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Showing posts from 2025

वो बारिश तेरी वाली✍️

 एक अरसा हो गया तुमसे मुलाकात हुए, शायद अब तुम  हमारी झलक भी हो भूल गए। क्या वो पार्क का बेंच तुम्हे अब याद आता नहीं? वो आखिरी मुलाकात की अधूरी बात सताती नहीं..? आज फिर तुम शिकायत करोगी, जिक्र क्यों करते हो मेरा सावन में, मैं समझती हूँ याद कर रहे हो, हिचकियां बता रही हैं, पर क्या लिखना और एहसास को शब्द रूप देना जरूरी है, क्यों लिख रहे वो किताब, जिसकी कहानी अधूरी है। पर मैं भी क्या करूं यार, कलम खुद ही तुझे लिख देती है, वो तेरा बालकनी से बरसती बूंदों को निहारना.... तुम अब शायद नहीं आती होंगी बाहर पहले की तरह, लेकिन मेरी आँखें तो बस वही सावन खोजती हैं। आज फिर सफर में हूं, फिर वही बारिश है.. हाँ! तेरे वाली, यूं तो बारिश शायद एक सी होगी, तेरे वाली कुछ खास थी। अब न वो सावन आता है, न ही वो बादल फिर कभी बरसे, वो ख्वाइश अधूरी ही रही, हम ताउम्र बस एक तुझको तरसे। तुम दूर हो आज याद आ गई, मुस्कुराते रहना बस यही ख्वाइश है, देखते है कब तक यादों में रहोगे, अब तो सांसों की यही आजमाइश है। तुम भूल जाना तुम्हारे लिए आसान होगा, मै यादें संजो के रख लूंगा दिल में रखूंगा तस्वीर तेरी और तेरी यादों सं...

अपने अपने युग के भगवान..!

राम अगर रामत्व छोड़ दें तो फिर मर्यादा कौन सिखाएगा कृष्ण अगर छल न करें, तो कौरवों को कौन हराएगा। न त्रेता कृष्ण को अपनाए न द्वापर में राम आ पाएंगे, हर युग की अपनी कथनी है, अदला बदली न सह पाएंगे। राम तो बस मानव सा जीते, कृष्ण अपना अस्तित्व दिखाते, हनुमान जी बस आज्ञा मानें, अर्जुन बिन तर्क तीर न साधे। स्वयं प्रभु होकर भी राम जी, वानर सेना से सहमति लेते, मैं ही हूं त्रिभुवन का स्वामी, कृष्ण जगत को स्वयं बताते। हर युग की अलग है चाल, हर युग की अलग है माया, सतयुग में तप होते थे, द्वापर में यज्ञ से काम बन जाता। द्वापर में जपतप के संग स्वयं कृष्ण गीता ज्ञान दे रहे, कलयुग बड़ा सौभाग्यशाली सिर्फ नाम से काम  बन जाता। राम भटकते जंगल जंगल, कृष्ण विश्राम करें वृंदावन, राम सिखा रहे संघर्ष जीतना, कृष्ण संघर्ष के कारण बताते। राम सिखाएं मर्यादा ने रहना, कृष्ण स्वयं जाते हैं तपोवन, राम चलते हैं समाज के साथ, कृष्ण समाज को साथ चलाते राम व्यथित हैं जनकल्याण को लेकर, कृष्ण स्वयं नियम बनाते, राम पांव छूआकर अहिल्या तारे, कृष्ण द्रौपदी चीर बढ़ाए। राम सबरी के बेर को खाएं, कृष्ण घर घर जाकर माखन चुराएं, राम ना...

