Posts

दोस्त, जो चश्मा लगाती है...!

हल्का हल्का मुस्काती है, जब वो मुझसे बतियाती है, कहते कहते रुक जाती है, जाने फिर क्या सोचती है। बातें उसकी खतम न होती, बस जाने क्या वो कहना चाहती है, अरे हां एक बात बताना भूल गया, दोस्त मेरी चश्मा लगाती है। गाल हैं गुलाबी और आंखें शराबी, जुल्फों को खुला ही रखती है, कहते कहते भूल है जाती, फिर थोड़ा सा तब वो इठलाती है। थोड़ी सी वो नटखट है और मन को मेरे बहुत ही भाती है, हां वही मेरी दोस्त, प्यारी सी ....जो चश्मा लगाती है। चलते चलते रुक जाती है, फिर जाने क्यूं पीछे मुड़ जाती है, पसंद है उसको चटपट खाना, किस्से फिर वो सभी सुनाती है। सुबह से लेकर शाम की वो, बड़े ही चाव से मुझको बताती है, हां वो मेरी दोस्त, सही समझे आप...जो चश्मा लगाती है मन की है स्वाणी वो, प्रेम उसका निश्छल, आली जाली नहीं लगाती है, पूर्ण है समर्पण, प्रेम उसका पवित्र, पूर्णता से पहचानी जाती है। पल पल देखूं उसे, निहारूं चारों पहर, आंखों में समा मेरे जाती है, प्रेम की है परिभाषा मेरी वो दोस्त, जो आंखों में चश्मा लगाती है।। Pari✍️ 

अब न कोई ख्वाब सजाएंगे

ख्वाब सजाए थे मैंने भी, लेकिन हर एक चकनाचूर हुआ, जिस जिस को दिल में बसाया, हर एक मुझसे दूर हुआ। खुशियों की थाल सजाकर, कोशिश की थी परोसने की, ठोकर मार मुझे दूर कर दिया, कोशिश रही मुझे गिराने की।। हर एक बंधन टूट गया, वह मेरा मुझसे रूठ गया, लाख कोशिशों के बाद भी, जन्मों का रिश्ता टूट गया। पल पल कोशिश थी जिसके संग, सपनों की दुनिया बसाने की, राहों में काटें बिछा, फिर कोशिश की उसने मुझे मिटाने की। मेरा अपना गुरूर भी टूट गया, जब सबसे अजीज छूट गया, क्या दिन क्या रात भी अब तो, जैसे गमों से रिश्ता जुड़ गया। मैं भला अब क्या ही करता, जब ठान ली उसने दूरी बनाने की, परत दर परत तोड़ा मुझको, थी कोशिश शायद मुझे राख बनाने की। चलो तुमने अगर कह ही दिया, हमने भी भ्रम पालना छोड़ दिया, सांसों की डोर तोड़कर, दुनिया को अलविदा बोल ही दिया। अब न रहेगी शिकायत तुम्हें, न जरूरत पड़ेगी हमसे मिलने की, जाओ अब आजाद हुए तुम, जी लेना ज़िंदगी अपनी मर्जी की। आखिर में बस एक सवाल रहेगा, जरूरत नहीं है उसे भी बुझाने की। क्या कमियां थी मुझमें ऐसी, उम्मीद नहीं थी जिन्हें मिटाने की। जाओ तुमको एक सवाल दिया है, जरूरत नहीं है जवाब बत...

