वो सब ढूंढते हैं तुझे
वो बूढ़ी आंखे खोजती है तुझे, वो कांपते हाथ सहारा चाहते हैं तेरा,
वो कंपकपाते शब्द पूछते हैं, कहां है वो जो हुआ करता था मेरा।
वो झुकी पीठ सहारा चाहती है, वो थके पांव आराम ढूंढते हैं,
वो कंपकपाते शब्द पूछते हैं, कहां है वो जो हुआ करता था मेरा।
वो झुकी पीठ सहारा चाहती है, वो थके पांव आराम ढूंढते हैं,
वो सूना आंगन, वो खाली क्यारियां, वो मील का पत्थर, वो गांव का बस स्टॉप..सब ढूंढते है तुझे..
वो पहली क्लास स्कूल की, वो बस्ता किताबों का,
वो पहली प्रार्थना ईश्वर की, वो पहली प्रतिज्ञा देशप्रेम की।
वो कच्छी मिट्टी कक्षा की, वो बिछी चटाई रेशम की,
वो श्यामपट, वो गुरुजी का डर, वो खेल का मैदान, छुट्टी की घंटी..सब ढूंढते हैं।
वो टूटा हुआ मकान पुराना, वो शाम का ढलना सुहाना,
वो सूरज की पहली किरण, वो पक्षियों को चहचहाना।
वो डाली पर बैठा मोर, वो पड़ोस से आता बच्चों का शोर,
वो गांव की चौपाल, वो बड़ों सम्मान, वो दादा जी का हुक्का, वो दोस्त मेरा गोपाल..सब ढूंढते हैं...
वो मकर संक्रांति-मऊ की पंचमी,वो फ्यूंली के पीले फूल,
वो चैत्र की खुसफुसाहट, वो होली के गुलाल और उड़ती धूल।
वो सावन वो भादो, वो राखी में बहन का इंतज़ार।
वो दिवाली, वो इगास-बग्वाल, वो भैलें, वो मित्रों की टोली को मेरी जग्वाल..सब ढूंढते है तुझे।
Pari✍️
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