पहाड़ और पहाड़ी बचाओ

मेरी पहचान बल उत्तराखंड, मेरी शान बल देवभूमि है, मैं हूं पहाड़ी गर्व है मुझे, मेरी बोली भाषा गढ़वाली कुमाऊनी है। चारों धाम है मेरी पहचान, मेरी जान देवभूमि में बसती है, मैं हूं करता धन्यवाद प्रभु का, जो उत्तराखंड मेरी जन्मस्थली है। कितना अच्छा लगता है, कितने प्यारे बोल दिखते हैं, लेकिन क्या जीवन में मनन किया, सवाल फिर ऐसे उठते हैं। मैं पहाड़ी मै उत्तराखंडी, गर्व से नारे रोज बजते हैं, उत्तराखंड की फिक्र हम देखो, दूसरे शहरों में बस करते हैं। आज उत्तरायण है बल दिल्ली में कौथिग लगाते हैं, लेकिन क्या खुद हमारे बच्चे मकरैणी का महत्व जानते हैं? घुघतिया हो या रोटल्या बार, बस स्टेटस तक सीमित रह गए, हम तो बस अब पिज्जा बर्गर और चाउमीन के शौकिन हो गए। अच्छा है कौथीग़ लगाओ, खूब भीड़ पहाड़ की एक जुट करवाओ, लेकिन सिर्फ नाच गाने तक नहीं, पहाड़ बचाने की मुहिम भी गाओ। संस्कृति सिर्फ मेलों से नहीं, परिवार में भी घोलनी पड़ती है, डीजे पर देवता नाच रहे, क्या नहीं ये देवभूमि की बेइज्जती है। पैसे की माया है हर जगह, पैसे का हो रहा है मेल, नेता हो या इनफ्लुएंसर, व्यूज पाने का कर रहे खेल। न भू-कानून, न अतिक्रमण, न...

गुलदार मुक्त हो या गुलदार युक्त पहाड़

आंखों से नींद खो चुकी है, दिल का सुकून अब कहीं खो गया है, जब से देवभूमि में गुलदार का आतंक बेइंतहा हो गया है। हर समय एक डर लगा रहता है अब हर उत्तराखंड के वासी को। कहीं गुलदार उठा न ले जाए मुझे या मेरे किसी करीबी को। रोज की हर जरूरत को भी डर के माहौल में रहकर पूरी करना होगा, मैं पहाड़ी हूं जरूर लेकिन पहाड़ में मुझे अब डर के रहना होगा। न घास अकेले अब ला सकता हूं, न गाय-बकरी अकेले चरा सकता हूं, न सुबह जल्दी और न ही शाम देर तक खेतों में काम कर सकता हूं। भय में हूं जी रहा मैं रोज, न पी न सही से कुछ खा ही सकता हूं। अपनी आप बीती किसे बताऊं, रात सपने में भी गुलदार ही देखता हूँ। एक जगह से पकड़ रहे और दूसरी जगह गुलदार को छोड़ दे रहे, एक को दिलासा दे कर के ये दूसरे पहाड़ी की जान खतरे में डाल रहे। कल तक बस गुलदार का डर था, आज सुअर भालू और आ गए। बच्चे से लेखर बूढों तक को, ये निशदिन अपना निवाला बना रहे। बल मर जाओ कोई बात नहीं, 10 लाख मुआवजा मिल जायेगा, तुम्हारी जान जाए तो क्या, गुलदार का पेट तो भर जायेगा। आज  गढ़वाल हो या कुमाऊं क्षेत्र, गुलदार के आतंक से है त्रस्त, जनता हर रोज मर रही यहां, प्रत...

कौन जिम्मेदार? तलाश जारी..!

मन व्यथित होता है देख, खाली हो रहा गांव आज हर एक, वीडियो बन रहे पहाड़ पर, बल अब रहना नहीं है यहां सेफ। आपदाओं का घर है ये, तो कोई कह रहा गुलदार से बचाओ, कौन है इसका जिम्मेदार, मनन कर अब आप ही बताओ। विकास की ताल ठोक, अतिक्रमण हटाने का था बहाना, तोड़ हमारे पुस्तैनी घर बार, न जाने किसे था इनको बसाना। चौड़ीकरण के नाम पर,  पहाड़ हमारा उजाड़ दिया, कौन है जो विनाश कर रहा, और विकास का उसको नाम दिया। पहाड़ की जवानी और पहाड़ पानी, दोनों को बांध दिया किसने, कौन है वो तीर्थों को भी पर्यटक स्थल बना दिया जिसने। महायोजना है बल कोई, बद्री केदार धाम को चमकाने की, कौन समझाए इन मूर्खों को, देवों को पसंद है जगह शांति की। विकास के नाम पर योजना चला रहे, साल दर साल पहाड़ उजाड़ रहे, केदारनाथ आपदा से सीख नहीं ली, थराली, धराली को न्योता दिया। बिजलीघर बना अनेक, बादल को फटने के लिये मजबूर था किया। रोजगार हमारा छीन लिया और बल देखो हमने तुम्हारा विकास है कर दिया। अब फ्री का लैमचूस दे रहे और इसको भी विकास कह रहे, खेती करवाकर बंजर सबकी, अब सम्मान निधि हमें वो दे रहे। न ढोल बचे न लौहार रहे, बस अब DJ और tent लग रहे...