परी की डायरी...मेरी तुम्हारी हमारी कहानी

 जय श्री राम🚩 आज दिन रोज की तरह ही था, सुबह उठना और अपनी दिनचर्या को पूर्ण करना यही तो होता है...लेकिन जब कोई याद करे फोन करे...वह थोड़ा और अच्छा महसूस करवाता है...आजकल विश्व में त्राहि हो रही..युद्ध में अनेक आहूति देने को उतारू हैं..लेकिन इसका लाभ किसे मिलेगा वह तो भविष्य के गर्भ में ही सुरक्षित है...पहाड़ मेरे करीब हमेशा रहा और रहेगा... जीवनपर्यंत...फिर भी मैं पहाड़ अब कम ही जा पाता हूं..  पहाड़ न जा पाने की टीस मुझे अक्सर विचलित तो करती है, लेकिन मैं संभल जाता हूँ... नाश्ता हुआ, वही रोज की तरह वॉट्सउप देखा और शुभ प्रभात....कुछ देर वीडियो देखने के बाद...ऑफिस जाने की तैयारी हो चली...ड्राइवर रोज की तरह हरकत से मजबूर...समय से पहले बुलाने लगा...मै भी सहज कुछ मिनिट पहले तो चला ही जाता हूँ... ऑफिस पहुंच मिलना सबसे....कुछ खिले तो कुछ मुरझाए चेहरे मिले.... और हां उसकी मुस्कान भी आज कायम थी...प्यारी सी...मित्रता और प्रेम ही जीवन में संगिनी को ला सकते हैं.. समाज कहता है.. अन्यथा आप पर शक किया जायेगा, दोषारोपण होगा...पर मै अक्सर मनमौजी सा रहता हूं...कोई पसंद आए तो कह देता हूं..लेकिन म...

होली आई फिर पहाड़ म

 बसंत फिर बॉडी ए ग्याई, दगड़ी म स्वाणु मौल्यार लाई, खिलनी फूल डाली मौली गैनी, धरती थै स्वाणी बणाई मौ (माघ) फर्की फाल्गुन बॉडी, पंचमी मनै अब होली आई। गितेरू का गीत अर ढोलक की‌ थाप से सारू पहाड़ गूंजी ग्याई। फ्यूली खिली बुरांश खिलनी, मेलू-पयां मौली गैनी, गैल्यो दगड़ी गैल्या सभी रंगू मा रंगमत ह्वेनी  याद करी इसकुल्या दिन, मुखड़ी मेरी भी खिली ग्याई, हाथ म गुलाल लेकी, मुखड़ी विंकी मिन पिंगली काई। हैरा बण..फूलों की खुश्बू, डांडियों मा बुरांश की भौंण, पिंगला फूल लया खिलिगे, इन मा मन उदास कन‌मा रौण। फौजी भेजी की जग्वाल अर जरा जरा की आस हम भी, ऐगे बसंत ऐगे मौल्यार, आओ मिली खेला होली सभी। खुद कैकी मन म बसीं, क्वि कनु कैकी जगवाल, पधनी बॉ भी सारा लगी, भाईजी आला घौर  भ्वाल। क्वि ख्यालु का खूयूं कैका, कैक मन रे ग्या मलाल। मेरी भी आस बस आस रै, अर हाथुम कैका नौ कु गुलाल। Pari✍️  

वो गुलाब किताब का

कल फिर शाम वही पुरानी सी आयी, भूले बिसरे जज्बात संग यादें संजो लायी। मिल गए कुछ पुराने ख्वाब कल फिर अलमारी में, कल फिर मिला एक गुलाब उसी पुरानी किताब में। सालों बाद कल वो पन्ना फिर से खोला, ऐसे लगा जैसे गुलाब में से यार मेरा फिर बोला। अरे यार कहां हो तुम, कितनी देर कर दी मुझसे मिलने में, अब तो बताओ क्यों कैद किया मुझे इस किताब में। सवाल वाजिब था लेकिन जवाब कुछ सूझा नहीं, शायद मेरे पास था लेकिन मैंने भी कुछ जवाब दिया नहीं। क्या कशमकश थी तब और क्या हालात थे कैसे बयां करता, बेइंतहा थी मोहब्बत, बयां नहीं कर पाया, कैसे मै बताता। कुछ पल की खामोशी के बाद फिर एक पंखुड़ी उड़ गई, जैसे वो फिर एक बार मेरी जिंदगी से दूर चली गई। उठाया मैने उसे फिर नाजों से.. जैसे कहना हो उसे आज, तब जाने दिया, मजबूरी थी.. लेकिन नहीं जाने दूंगा दूर तुझे आज। वो फूल जो सूख चुका था, जैसे जीवन का सावन बीत चुका था, फिर भी सहमी सी थी वो आज भी, सूखे पत्तों में यादों के सहारे, जीवन में अब फिर से वो वक्त लौटकर नहीं आ सकता था, और शायद वो भी कहीं दूर इंतजार में हो, आखिरी मुलाकात सहारे। Pari 

