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व्यथा आज पहाड़ की

मन में था उल्लास भरा, पिता प्रेम से ओत प्रोत, बिटिया का है जन्मदिवस, मन जैसे खुशियों का श्रोत। छुट्टी लेकर घर जाना है, बिटिया की खुशियां देखूंगा, साथ बैठकर खाना होगा, चूल्हे पर फिर हाथ सेकूंगा। चल पड़ा फिर खुशमन से, पहुंच गए फिर अपने घर द्वार, क्या मालूम था उसे आज, आंगन में बैठा होगा गुलदार। खुशियां मेरी छीन लेगा, उजाड़ देगा मेरा संसार, बिटिया मेरी नहीं दिखेगी, बन जायेगी वो शिकार। घर पहुंचा तो चीख सुनी, सूना था बिटिया का कमरा, झुकी हुई थी आंखें सारी, चहुं ओर था मातम बस पसरा। आंखें थी तलाश रही, बिटिया को घर के हर कोने में, पत्नी बोली टूट गया घर, बिटिया नहीं चहकेगी अब इस आंगन में। पागल हो क्या, क्या कहती हो, तुम्हे नहीं है इल्म कुछ आज, ऐसा कैसे कह दिया तुमने, क्यों बिगड़ रहा तुम्हारा मिजाज। फूटफूट फिर वो रोने लगी, बोली बिखर चुका है हमारा संसार, प्राणों से प्यारी बिटिया को, उठा ले गया आदमखोर गुलदार। दुखों का पहाड़ टूट गया, हाथों से उपहार छूट गया, प्राण सूखने को आतुर हैं, पिता का आज हर सपना टूट गया। कब तक ये दुख सहना होगा, खून के आसूं पीना होगा, कितनी जाने गंवानी होंगी, कितनी कोख सुनी होंग...