स्कूल फिर से, वही पुराने दोस्तों संग

आज फिर स्कूल के प्रांगण में खड़ा था, पुरानी वो सारी बातें याद आ गई। एक पहला दिन था न जाने की जिद्द थी, एक वो आखिरी दिन यादें भरपूर थी। पहला दिन जब गए तो जेल सा महसूस हुआ मां पापा दुश्मन लगे स्कूल जाना सजा सा अखरा। गुरुजी में कोई शैतान जैसे नजर आया था, वो पहला दिन लगा जैसे कोई खराब साया था। फिर आदत सी होने लगी और स्कूल से प्यार होने लगा, किताबें थोड़ी बोझिल जरूरी थी लेकिन बस्ता हल्का होने लगा। पढ़ाई का बोझ था जो कंधे झुका देने की क्षमता रखे था, लेकिन वो हाफ टाइम की घंटी में सुख कुछ अलग ही था। दिन बीतने लगे कक्षाएं 1 से शुरू हो सीढ़ियों सी बढ़ने लगी, पांच साल का वो बच्चा अब किशोर अवस्था में आने लगा। खेल खिलौने से दूरी और किताबें करीब होने लगी, जिंदगी ठहरी थी जो अब तेजी से दौड़ने लगी। वो स्कूल की कक्षा वो गुरुजी की डांट और वो दोस्तो का साथ, क्या नहीं था बताओ जीवन में मेरे तब खास, अब तो बस घर से निकलने की देरी थी, पढ़ाई जैसे करने का बस अब अबेरी थी। कब मैट्रिक और फिर 12वीं पूरी हो गई पता ही नहीं पता जब मस्ती जिम्मेदारी बन गई, विश्वविद्यालय तो बस एक सीढ़ी भर रह गया था, उम्मीदों पर खरे उतरने ...

पहाड़ अब आपदा कु भंडार

विकास का नौ फर विनाश कना किलै तुम। हमरी पुंगडी बाँजा  करी, अफ्फू देहरादून बस्याँ किलै तुम। पाणी रोकी बांध बणै, आपदा थै न्यूतू दीणा किलै तुम? सड़क बणै गौ कु रस्ता बाघ थै बताणा किलै‌ तुम..? रोड टुटी लोग‌ मरी, बस मुआवजा तक सीमित तुम, आपदा आई कुड़ी बोगनी बस तमसु देखणा रया‌ं तुम। फसल फूकी सुंगरु न, देहरादून सुनिदं सियाँ तुम। न क्वि देखणु, न खोज होई, बस बौंहडा प्वण्या तुम। पलायन फर ज्ञान दीणा, पर योजना कुछ नि बणांदा तुम, रोजगार फंडू फूका, शिक्षा स्वास्थ्य भी नि दे सक्यां तुम। कनु कै रालू पहाड़ी पहाड़ मा, जब मूलभूत सुविधा भी हुयीं गुल, बाघ, सुंगर, और भालू से आज, सरू पहाड़ देखा हुयूं फुल। अब त चेती जाओ सरकार, आपदा की आयीं भरमार, कभी भालू, कभी सुन्गर त कभी गुलदार कु करूं अत्याचार। भोल दोष नि दियां जनता थै, जब सुरक्षा म उठाली हथियार। कनु कै संघर्ष‌ इनमा करलो "Pari," कुछ त करा अब तुम विचार। ©®Pari✍️

साजिश या सबक

थोड़ी सी मायूसी है, दिल जैसे टूट सा गया है, बेफिक्र सा था और उम्मीदों को जैसे आज धक्का लगा है। बहुत मेहनत कर रहा था और मौका छिन गया आज, बिन दौड़े ही जैसे कोई दौड़ हार गया मै आज। फिर भी उम्मीद है कि जैसे कुछ अच्छा हो जाएगा, विपरीत जो आया है फैसला, वो फिर बदल जाएगा। आंखें नम होना चाह रही है, लेकिन रो नहीं सकते। लगी चोट है ऐसी, कि घाव किसी को दिखा नहीं सकते। आज महसूस हुआ कि हार ऐसी भी हो सकती है, लड़ाई लड़े बगैर आपको चोट भी लग सकती है। ऐ ज़िंदगी बहुत बेरहम है तू, आज फिर महसूस हुआ है, दिल टूटा, दर्द मिला और जैसे कुछ हाथ से छूटा हुआ है। चलो तेरा ये फैसला भी अब हम कबूल करते हैं, सहज मिली इस हार को भी हम कबूल करते हैं। पर अब मै रुकने का नाम नहीं लूंगा ये भी समझ लेना, बिन लड़े तो अब तुझे मैंने भी जीतने नहीं देना।। pari ✍️

