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कुछ कल्पनाओं के शहर

 अल्फाज हम बस यूहीं नहीं लिखते, अल्फाज़ो के भी अपने कुछ मायने हैं। हर शख्स कुछ न कुछ एहमियत रखता है आपकी ज़िन्दगी में, जहां में कुछ भी यूहीं नहीं है, कुदरत के रखे ये आयने हैं ..  थक चुका हूँ तेरी बेवजह की नाराजगी से, तुझे इल्म भी नहीं है मेरे दर्द का इस वजह से। यक़ीनन हर बार ये तेरी नादानी हो सकती है, लेकिन छूट जाने के बाद जान क्या वापस आती है?? वो मुस्कुराये सुनकर के बात मेरी, जो कहा न जाने किस हक से हमने उसे अपना, रखी उसने भी बात अपनी फिर कुछ ऐसे, क्यूँ देखते हो भला खुली आँखों से सपना....!! लिखी भी तो क्या उसने कलम से, जो न शायरी बनी न दस्तान ही सुना सकी। बेवजह ही पलटते रहे हम पन्ने किताब के, न कहीं जिक्र मिला न मोहब्बत ही मिल सकी!! मन में कुछ अरमा हैं बाकी, देखो कब फिर पूरे हों.. शायद फिर वो दिन न बदले, शायद फिर ऐसी कोई रात न हों.. न जाने किसकी नजर लगी, कलम कुछ खामोश हो रखी है। न जाने क्या है मन मे इसके भी, लगता है कुछ अनमोल लिखने वाली है.. लिखा था मैंने भी कुछ ऐसा, कि एहसास हो बस उसको ही जिसका। मेरे शब्दों में भले जिक्र नहीं था उसके नाम का, लेकिन हर शब्द में लिखा था पैगाम उसी...