मेरा प्रेम बस एक तुम....

काश तुमने कोशिश तो की होती,
दिल की बात हमसे तो कही होती।
मेरा दिल भी था तलबगार तुम्हारा,
एक बार मेरी बाँह प्रेम से पकड़ी तो होती..

सच कहूँ तो आज भी हम बस तुम्हारे हैं,
जिस्म से दूर लेकिन जहन में तुम्हारे हैं।
कोई छूता है तो तकलीफ होती है मानो अगर,
जैसे हक है तुम्हारा ही बस इस ज़िन्दगी पर।

अब मैं बंदिस में हूँ समाज के बंधन में कैद हूँ,
लेकिन दिल मेरा कोई कैद कर पायेगा क्या?
मेरे जिस्म को भले पा भी ले कोई सिवा तेरे,
मेरी रूह को सिवा तेरे कोई छू पायेगा क्या?

चल बस अब मैं नहीं कह सकती अधिक कुछ भी,
पलक खुलने और बंद होते ही बस ख्वाइश है तेरी ही।
तू इतना समझ ले मेरी बेचैनी को मेरे दिल के चैन,
अब ताउम्र बिन तेरे मैं तेरे लिये ही बेचैन...
Pari✍️

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