व्यथा आज पहाड़ की

मन में था उल्लास भरा, पिता प्रेम से ओत प्रोत, बिटिया का है जन्मदिवस, मन जैसे खुशियों का श्रोत। छुट्टी लेकर घर जाना है, बिटिया की खुशियां देखूंगा, साथ बैठकर खाना होगा, चूल्हे पर फिर हाथ सेकूंगा। चल पड़ा फिर खुशमन से, पहुंच गए फिर अपने घर द्वार, क्या मालूम था उसे आज, आंगन में बैठा होगा गुलदार। खुशियां मेरी छीन लेगा, उजाड़ देगा मेरा संसार, बिटिया मेरी नहीं दिखेगी, बन जायेगी वो शिकार। घर पहुंचा तो चीख सुनी, सूना था बिटिया का कमरा, झुकी हुई थी आंखें सारी, चहुं ओर था मातम बस पसरा। आंखें थी तलाश रही, बिटिया को घर के हर कोने में, पत्नी बोली टूट गया घर, बिटिया नहीं चहकेगी अब इस आंगन में। पागल हो क्या, क्या कहती हो, तुम्हे नहीं है इल्म कुछ आज, ऐसा कैसे कह दिया तुमने, क्यों बिगड़ रहा तुम्हारा मिजाज। फूटफूट फिर वो रोने लगी, बोली बिखर चुका है हमारा संसार, प्राणों से प्यारी बिटिया को, उठा ले गया आदमखोर गुलदार। दुखों का पहाड़ टूट गया, हाथों से उपहार छूट गया, प्राण सूखने को आतुर हैं, पिता का आज हर सपना टूट गया। कब तक ये दुख सहना होगा, खून के आसूं पीना होगा, कितनी जाने गंवानी होंगी, कितनी कोख सुनी होंग...

वो सब ढूंढते हैं तुझे

वो बूढ़ी आंखे खोजती है तुझे, वो कांपते हाथ सहारा चाहते हैं तेरा, वो कंपकपाते शब्द पूछते हैं, कहां है वो जो हुआ करता था मेरा। वो झुकी पीठ सहारा चाहती है, वो थके पांव आराम ढूंढते हैं, वो सूना आंगन, वो खाली क्यारियां, वो मील का पत्थर, वो गांव का बस स्टॉप..सब ढूंढते है तुझे.. वो पहली क्लास स्कूल की, वो बस्ता किताबों का, वो पहली प्रार्थना ईश्वर की, वो पहली प्रतिज्ञा देशप्रेम की। वो कच्छी मिट्टी कक्षा की, वो बिछी चटाई रेशम की, वो श्यामपट, वो गुरुजी का डर, वो खेल का मैदान, छुट्टी की घंटी..सब ढूंढते हैं। वो टूटा हुआ मकान पुराना, वो शाम का ढलना सुहाना, वो सूरज की पहली किरण, वो पक्षियों को चहचहाना। वो डाली पर बैठा मोर, वो पड़ोस से आता बच्चों का शोर, वो गांव की चौपाल, वो बड़ों सम्मान, वो दादा जी का हुक्का, वो दोस्त मेरा गोपाल..सब ढूंढते हैं... वो मकर संक्रांति-मऊ की पंचमी,वो फ्यूंली के पीले फूल, वो चैत्र की खुसफुसाहट, वो होली के गुलाल और उड़ती धूल। वो सावन वो भादो, वो राखी में बहन का इंतज़ार। वो दिवाली, वो इगास-बग्वाल, वो भैलें, वो मित्रों की टोली को मेरी जग्वाल..सब ढूंढते है तुझे। Pari✍️ 