वो आखिरी खत तुम्हारा

वो आखिरी खत तुम्हारा, वो आखिरी पैगाम तुम्हारा, वो न मिल पाने की बेबसी, वो लिखना बेहिसाब प्रेम तुम्हारा। वो समाज की बंदिशों में बंधकर भी, फिक्रमंद रहना तुम्हारा, वो आखिर लिखावट लाल स्याही से, वो अलविदा कहना तुम्हारा। हर बात याद है तुमको, जैसे आज भी वहीं हो ठहरी तुम, मै हर बार ही नासमझ निकला, और मुझे हर पल ही समझाती तुम। वो पहली मुलाकात अजनबी वाली, वो मेरा तुम्हे देखते रह जाना, लिखा था तुमने वो लम्हा भी, वो लाखों की भीड़ में तनहा सा हो जाना। बहाने ढूंढकर था करता अब मैं, हर तरफ बस तलाश इक तुम्हारी, न नाम ही था मालूम मुझे तब, न पते की थी कोई जानकारी। वो शायराना अंदाज मेरा, हर शायरी में बस तारीफ तुम्हारी, लिखा था दूसरे ही पन्ने में, इंतज़ार था मुलाकात का तुमको भी हमारी। हुई थी ख्वाहिश मुकम्मल फिर, 12वें दिन दूसरी मुलाकात से, महसूस किया था मैने भी, मुस्कुराई थी तुम भी उस दिन दिल से। फिर न जाने कब खास हो गए हम, हम जैसे किसी अजनबी से, लिखा था तुमने ये भी, पास हो अधिक तुम मेरी दिल में धड़कन से। वो बारिश का दिन था याद है, वादा मुलाकात का था तेरा भी, तूफान भी था भारी आज, साथ फिर थी चमकती बिजली भी...

फिर वो फरवरी नहीं आई

पहली मुलाकात का वो गुलाब याद आता है, तुझे दिया वो मेरा प्रीत वाला कार्ड याद है। तुम कितनी खूबसूरत हो कहा था मैने याद है मुझे, तेरी वो खूबसूरत दबे होठों की मुस्कान याद है मुझे। वो आखिरी बेंच स्कूल का, वो तीसरी पंक्ति में तुम थी, वो पांचवीं घंटी स्कूल की, वो बेरुखी भरी निगाहें तब थी। वो 30 में से 27 मिनट देखना तुम्हें, वो गुस्साई नाक याद है, फिर तेरा थोड़ा सकुचा के देखना और वो सुकून याद है। वो पहली बार तुम्हारा मुझे देखकर मुस्कुराना, वो सहेलियों संग फिर नजरअंदाज कर चले जाना, इक पल को तो बस ऐसा लगा जैसे सब सिमट गया है फिर दूर जाकर तेरा वो पलटकर देखना आज भी याद है। एक सप्ताह बाद की वो मुलाकात थोड़ी असहज तो थी, लेकिन खूबसूरत इतनी की जैसे कब से अधूरी सी थी। पहली मुलाकात की खाली क्लास आज भी याद आती है, तेरे गाल की वो लाली और पहली बार की वो छुवन याद आती है। पहले दोस्त और फिर अनकही वो मोहब्बत खूबसूरत थी, वो स्कूल जाने की ललक और तुझसे मिलने की चहक खूबसूरत थी। न जाने फिर कब वो आखिरी और तीसरी बेंच एक हो गई, संग तेरे फिर मेरी अकाउंटस भी जैसे केमिस्ट्री हो गई। तेरे संग समय बिताने की अब तो बस वजह तला...

मेरा उससे मिलना तन्हाई में..

