जीवन आम आदमी का✍️

ज़िम्मेदारी के बोझ तले आम आदमी इतना दब जाता है,
की हजार तकलीफ क्यों न हो डॉक्टर के पास नहीं जाता है।

हो अनेकों कष्ट फिर भी, हसकर टाल जाता है,
कोई बीमारी न निकल आये सोच अस्पताल नहीं जाता है।

अक्सर ही वो दवाई केमिस्ट से ले कर चुपचाप खाता है,
कुछ नहीं कुछ नहीं कहकर सारे दर्द यूहीं वो छुपाता है।

पैसे खर्च न हो जाएं कहीं, टेस्ट की पर्ची छुपा लेता है,
सब ठीक है डॉक्टर है बोला, सबको जाकर फिर कहता है।

ना कोई उसकी फिक्र है करता, ना कोई रखता उसका ध्यान,
अक्सर ही तो सिर्फ जरुरत पर ही, होता है उसका सम्मान।

बारिश हो या फिर धूप कभी, दिन हो या फिर रात घनी,
बेहिचक ही निकल पड़ता है, वो चाहे हो कोई आगजनी।

आम आदमी का जीवन, जैसे कोई हलाहल पीना है,
जीवन के संघर्ष अनेकों संग, घुटघुट कर ही तो जीना है।
Pari ✍️ 



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