रिश्ते निभा रहा हूँ...!!!
न जाने क्यों आज भी, खामोश ही जी रहा हूँ, हर आँसूं को बस यूहीं पिये जा रहा हूँ। इस सबको मेरी मजबूरी मत जान लेना, मैं तो बस खामोश, रिश्तों को निभा रहा हूँ।। घुटन है साँसों में, रिश्ते-नाते टूट रहें हैं अहम की लड़ाई में, अपने छूट रहे हैं। फिर भी कोशिश सबको जोड़ने की कर रहा हूँ, मैं तो बस खामोश, रिश्तों को निभा रहा हूँ।। मेरी ख्वाईश मेरे सपनों की कोई कीमत नहीं अब, मेरा वजूद भी बस कहने भर को है अब। औरों की खुशी में बस अब खुशी ढूंढ़ रहा हूँ, मैं तो बस खामोश, रिश्तों को निभा रहा हूँ।। कट ही जायेगी ये जिंदगी अब यूहीं, ख्वाइशों को अपनी अब विराम दे रहा हूँ, कैसे बयाँ करूँ दिल की बेबसी को, मैं तो कांटों में भी बस मुस्कुरा रहा हूँ।। ज़िन्दा हूँ जब तक, ज़िम्मेदारी निभा रहा हूँ हर इल्जाम खामोशी से सहे जा रहा हूँ, जिन्दगी की कड़वाहट थोड़ी कम हो जाये, इसी कोशिश में आज भी गुड़ खा रहा हूँ।। अब मत कहना ये मैं क्या कर रहा हूँ, मैं तो बस खामोश, रिश्तों को निभा रहा हूँ।। Pari