कुछ पल जो मैं बैठा तन्हाई में, तुम आ गई ख्यालों में, थोड़ी सी शर्माई तुम और थोड़ी सी थी तुम मुस्कायी। इक पल तो बस ऐसा लगा तुम हो पास मेरे बैठे प्रिये, फिर दूजे ही पल जैसे मुझे अपनी फिर सुध आयी। देखा मैने इधर उधर, ढूंढा तुझे फिर किधर किधर, बस एक अकेला था मै, और तन्हाई थी फैली तब। फिर आया एक ख्याल मन में, तुझको भी लेकर। सपनों में है आती जो हकीकत में मिलेगी जाने कब। तेरा वो मुस्काता चेहरा, तेरी वो शर्माती आँखें, तेरी वो बातें अलबेली, तेरी वो गुस्साई आंखे। तेरी वो बेपरवाही संग, तेरी वो जल्दी बाजी। तेरा वो बिछड़न का डर, तेरी वो भीगी आंखे।  तनहाई तो तनहाई है, कुछ भी याद दिलाती है, भूले बिसरे ज़ख्मों को, अक्सर ही ताजा कर जाती है। जितना चाहो रहना दूर, यादें तो याद आ जाती हैं, तनहाई कहने को है बस, असल में तो तुझसे मिलाती है। माना तनहाई थोड़ी खराब है, लेकिन खुद से मिलने का मौका है, भूले बिसरे लम्हों को, फिर से जीने का एक सलीका है। अगर सीख लो तुम तनहाई में, खुद ही खुद से मिलना, तो फिर उससे बेहतर नहीं लगेगा, जीवन तुमको जीना। Pari ✍️ 

Pari की कल्पना (परिकल्पना)

यूहीं तो होती नहीं होगी बरसात सावन में, किसी कहानी में इसका भी कोई किस्सा होगा। भरी आंखों से नीर बहते होंगे आसमां के शायद, टूटा जब दिल कोई उसका हिस्सा होगा.. मैं कहूं कि तुम पहली हो, तो ये झूठ हो भी सकता है, लेकिन तुम्हारे बाद अब कोई और हो नहीं सकता। तुमसे है मोहब्बत इतनी मेरी जान अगर यकीं मानो तो, तुम्हारे बाद और कोई मेरी मोहब्बत पा नहीं सकता। बताओ ताउम्र उसके एक शब्द के लिए तरसता रहा, कि कहे क्यों फिक्र करते हो तुम पूरी दुनिया की .. मैं हूं ना तुम्हारे साथ क्यों फ़िक्र तुम्हें किसी और की जब मेरा साथ और एहसास है तुम्हारे पास... हर एक बार निराली है, हर मुलाकात निराली है, जब जब मिला तुमसे, एक एक मुलाकात निराली है। बातों से तुम सहज भले, लहजा तेरा कुछ और ही है, चेहरा तेरा फूल सा कोई, निगाहों की झलक कुछ ही है। Pari✍️ 

प्रेयसी या हो तुम पत्नी या फिर दोनों.?

प्रेम की है अनुभूति अटल, प्रेम है जिसका संपूर्ण निश्छल, पत्नी है वो या प्रेयसी बताओ, बहता है जिसका प्रेम अविरल। मानव जीवन का अनूठा वो संगम, करती आहें उसकी कलकल, स्वयं तो है जैसे ठहरी वो, पर बहता है प्रेम उसका जैसे कोई जल।। प्रथम चुंबन हो उसका चाहे, या हो प्रथम उसका आलिंगन, ठहरा है मेरा तो प्रतिपल, न जाने क्यों उसपर ये मन। आभास हो उसके होठों का या उसका वो कोमल सा बदन, एहसास है मुझको आज भी लेकिन, उसका वो सादा भोलापन। आंखों की वो सकुचाहट और होठों की भीनी मुस्कान, बारिश की वो मोटी बूंदे और उसमें उसका वो सूखापन। आंखों में शर्म थी उसके और बदन में थी कोई जैसे सिकुड़न, रह गया था देखते ही उसको, आ गया था उसपर मेरा मन। प्रेम का वो आभास था पहला, पहली हो जैसे सावन की बारिश, भीनी भीनी बूंदे वो ऐसी, जैसे की हो मैने कोई ख्वाइश। क्या था वो मै समझ न पाया, प्रेम था उसका या मेरी आजमाइश, जो भी था जैसा भी था, लेकिन पूर्ण हुई मेरी एक ख्वाइश। अलग ही थी वो अनुभूति उसकी, अलग ही था वो अपनापन, अलग नशा था उसका मुझको, अलग ही था वो मेरा लड़कपन। कौन थी वो कहां से थी आई, जैसे भेजी हो कोई पारियों की रानी, एक बार तो सोच...

एक दोस्त बड़ी निराली है...!