विकास या विनाश? देवभूमि..हो रहा सत्यानाश

 विकास की ताल ठोक, अतिक्रमण हटाने का था बहाना, तोड़ हमारे पुस्तैनी घर बार, न जाने किसे था इनको बसाना। चौड़ीकरण के नाम पर, रोजगार हमारा छीन लिया, अब फ्री का लैमचूस दे रहे और विकास बल तुम्हारा कर दिया। पहाड़ की जवानी और पहाड़ पानी, दोनों को बांध दिया किसने, कौन है तीर्थों को भी पर्यटक स्थल बना दिया जिसने। महायोजना है बल कोई, बद्री केदार धाम को चमकाने की, कौन समझाए इन मूर्खों को, देवों को पसंद है जगह शांति की। विकास के नाम पर योजना चला रहे, साल दर साल पहाड़ उजाड़ रहे, केदारनाथ आपदा से सीख नहीं ली, थराली, धराली को न्योता दिया। बिजलीघर बना अनेक, बादल को फटने के लिये मजबूर था किया। अब भी सुध नहीं ली अगर, फिर भविष्य में पहाड़ आयेगा नहीं नजर। क्या अस्तित्व तेरा बचेगा, क्या सुकून तुझे कहीं फिर आयेगा? बिना पानी पहाड़ क्या भविष्य सुरक्षित रह पायेगा? ऐसे न जाने कितने और सवाल है आने वाली पीढ़ी के, निडर होकर कल तू क्या उस पीढ़ी का सामना कर पायेगा? Pari✍️ 

जय भारत

  जय हिंद जय भारत दृढ़ निश्चय था बातो में, तिरंगा लिए हाथो में, फिक्र न थी जवानी की, देनी जान की कुर्बानी थी। फैसला किया अडिग था आज, लायेंगे अपना स्वराज, हर मुख पर मुस्कान होगी, नही अब गुलामी होगी। कहकर नहीं अब तो, छीन के आजादी लाएंगे, सर कटा देंगे यारो, नहीं तिरंगा झुकने कभी देंगे। आया फिर वो भी मंजर, मन की चाह को राह मिली, लाखों लाशों पर चढ़कर, फिर भारत माँ आजाद हुयी। हुआ सवेरा फिर आजादी का, जगी उम्मीद फिर खुशहाली की, मिला स्वराज फिर शर्तो पर, चुकायी भारी कीमत आजादी की। नही चाहिए जान तुम्हारी, नही मांगते कोई बलिदान तुम्हारा  बस कसम चाहिए एक ही सबसे, रखेंगे विजयी विश्व तिरंगा प्यारा pari ✍️ 

मोहब्बत बस एक तुमसे

चलो आज कह ही देते हैं, मेरी जान हम बस तुमसे मोहब्बत करते हैं, जताते नहीं हैं बताते नहीं है लेकिन इक पल को भी तुझे भुलाते नहीं है। वो तुझसे लड़ना-झगड़ना, तो क्या मोहब्बत में किसी को सताते नहीं हैं तुम रहोगे साथ हर फैसले में जानते हैं, बस तुझे खुलकर कभी बताते नहीं हैं।। अगर करो तुम यकीं तो बस दुनिया से अपनी मोहब्बत को छिपा रखा है  तुमसे होती है अनबन अक्सर ही, यही झांसा मेरी जान सबको दिला रखा है। कहते है कि अधिक प्यार न करना, अक्सर आपस में दूरियां हो जाती है, बस यही बात मन को डराती है और मोहब्बत तुम्हारी सबसे छुपाई जाती है। अक्सर ही मिल जाते है अनेकों जो करीब आने की कोशिशें करते हैं, यकीन मानो मेरी जान सबको कर नजरअंदाज हम बस तुम्हे ही चाहते है। ये दुनियां है कि आडंबरों से भरी है, करती कुछ और कुछ दिखाती है, तू भी न आ जाए इसके झांसे में कहीं, बस ये बात अक्सर मुझे सताती है। लिखने को तो शब्द रूपी अनेक बाण हैं मेरी तरकश में मानो अगर तुम, मैं कहीं भी रहूं कैसा भी रहूं लेकिन ख्वाबों ख्यालों में हो बस एक तुम। मेरी हर सुबह हर शाम हर एक पल की हसीन दास्तान हो तुम, अगर करो मुझपर यकीं तो माटी की म...

