स्कूल फिर से, वही पुराने दोस्तों संग
आज फिर स्कूल के प्रांगण में खड़ा था,
पुरानी वो सारी बातें याद आ गई।
एक पहला दिन था न जाने की जिद्द थी,
एक वो आखिरी दिन यादें भरपूर थी।
पहला दिन जब गए तो जेल सा महसूस हुआ
मां पापा दुश्मन लगे स्कूल जाना सजा सा अखरा।
गुरुजी में कोई शैतान जैसे नजर आया था,
वो पहला दिन लगा जैसे कोई खराब साया था।
फिर आदत सी होने लगी और स्कूल से प्यार होने लगा,
किताबें थोड़ी बोझिल जरूरी थी लेकिन बस्ता हल्का होने लगा।
पढ़ाई का बोझ था जो कंधे झुका देने की क्षमता रखे था,
लेकिन वो हाफ टाइम की घंटी में सुख कुछ अलग ही था।
दिन बीतने लगे कक्षाएं 1 से शुरू हो सीढ़ियों सी बढ़ने लगी,
पांच साल का वो बच्चा अब किशोर अवस्था में आने लगा।
खेल खिलौने से दूरी और किताबें करीब होने लगी,
जिंदगी ठहरी थी जो अब तेजी से दौड़ने लगी।
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