Posts

Showing posts from September, 2025

वो सब ढूंढते हैं तुझे

वो बूढ़ी आंखे खोजती है तुझे, वो कांपते हाथ सहारा चाहते हैं तेरा, वो कंपकपाते शब्द पूछते हैं, कहां है वो जो हुआ करता था मेरा। वो झुकी पीठ सहारा चाहती है, वो थके पांव आराम ढूंढते हैं, वो सूना आंगन, वो खाली क्यारियां, वो मील का पत्थर, वो गांव का बस स्टॉप..सब ढूंढते है तुझे.. वो पहली क्लास स्कूल की, वो बस्ता किताबों का, वो पहली प्रार्थना ईश्वर की, वो पहली प्रतिज्ञा देशप्रेम की। वो कच्छी मिट्टी कक्षा की, वो बिछी चटाई रेशम की, वो श्यामपट, वो गुरुजी का डर, वो खेल का मैदान, छुट्टी की घंटी..सब ढूंढते हैं। वो टूटा हुआ मकान पुराना, वो शाम का ढलना सुहाना, वो सूरज की पहली किरण, वो पक्षियों को चहचहाना। वो डाली पर बैठा मोर, वो पड़ोस से आता बच्चों का शोर, वो गांव की चौपाल, वो बड़ों सम्मान, वो दादा जी का हुक्का, वो दोस्त मेरा गोपाल..सब ढूंढते हैं... वो मकर संक्रांति-मऊ की पंचमी,वो फ्यूंली के पीले फूल, वो चैत्र की खुसफुसाहट, वो होली के गुलाल और उड़ती धूल। वो सावन वो भादो, वो राखी में बहन का इंतज़ार। वो दिवाली, वो इगास-बग्वाल, वो भैलें, वो मित्रों की टोली को मेरी जग्वाल..सब ढूंढते है तुझे। Pari✍️ 

विकास या विनाश? देवभूमि..हो रहा सत्यानाश

 विकास की ताल ठोक, अतिक्रमण हटाने का था बहाना, तोड़ हमारे पुस्तैनी घर बार, न जाने किसे था इनको बसाना। चौड़ीकरण के नाम पर, रोजगार हमारा छीन लिया, अब फ्री का लैमचूस दे रहे और विकास बल तुम्हारा कर दिया। पहाड़ की जवानी और पहाड़ पानी, दोनों को बांध दिया किसने, कौन है तीर्थों को भी पर्यटक स्थल बना दिया जिसने। महायोजना है बल कोई, बद्री केदार धाम को चमकाने की, कौन समझाए इन मूर्खों को, देवों को पसंद है जगह शांति की। विकास के नाम पर योजना चला रहे, साल दर साल पहाड़ उजाड़ रहे, केदारनाथ आपदा से सीख नहीं ली, थराली, धराली को न्योता दिया। बिजलीघर बना अनेक, बादल को फटने के लिये मजबूर था किया। अब भी सुध नहीं ली अगर, फिर भविष्य में पहाड़ आयेगा नहीं नजर। क्या अस्तित्व तेरा बचेगा, क्या सुकून तुझे कहीं फिर आयेगा? बिना पानी पहाड़ क्या भविष्य सुरक्षित रह पायेगा? ऐसे न जाने कितने और सवाल है आने वाली पीढ़ी के, निडर होकर कल तू क्या उस पीढ़ी का सामना कर पायेगा? Pari✍️