गुलदार मुक्त हो या गुलदार युक्त पहाड़

आंखों से नींद खो चुकी है, दिल का सुकून अब कहीं खो गया है,

जब से देवभूमि में गुलदार का आतंक बेइंतहा हो गया है।

हर समय एक डर लगा रहता है अब हर उत्तराखंड के वासी को।

कहीं गुलदार उठा न ले जाए मुझे या मेरे किसी करीबी को।


रोज की हर जरूरत को भी डर के माहौल में रहकर पूरी करना होगा,

मैं पहाड़ी हूं जरूर लेकिन पहाड़ में मुझे अब डर के रहना होगा।

न घास अकेले अब ला सकता हूं, न गाय-बकरी अकेले चरा सकता हूं,

न सुबह जल्दी और न ही शाम देर तक खेतों में काम कर सकता हूं।


भय में हूं जी रहा मैं रोज, न पी न सही से कुछ खा ही सकता हूं।

अपनी आप बीती किसे बताऊं, रात सपने में भी गुलदार ही देखता हूँ।

एक जगह से पकड़ रहे और दूसरी जगह गुलदार को छोड़ दे रहे,

एक को दिलासा दे कर के ये दूसरे पहाड़ी की जान खतरे में डाल रहे।


कल तक बस गुलदार का डर था, आज सुअर भालू और आ गए।

बच्चे से लेखर बूढों तक को, ये निशदिन अपना निवाला बना रहे।

बल मर जाओ कोई बात नहीं, 10 लाख मुआवजा मिल जायेगा,

तुम्हारी जान जाए तो क्या, गुलदार का पेट तो भर जायेगा।


आज  गढ़वाल हो या कुमाऊं क्षेत्र, गुलदार के आतंक से है त्रस्त,

जनता हर रोज मर रही यहां, प्रतिनिधि अधिकारी सो रहे मस्त।

अब स्वयं पहाड़ी को ही तो, अपना भविष्य तय करना होगा,

गुलदार मुक्त या गुलदार युक्त हो पहाड़, स्वयं उसे यह तय करना होगा।

Pari ✍️ 




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