थोड़ी नटखट थोड़ी भोली भाली सी, एक दोस्त है मेरी बड़ी निराली सी। अक्सर वो मुझसे मिलती है मन की अपने सब कहती है थोड़ा है गुस्सैल भले, लेकिन मुस्कान भी उसकी प्यारी है। एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। अभी मिला हूं उससे, बस कुछ दिन का है साथ हमारा, फिर भी ऐसे मिलती है जैसे सालों का हो कोई नाता प्यारा। व्यवहार उसका बड़ा सादा है, जैसे है वैसे दिखती है, मस्त मौला है उसका मन, खुलकर वो जीवन जीती है एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। कभी सताती, कभी बताती, कभी वो गुमसुम सी हो जाती। फिक्र है करती न जाने किसकी, लेकिन चेहरे को शांत है रखती। इधर उधर की नहीं है करती, लेकिन खबर वो सबकी है रखती, स्वाद है उसकी बातों में, करती बातें वो मतवाली है, एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। एहसास है उसको जिम्मेदारी का, रिश्तो में रखती है तालमेल, किससे कैसे रहना है, कौन है कैसा, जानती दुनिया के है सारे खेल। अंदर बाहर का समन्वय, रखती सब जग से है पूरा मेल, गोरे रंग का उसे भ्रम नहीं, स्वयं रंग में थोड़ी काली है। मेरी एक दोस्त बड़ी निराली है। Pari✍️

गलती हर बार मेरी ही

क्यूं भला मैं बदला सा दिख रहा, क्यों मेरा मिजाज बिगड़ा, सवाल था उसका फिर वही, काश उसने पूछा होता खुद से कभी। मैं दुनिया से लड़कर भी उसी का था, वो एक खुद से भी न लड़ सकी, फिर भी मैं गलत मेरी गलती, वो तो बस मासूम ही रही तब भी। मैं जितना पास जाने की कोशिश करूं, वो दूर दूर हो जाती है, मेरी चाहत को वो न जाने, क्यों खुद से ही ठुकराती है। आज मोहब्बत है उससे मेरी, वो दूरी बनाने लगी है न जाने क्यों, मैं बदल गया अगर तो, फिर सवाल होगा कि तुम ऐसे क्यों। यकीनन मर्द ही गलत होता है, ऐसा नज़रिया है जमाने भर का, लेकिन ख्वाइश तो होती है, कुछ तो अधिकार होंगे न उसके भी। बस बहाने बना वो अलग हो जाते हैं और दोष फिर वही हम पाते हैं, शायद हम भी गलत हों, क्योंकि स्वयं के अधिकार की बात करते हैं। ए मर्द तेरी कोई औकात नहीं है, तू बस पिसने को मात्र आया है, तू निभाता रह फर्ज अपने, और खो जाना फिर कहीं जहां में। तेरी चाहत बस दबी रहेगी, तू बस पिसते ही रहना चक्की में, और फिर हो जाना गुम ढूंढ कोई बिल दुनिया की मस्ती में।। Pari✍️

तुम बस एक एहसास हमारा

सोचा कि लिखें कुछ तेरे बारे में भी आज हम, फिर कलम तोड़ दी हमने और मुस्कुरा दिए। तेरे लिए जो एहसास है मेरे दिल में हमेशा से, वो बस महसूस करना है, इसलिए उसे शब्द नहीं दिए। वो मुलाकात पहली, वो बात तुमसे पहली, वो मुस्कुराना तेरा, वो झुकी नजरे तेरी पहली। वो तेरा शर्माना मुझसे, वो अदाएं तेरी सब निराली, बड़ी मासूम सी दिखती थी, वो तुम बिलकुल भोली भाली। याद है मुझे तुम्हारी वो घबराहट, डर डर के बातें करना, जानती थी तुम सब, फिर भी मुझसे दूर दूर रहना। मन तुम्हारा भी मिलने को करता था, लेकिन रोज एक नया बहाना, यूंही तुम रूठ जाती थी तब, और भी जल्दी तेरा मान जाना। वो फिर मुलाकातें बढ़ी हमारी, वो मिलन की चाहतें हमारी, तुम थी बंदिशों में तब भी, और पास आने की जिद्द वो हमारी। बस एक पैगाम तेरा फिर आता, कि क्यों तुम्हें यार समझ नहीं आता, वो चिट्ठी से समझाना तुम्हारा, और तुम पर मुझे फिर और प्यार आता।  वो आखिरी बात तुमसे, वो आखिरी मुलाकात तुमसे, वो आखिरी वादा तुमसे, वो फिर न मिलने की बात तुमसे। वो भीगी आंखे तुम्हारी, वो भारी कदमों से बिछड़ना तुमसे। वो आखिरी चुम्बन तेरे गालों का, वो आखिरी गले लगना तुमसे। सच...