ख्यालों की ओट से

 खुशियों का सावन भी तुम हो  ये चमचमाता शहर ये जगमगाती मिनारें, फिर भी जीवन है जैसे सड़क के किनारे। तुम खुश रहो इन चकाचौंध के शहर में, मुझे छोड़ आओ मेरे गाँव की सहर में.. शहर उसका था लोग भी उसके थे, हम तो बस एक मुसाफिर भर थे। न जाने कैसे संभले हम जानते ही नहीं,  वरना तूफान जिंदगी में अपने भी बहुत थे।  मुस्कुराता चेहरा तेरा जैसे कोई खिलता गुलाब है, खूबसूरत ये निगाहें जैसे आने वाला कोई सैलाब है अधरों से गिरते हैं शब्द रूपी पुष्प ऐसे ये तेरे, जैसे खिलने वाला हो कोई गुलिस्तां शहर में मेरे।  ख्वाइशों के शहर को बस ख्वाइशों में रहने दो,   ख्यालों में है वो अगर तो ख्यालों में रहने दो।   मुद्दतों के बाद मिले हो आज हमशे  अधरों को सिले और नयनों को कहने दो....  उसके नयन कितने खूबसूरत थे, ये बयां करने को लब्ज़ नहीं मिलते, बस इतना ही कह सकता हूं, कि ये जब जब मिले, हम वहीं ठहर गए.. Pari ✍️ 

अब कोई संवेदना नहीं चाहिए

अब हमें न श्रद्धांजलि और न संवेदना चाहिये, सिर्फ कायरों के कटे हुये सिर चाहिये, शान्ति चाहने वाला कृष्ण नहीं, रक्तबीज का खून पीने वाली महाकाली चाहिये.. नहीं अब कोई वार्ता कोई संवाद चाहिये, दुश्मनों के दिलों में परशुराम का खौफ चाहिए। अब न कोई बहाना न कोई सवाल जवाब चाहिये, निर्दोष हिंदुओ के लिये बस एकतरफ़ा इंसाफ चाहिए। सिर्फ सरकार की नहीं हमारी भी ज़िम्मेदारी है, क्योंकि देश विकास में हमारी भी भागीदारी है। देश के दुश्मन आक्रांताओं से देश को बचाना है, देशहित-जनहित में साथ सरकार का निभाना है।। Pari✍️

ख्वाइशों का शहर

 कुछ बातें बस एहसास तक सीमित होती है, होंठ ख़ामोश रहते हैं, आंखे बयाँ करती है..! आज सालों बाद दिल खोलकर उसने कुछ कहा, जैसे अटका था सैलाब आज हो फिर बहा। हर बात आज दिल की जुबां पर आ गयी, वो तब भी हमारी थी आज भी है.  बस कबूल कर गई ।      देखकर हम तुम्हे बस देखते रह जाते हैं, सोचते हैं ये नूर तुमने पाया कहां से है। काश कोई ख्वाइश हो पूरी अगर आज भी, बस कुछ पलों के लिए तुम पास आ जाओ अभी। तेरी आंखें कितनी खूबसूरत है ये बयाँ करने को मुझे लब्ज नहीं मिलते। बस इतना ही कह सकता हूँ तुमसे, कि जब जब देखता हूं बस देखते रह जाता हूं..। क्या कभी तुमने कुछ एहसास किया है, किसी अनजाने चेहरे से प्यार किया है? अक्सर जो खास था तुम्हारे लिए जीवन मे, उस अनकही मोहब्बत को दूर महसूस किया है? ज़िन्दगी ने न जाने क्यूँ ऐसा मजबूर किया है, खुद ही खुद को खुद की मोहब्बत से दूर किया है। वो रहती है पल पल हर पल मेरे साथ यकीनन, मेरा दिल उसके पास है सिर्फ कुदरत ने जिस्म दूर किया।। Pari ✍️ 

बस यूहीं ख्याल आया

तलब उसकी है जो पास नहीं, और जो पास है उसकी कद्र नहीं। इसी दुःख में है आजकल सभी देखो, जो मिला काफी नहीं, चाह उसकी जो मिला नहीं..! दिल मे तस्वीर उसकी बना रखी है, मालूम है कि वो मुकम्मल नहीं होगी, रोज करते हैं उसका हो जाने की ख्वाइश, जानकर भी कि वो कभी पूरी नहीं होगी...!! सच कहूं तो तुम बहुत खराब हो, पर खूबसूरती में लाजवाब हो, लाख कोशिशें कर के देख लिया, लगी हो ऐसी आदत जैसे कोई शराब हो✍🏻 बडी मुद्दतो बाद उसे याद मेरी आयी, सालो बाद जब उसनेकॉल मुझे लगायी कहती रही कि डर डर के मुझसे हेलो बोला है, मैंने भी कहा इसी दिन की खातिर तो नंबर वही बदला है कुछ खास हो तुम की जो बता नहीं सकते, दिल मे हो फिर भी जता नहीं सकते, बेशक तुम्हे इल्म नहीं है हमारी चाह का, लेकिन जो चाह तुमसे है हम बता नहीं सकते✍🏻 तुम जो सामने हो बैठे, दिल को सुकूँ आ रहा है, तेरी सूरत को देख, प्यार बहुत आ रहा है। तेरा देखना वो नजरें चुराकर बार बार, तेरी हर अदा पे हो रहा हमें अब अधिक ऐतबार!! एक पल को तुम पास हो, फिर दूजे पल दूर नजर आते हो, माना कि मुकम्मल नहीं हो फिर भी दिल को भाते हो। बेशक अनजान है हम अभी एक दूसरे के लिए लेकिन, कुछ...

