, सुकून नहीं फिर भी पाया,
जो था गौरव गाँव में, शहर पहुंच उसे भी गवाया।
बड़ी देर से समझ मिली, वक्त गवाकर फिर अक्ल बढ़ी।
सालों के संघर्ष के बाद भी, ज़िन्दगी जस के तस थी पड़ी।।
अब सपने बेचकर हक़ीक़त खरीद रहा, झूठे झांसों से बाहर निकल रहा,
देखे थे जो सपने जीवन में, सपनो से उन अब बाहर निकल रहा।
अब तो बस नियति अपना रहा हूं, जो चाहे वह उसे हकीकत जान रहा हूं।
अब तो समय के बहाव में बह जाना है, सहज मान जीवन स्वीकारना है।।
Pari ✍️
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