वो बारिश तेरी वाली✍️

 एक अरसा हो गया तुमसे मुलाकात हुए, शायद अब तुम  हमारी झलक भी हो भूल गए। क्या वो पार्क का बेंच तुम्हे अब याद आता नहीं? वो आखिरी मुलाकात की अधूरी बात सताती नहीं..? आज फिर तुम शिकायत करोगी, जिक्र क्यों करते हो मेरा सावन में, मैं समझती हूँ याद कर रहे हो, हिचकियां बता रही हैं, पर क्या लिखना और एहसास को शब्द रूप देना जरूरी है, क्यों लिख रहे वो किताब, जिसकी कहानी अधूरी है। पर मैं भी क्या करूं यार, कलम खुद ही तुझे लिख देती है, वो तेरा बालकनी से बरसती बूंदों को निहारना.... तुम अब शायद नहीं आती होंगी बाहर पहले की तरह, लेकिन मेरी आँखें तो बस वही सावन खोजती हैं। आज फिर सफर में हूं, फिर वही बारिश है.. हाँ! तेरे वाली, यूं तो बारिश शायद एक सी होगी, तेरे वाली कुछ खास थी। अब न वो सावन आता है, न ही वो बादल फिर कभी बरसे, वो ख्वाइश अधूरी ही रही, हम ताउम्र बस एक तुझको तरसे। तुम दूर हो आज याद आ गई, मुस्कुराते रहना बस यही ख्वाइश है, देखते है कब तक यादों में रहोगे, अब तो सांसों की यही आजमाइश है। तुम भूल जाना तुम्हारे लिए आसान होगा, मै यादें संजो के रख लूंगा दिल में रखूंगा तस्वीर तेरी और तेरी यादों सं...

अपने अपने युग के भगवान..!

राम अगर रामत्व छोड़ दें तो फिर मर्यादा कौन सिखाएगा कृष्ण अगर छल न करें, तो कौरवों को कौन हराएगा। न त्रेता कृष्ण को अपनाए न द्वापर में राम आ पाएंगे, हर युग की अपनी कथनी है, अदला बदली न सह पाएंगे। राम तो बस मानव सा जीते, कृष्ण अपना अस्तित्व दिखाते, हनुमान जी बस आज्ञा मानें, अर्जुन बिन तर्क तीर न साधे। स्वयं प्रभु होकर भी राम जी, वानर सेना से सहमति लेते, मैं ही हूं त्रिभुवन का स्वामी, कृष्ण जगत को स्वयं बताते। हर युग की अलग है चाल, हर युग की अलग है माया, सतयुग में तप होते थे, द्वापर में यज्ञ से काम बन जाता। द्वापर में जपतप के संग स्वयं कृष्ण गीता ज्ञान दे रहे, कलयुग बड़ा सौभाग्यशाली सिर्फ नाम से काम  बन जाता। राम भटकते जंगल जंगल, कृष्ण विश्राम करें वृंदावन, राम सिखा रहे संघर्ष जीतना, कृष्ण संघर्ष के कारण बताते। राम सिखाएं मर्यादा ने रहना, कृष्ण स्वयं जाते हैं तपोवन, राम चलते हैं समाज के साथ, कृष्ण समाज को साथ चलाते राम व्यथित हैं जनकल्याण को लेकर, कृष्ण स्वयं नियम बनाते, राम पांव छूआकर अहिल्या तारे, कृष्ण द्रौपदी चीर बढ़ाए। राम सबरी के बेर को खाएं, कृष्ण घर घर जाकर माखन चुराएं, राम ना...