एक मुलाकात सालो बाद

आज फिर मिलने वो हमसे आयी हैं, मिलते ही निगाहें वो फिर शर्मायी हैं मालूम था उसे की हम भी उतने ही बेचैन है आकर पास उसने चुराए फिर हमसे नैन हैं... उसकी चाल में आज भी वही बात थी, सालों बाद भी वो वैसे ही इतरा रही थी। देखकर फिर मुस्कुराई वो पहले की तरह ही, जैसे कह रही हो मैं हो चली अब तो परायी ही। फिर वही सवाल था उसका मेरे से आज, कैसा है बताओ मुझसे मिलकर तुम्हारा मिजाज। उस पगली को अब मैं क्या ही बताता दिल का हाल, देख उसे सालों बाद, कैसे रहा था मैं खुद को संभाल। कैसे हो, क्या करते हो, कौन कौन है साथ तुम्हारे, सवाल थे उसके हमसे वही आज फिर पुराने। मैंने भी बस मुस्करा के कहा सब अच्छा है, कैसे कहता बिन तेरे अब अकेले ही दिन कटता है। फिर कुछ कही उसने अपने दिल की बात हमसे, लगा अभी भी कुछ बाकी रिश्ता है हमारा उससे। वो आखिरी मुलाकात, वो भूली नहीं कहा उसने, भूलकर सब आगे बढ़ जाओ कहा फिर उसने। मैं भी कुछ पल तो ठहर गया था उसी मोड़पर फिर से, लेकिन संभाला खुद को मैंने फिर दूसरी तरफ मुड़के। खत्म हो चुकी उम्मीदों को, आज फिर ज़िंदा कर गयी दूर हूँ लेकिन भुलाया नहीं, बिन कहे वो फिर कह गयी। भीगी पलकों से अलविदा कहा उ...

मेरा प्रेम बस एक तुम....

काश तुमने कोशिश तो की होती, दिल की बात हमसे तो कही होती। मेरा दिल भी था तलबगार तुम्हारा, एक बार मेरी बाँह प्रेम से पकड़ी तो होती.. सच कहूँ तो आज भी हम बस तुम्हारे हैं, जिस्म से दूर लेकिन जहन में तुम्हारे हैं। कोई छूता है तो तकलीफ होती है मानो अगर, जैसे हक है तुम्हारा ही बस इस ज़िन्दगी पर। अब मैं बंदिस में हूँ समाज के बंधन में कैद हूँ, लेकिन दिल मेरा कोई कैद कर पायेगा क्या? मेरे जिस्म को भले पा भी ले कोई सिवा तेरे, मेरी रूह को सिवा तेरे कोई छू पायेगा क्या? चल बस अब मैं नहीं कह सकती अधिक कुछ भी, पलक खुलने और बंद होते ही बस ख्वाइश है तेरी ही। तू इतना समझ ले मेरी बेचैनी को मेरे दिल के चैन, अब ताउम्र बिन तेरे मैं तेरे लिये ही बेचैन... Pari✍️

