अपने अपने युग के भगवान..!

राम अगर रामत्व छोड़ दें तो फिर मर्यादा कौन सिखाएगा
कृष्ण अगर छल न करें, तो कौरवों को कौन हराएगा।
न त्रेता कृष्ण को अपनाए न द्वापर में राम आ पाएंगे,
हर युग की अपनी कथनी है, अदला बदली न सह पाएंगे।

राम तो बस मानव सा जीते, कृष्ण अपना अस्तित्व दिखाते,
हनुमान जी बस आज्ञा मानें, अर्जुन बिन तर्क तीर न साधे।
स्वयं प्रभु होकर भी राम जी, वानर सेना से सहमति लेते,
मैं ही हूं त्रिभुवन का स्वामी, कृष्ण जगत को स्वयं बताते।

हर युग की अलग है चाल, हर युग की अलग है माया,
सतयुग में तप होते थे, द्वापर में यज्ञ से काम बन जाता।
द्वापर में जपतप के संग स्वयं कृष्ण गीता ज्ञान दे रहे,
कलयुग बड़ा सौभाग्यशाली सिर्फ नाम से काम  बन जाता।

राम भटकते जंगल जंगल, कृष्ण विश्राम करें वृंदावन,
राम सिखा रहे संघर्ष जीतना, कृष्ण संघर्ष के कारण बताते।
राम सिखाएं मर्यादा ने रहना, कृष्ण स्वयं जाते हैं तपोवन,
राम चलते हैं समाज के साथ, कृष्ण समाज को साथ चलाते

राम व्यथित हैं जनकल्याण को लेकर, कृष्ण स्वयं नियम बनाते,
राम पांव छूआकर अहिल्या तारे, कृष्ण द्रौपदी चीर बढ़ाए।
राम सबरी के बेर को खाएं, कृष्ण घर घर जाकर माखन चुराएं,
राम नाम के पत्थर भी तैरें, कृष्ण उंगली पर पर्वत उठाएं।

राम नाम पर कोई शक्ति न चले, कृष्ण नियति को साथ चलाएं।
राम समुद्र को शक्ति दिखाएं, कृष्ण सभा में विराट रूप दिखाएं।
राम स्वयं युद्ध है लड़ते, कृष्ण युद्ध का निर्णय तय करते,
दोनों ही है एक ही प्रभु हमारे, दोनों बेहतर जीवन की सीख सिखाते।

राम नाम जप जीवन तारो, कृष्ण नाम से जन्म सुधारो,
राम राम से सफल हो जाओ, कृष्ण नाम से वैराग्य को पा लो।
राम कृष्ण में बस युगों का अंतर, जपते रहो दोनों ही मंतर,
सफल जीवन के बस दो ही नाम, एक कृष्ण दूजे श्रीराम।
Pari✍️ 




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