पहाड़ और पहाड़ी बचाओ

मेरी पहचान बल उत्तराखंड, मेरी शान बल देवभूमि है, मैं हूं पहाड़ी गर्व है मुझे, मेरी बोली भाषा गढ़वाली कुमाऊनी है। चारों धाम है मेरी पहचान, मेरी जान देवभूमि में बसती है, मैं हूं करता धन्यवाद प्रभु का, जो उत्तराखंड मेरी जन्मस्थली है। कितना अच्छा लगता है, कितने प्यारे बोल दिखते हैं, लेकिन क्या जीवन में मनन किया, सवाल फिर ऐसे उठते हैं। मैं पहाड़ी मै उत्तराखंडी, गर्व से नारे रोज बजते हैं, उत्तराखंड की फिक्र हम देखो, दूसरे शहरों में बस करते हैं। आज उत्तरायण है बल दिल्ली में कौथिग लगाते हैं, लेकिन क्या खुद हमारे बच्चे मकरैणी का महत्व जानते हैं? घुघतिया हो या रोटल्या बार, बस स्टेटस तक सीमित रह गए, हम तो बस अब पिज्जा बर्गर और चाउमीन के शौकिन हो गए। अच्छा है कौथीग़ लगाओ, खूब भीड़ पहाड़ की एक जुट करवाओ, लेकिन सिर्फ नाच गाने तक नहीं, पहाड़ बचाने की मुहिम भी गाओ। संस्कृति सिर्फ मेलों से नहीं, परिवार में भी घोलनी पड़ती है, डीजे पर देवता नाच रहे, क्या नहीं ये देवभूमि की बेइज्जती है। पैसे की माया है हर जगह, पैसे का हो रहा है मेल, नेता हो या इनफ्लुएंसर, व्यूज पाने का कर रहे खेल। न भू-कानून, न अतिक्रमण, न...

गुलदार मुक्त हो या गुलदार युक्त पहाड़

आंखों से नींद खो चुकी है, दिल का सुकून अब कहीं खो गया है, जब से देवभूमि में गुलदार का आतंक बेइंतहा हो गया है। हर समय एक डर लगा रहता है अब हर उत्तराखंड के वासी को। कहीं गुलदार उठा न ले जाए मुझे या मेरे किसी करीबी को। रोज की हर जरूरत को भी डर के माहौल में रहकर पूरी करना होगा, मैं पहाड़ी हूं जरूर लेकिन पहाड़ में मुझे अब डर के रहना होगा। न घास अकेले अब ला सकता हूं, न गाय-बकरी अकेले चरा सकता हूं, न सुबह जल्दी और न ही शाम देर तक खेतों में काम कर सकता हूं। भय में हूं जी रहा मैं रोज, न पी न सही से कुछ खा ही सकता हूं। अपनी आप बीती किसे बताऊं, रात सपने में भी गुलदार ही देखता हूँ। एक जगह से पकड़ रहे और दूसरी जगह गुलदार को छोड़ दे रहे, एक को दिलासा दे कर के ये दूसरे पहाड़ी की जान खतरे में डाल रहे। कल तक बस गुलदार का डर था, आज सुअर भालू और आ गए। बच्चे से लेखर बूढों तक को, ये निशदिन अपना निवाला बना रहे। बल मर जाओ कोई बात नहीं, 10 लाख मुआवजा मिल जायेगा, तुम्हारी जान जाए तो क्या, गुलदार का पेट तो भर जायेगा। आज  गढ़वाल हो या कुमाऊं क्षेत्र, गुलदार के आतंक से है त्रस्त, जनता हर रोज मर रही यहां, प्रत...

कौन जिम्मेदार? तलाश जारी..!