मेरी कल्पनाओं में..✍️

क्या करे जनाब ये दुनिया है, हर कोई ख्वाइश कहाँ मुकम्मल होती है, किसी को नींद चाहिये सोने के लिए, कोई जागना चाहता है किसी के लिए।।।😊 अक्सर मुस्कुरा देता हूँ मैं, जब जब वो पल याद आता है मुझे, समझा था जिसे दिल के बेहद करीब हमने, उस एक पल में समझ आया था हमारा दायरा हमें.. प्यारी मुस्कान संग आँखों मे काजल, बिना तीर के ही कर देते हैं घायल। यूँ देखना तुम्हारा नजरें झुका कर, इन्हीं अदायों के तो हम हुये हैं कायल.. शांत है बाहर से, मन मे भरी है हलचल, व्यक्त जीवन में, निकाले हमारे लिए कुछ पल, थोड़ा शरारत है थोड़ी है नटखट माना, वो,  लेकिन दिल की साफ, इसलिए तो है बेहद खास क्या भीड़ के होने से तन्हाई मिट जाती है,? सिर्फ धूप आने से मायूसी छट जाती है?? यकीन मानो अगर दिल की सुनने वाला साथ हो, सारी मुश्किलें भी मुस्काते हुए मिट जाती हैं..।। Pari✍🏻 इस जहाँ में एक दस्तूर है अगर मानो तो, चार दिन चालाकी चरम पर चलती है। कोई भी इतना नासमझ नहीं है समझ लेना, ठोकर एक ही पत्थर बार बार नहीं खायी जाती है..! न जाने कब वक़्त फिसल गया रेत की तरह, वो मिले बात हुयी और फिर बिछड़े किस तरह। यकीनन जीवन के किसी मोड़पर वो मिल...

परिकल्पना-2

किसी ने किया फिर आज एक सवाल फिर से, क्यों रखते हो दिल मे जब नाता टूट गया उससे। अब क्या समझायें उन्हें हालात हम अपनी, कि धड़कन ही चलती है जब याद करते हैं हम उसे।। pari ये सुहाना मौसम और संग आपके दीदार, जैसे पतझड़ के बाद आये कोई बहार.. पलक खुलते ही दिख जायें ये स्वाणी आंखे, फिर कैसे कोई न करे इनसे भला प्यार... Pari खूबसूरती के संग बेहतरीन सीरत, आप जैसे जहां की सबसे सुहानी मूरत। बन जाता होगा दिन उसका हर रोज ही, जिसे देखने को मिले रोज ये आपकी सूरत... ये प्यारी नशीली आँखें, ये लाल सुर्ख अधर, ये मुस्कान होठों की, ये दीदार पहली पहर। यूँ तो सुबह हो ही जाती है सूरज के आने से, लेकिन आपको देख ही जीवन में होती है शहर।✍️ मौसम ने मिजाज बदला है, शुष्क से सुहाना हो चला। आपने भी अदायें बदल ली, सुंदर से अतिसुन्दर हो गये..। Pari✍️

भारत। देश

 हिमालय जिसका शीश मुकुट चरणों में है विशाल हिन्द अलग अलग है बोलीभाषा अलग अलग है धर्म क्षेत्र ऐसा ही एक भूखंड धरा पर भारत जिसका नाम प्रसिद्ध अनेक संस्कृति का मेल है, अनेक धर्मों का है संगम स्थल वीरों की है कर्मस्थली भगतसिंह, आज़ाद, बोस का जन्मस्थान ऐसा एक भूखंड धरा पर भारत देश है जिसका नाम। विश्वगुरु कहलाता हैं ऋषिमुनियों की तपस्थली। योग से निरोग जहाँ को बनाता बसते हैं जहाँ चारों धाम। ऐसा एक भूखंड धरा पर भारत देश है जिसका नाम। Pari✍️

परिकल्पना✍️✍️

न जाने कैसी ये दिल की लगी है तुझसे, अभी मुलाकात हुयी और अभी तुम याद आने लगे। पल भर को तुम ओझल हुये नजरों से, जैसे आंखें दीदार को तरसने सी लगी। वो मुलाकात अधूरी ही लगती है आज भी, जब तुम अधरों पर बात दबा के बैठे थे। आँखों ने तो कहा था फिर भी बहुत कुछ। होठों तो तुमने सिले रहने दिया था तब। मौसम का मिजाज बदला है जो वो भी कुछ बदले से नजर आ रहे। दिल मे है उन्हें देखने की चाहत, वो चांद की तरह छिपे जा रहे pari सिर्फ विवाह बंधन में बंधने से साथ रह जाना संभव नहीं होता, प्रेम की अमृतवर्षा है जो दो व्यक्तियों को जीवनपर्यन्त साथ जोड़े रखती है! Pari हर सोची हुयी बात सच नहीं होती, ख्यालों ख्यालों में मुलाकात नहीं होती। भले हर वक़्त एक चेहरा पास रहता हो तुम्हारे, बिन कहे दिल की बात मोहब्बत मुकम्मल नहीं होती...! Pari✍️