मन व्यथित होता है देख, खाली हो रहा गांव आज हर एक, वीडियो बन रहे पहाड़ पर, बल अब रहना नहीं है यहां सेफ। आपदाओं का घर है ये, तो कोई कह रहा गुलदार से बचाओ, कौन है इसका जिम्मेदार, मनन कर अब आप ही बताओ। विकास की ताल ठोक, अतिक्रमण हटाने का था बहाना, तोड़ हमारे पुस्तैनी घर बार, न जाने किसे था इनको बसाना। चौड़ीकरण के नाम पर,  पहाड़ हमारा उजाड़ दिया, कौन है जो विनाश कर रहा, और विकास का उसको नाम दिया। पहाड़ की जवानी और पहाड़ पानी, दोनों को बांध दिया किसने, कौन है वो तीर्थों को भी पर्यटक स्थल बना दिया जिसने। महायोजना है बल कोई, बद्री केदार धाम को चमकाने की, कौन समझाए इन मूर्खों को, देवों को पसंद है जगह शांति की। विकास के नाम पर योजना चला रहे, साल दर साल पहाड़ उजाड़ रहे, केदारनाथ आपदा से सीख नहीं ली, थराली, धराली को न्योता दिया। बिजलीघर बना अनेक, बादल को फटने के लिये मजबूर था किया। रोजगार हमारा छीन लिया और बल देखो हमने तुम्हारा विकास है कर दिया। अब फ्री का लैमचूस दे रहे और इसको भी विकास कह रहे, खेती करवाकर बंजर सबकी, अब सम्मान निधि हमें वो दे रहे। न ढोल बचे न लौहार रहे, बस अब DJ और tent लग रहे...

स्कूल फिर से, वही पुराने दोस्तों संग

आज फिर स्कूल के प्रांगण में खड़ा था, पुरानी वो सारी बातें याद आ गई। एक पहला दिन था न जाने की जिद्द थी, एक वो आखिरी दिन यादें भरपूर थी। पहला दिन जब गए तो जेल सा महसूस हुआ मां पापा दुश्मन लगे स्कूल जाना सजा सा अखरा। गुरुजी में कोई शैतान जैसे नजर आया था, वो पहला दिन लगा जैसे कोई खराब साया था। फिर आदत सी होने लगी और स्कूल से प्यार होने लगा, किताबें थोड़ी बोझिल जरूरी थी लेकिन बस्ता हल्का होने लगा। पढ़ाई का बोझ था जो कंधे झुका देने की क्षमता रखे था, लेकिन वो हाफ टाइम की घंटी में सुख कुछ अलग ही था। दिन बीतने लगे कक्षाएं 1 से शुरू हो सीढ़ियों सी बढ़ने लगी, पांच साल का वो बच्चा अब किशोर अवस्था में आने लगा। खेल खिलौने से दूरी और किताबें करीब होने लगी, जिंदगी ठहरी थी जो अब तेजी से दौड़ने लगी। वो स्कूल की कक्षा वो गुरुजी की डांट और वो दोस्तो का साथ, क्या नहीं था बताओ जीवन में मेरे तब खास, अब तो बस घर से निकलने की देरी थी, पढ़ाई जैसे करने का बस अब अबेरी थी। कब मैट्रिक और फिर 12वीं पूरी हो गई पता ही नहीं पता जब मस्ती जिम्मेदारी बन गई, विश्वविद्यालय तो बस एक सीढ़ी भर रह गया था, उम्मीदों पर खरे उतरने ...

पहाड़ अब आपदा कु भंडार

विकास का नौ फर विनाश कना किलै तुम। हमरी पुंगडी बाँजा  करी, अफ्फू देहरादून बस्याँ किलै तुम। पाणी रोकी बांध बणै, आपदा थै न्यूतू दीणा किलै तुम? सड़क बणै गौ कु रस्ता बाघ थै बताणा किलै‌ तुम..? रोड टुटी लोग‌ मरी, बस मुआवजा तक सीमित तुम, आपदा आई कुड़ी बोगनी बस तमसु देखणा रया‌ं तुम। फसल फूकी सुंगरु न, देहरादून सुनिदं सियाँ तुम। न क्वि देखणु, न खोज होई, बस बौंहडा प्वण्या तुम। पलायन फर ज्ञान दीणा, पर योजना कुछ नि बणांदा तुम, रोजगार फंडू फूका, शिक्षा स्वास्थ्य भी नि दे सक्यां तुम। कनु कै रालू पहाड़ी पहाड़ मा, जब मूलभूत सुविधा भी हुयीं गुल, बाघ, सुंगर, और भालू से आज, सरू पहाड़ देखा हुयूं फुल। अब त चेती जाओ सरकार, आपदा की आयीं भरमार, कभी भालू, कभी सुन्गर त कभी गुलदार कु करूं अत्याचार। भोल दोष नि दियां जनता थै, जब सुरक्षा म उठाली हथियार। कनु कै संघर्ष‌ इनमा करलो "Pari," कुछ त करा अब तुम विचार। ©®Pari✍️