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प्रकृति की है यही पुकार, पेड़ बचाओ अबकी बार

गर्मी का है प्रकोप अटल, सारी दुनिया पर है इसका कहर, क्या दिन क्या रात भला, त्रस्त है दुनिया चारों पहर। दिन में बाहर निकले अगर, तंदूर सा तुम जल भुन जाते हो, रात को भी तो गर्मी से, तुम चैन से कहाँ सो पाते हो।। तापमान का तो क्या कहना, 40 छोड़ो 50 पार होने को है, पसीना ऐसे बह रहा बदन से, जैसे सैलाब कोई आने को है। रह रहकर चलती है लू दिन में, फिर आता है तूफानों का कहर, बारिश की उम्मीद में मानव, छाता लिए करता है मेहर।। एक था जमाना वो भी जब, मई जून से डर लगता था, क्यूंकि आसमा सिर्फ इन्हीं दो महीनों में अधिक तपता था। आज क्या मार्च क्या जुलाई है, जैसे धूप ने पंचायत बुलाई है, अब तो दिन दिन पारा चढ़ता है, और आदमी गर्मी से मरता है।। हे ईश्वर तुमसे है अब अर्जी, सुन तो लो बाकी जैसी आपकी मर्जी, थोड़ा तो एहसान करो हम पर, सुन लो मानव की तुम अर्जी। समय समय पर बारिश कर के, कर दो सब पर तुम एक एहसान, बदल मौसम कर दो सुहाना, ताकि बची रही हम सबकी मासूम सी जान।। बात अगर समझी जाय, तो इसमें है बस हमारी भागीदारी, पेड़ काट घर बनाए हमने, कर तापमान बढ़ाने की तैयारी। फिर बची हुई कसर और निभाई, अपनी सहूलियत को तकनीक बना...

उसकी फिर वापसी इस दिल में

आज फिर जैसे वही लम्हे फिर लौट आए, सालों बाद जब उसी आंगन में वो फिर शर्माए। लगा जैसे आम का पेड़ फिर फल देने लग गया, और वो पुराना पीपल फिर से हरा भरा हो गया। कुछ तो बदला नहीं, ऐसा क्या हुआ आज की शाम में? कुछ खास नहीं बस वो वापिस आ गई अपने गांव में। उसकी वो चहकती मुस्कान, उसकी वो बातें निराली, उसके लौट आने जैसे, सभी खेतों में आ गई हरियाली।। वो सूना पनघट अब फिर से आबाद हो जायेगा वो पुराना गांव का रास्ता फिर से रौनक पाएगा। उसके आने से जैसे बाजार फिर सजने लग गया है, उसकी एक झलक के बाद मेरा दिल खिल गया है। आंखे उसकी जैसे सागर, जुल्फों में समाए जैसे काले बादल, हर बार वो अलग सा दिखती है, खनके जब जब पांव की पायल, होठों की मुस्कान तो ऐसे, बागों में खिलते लाखों फूल हो जैसे। अब तुम ही बताओ ऐसी अदाओं से बचकर दूर जाएं तो कैसे।। वो बातें उसकी मीठी मीठी, आज भी मिसरी खोल रही हैं, वो आखिरी मुलाकात की कसक, फिर आज बोल रही है। वो फिर न मिलने की कसम आज वो खुद तोड़ गई है, जाते जाते फिर मिलने की नई एक आस छोड़ गईं है।। Pari ✍️ 

प्रेम की है दोनों परिभाषा

प्रेम की है परिभाषा जैसे, प्रेम स्वरूप है उसक समर्पण, जीवन कर नाम पति के, तन मन कर देती है अर्पण। सारे दुःख सुख साथ निभाए, स्वयं हो जैसे कोई दर्पण, भूल सभी ख्वाबों सपनो को, जीवन उसका संपूर्ण समर्पण।। हाथ थामती अजनबी होकर, पल में जीवन के करती निर्णय, पिता की साख ऊंची रखती, रखती न मन कोई भी संशय। जिम्मेदारी का बोझ उठाए, कोमलता में करती वह परिणय, सहनशीलता, समझदारी का संगम, व्यवहार में रखती प्रतिपल विनय। नया घर होगा, नव परिवार होगा, मन में आता कोई न भय, हर एक वार है सहती हंसकर, लेकिन पाती कभी न शय। सबको लेकर साथ चलना है, शुरू से वह कर लेती तय, फिर तो पल पल आगे बढ़ती, नहीं बिगड़ती अब कोई लय। न कोई ख्वाइश न कोई सपना, कह देती है सबको हंसकर, लेकिन मन में हैं उसके कुछ, जानता है सिर्फ एक उसका वर। हर कोशिश में उसकी खुशियां, उसके लिए ही तो है चारों पहर, कोई दुख न आए उसको, पति के मन में रहता है ये डर।। रात अकेली कट जाती है, दिन में दोनों की चलती तकरार, झूठमूठ के इन झगड़ों में, रखा है संजो जन्मों का प्यार। एक दूजे के लिए है जीते, माने एक दूजे को ही संसार, हृदय पटल पर एक है दोनों, जैसे सिंधु और लहर।।...

सहज जीवन का सत्य अटल

मुश्किल थोड़ा होता है, दूर कहीं घर से रहना, विपरीत परिस्थितियों मे दुःख पड़ता है सहना। चारों पहर तुम स्वयं निर्णय करते हो रोजाना, अंत में सोचते हो क्या ही मैने खो और है पा लेना।। रात गुजरती है करवट बदले, नींद नहीं आंखों में होती, दिन के चारों पहर तो बस, दौड़ भाग ही हिस्से आती। न खाने का कोई समय है, न पीने का ही समय है मिलता, 12 महीने सातों दिन, बस चरखा है वो चलता।। घर छोड़कर निकले थे, सपने लाखों आंखों में बसाये, जी तोड़ की थी मेहनत हमने, करने पूरा जो सपने थे सजाये। साल बीत गए अनेकों लेकिन, सपने सारे अधूरे रह गए, रेत से बनाए थे घर जैसे, बारिश आयी और सारे बह गए।। गाँव छोड़कर शहर गए, सुकून नहीं फिर भी पाया, जो था गौरव गाँव में, शहर पहुंच उसे भी गवाया। बड़ी देर से समझ मिली, वक्त गवाकर फिर अक्ल बढ़ी। सालों के संघर्ष के बाद भी, ज़िन्दगी जस के तस थी पड़ी।। अब सपने बेचकर हक़ीक़त खरीद रहा, झूठे झांसों से बाहर निकल रहा, देखे थे जो सपने जीवन में, सपनो से उन अब बाहर निकल रहा। अब तो बस नियति अपना रहा हूं, जो चाहे वह उसे हकीकत जान रहा हूं। अब तो समय के बहाव में बह जाना है, सहज मान जीवन स्वीकारना है।...

पंछी पिंजरे सा उड़ जाऊंगा

प्रेम है उससे मेरा निश्छल, नहीं कोई उसमें स्वार्थ भरा, हर सांस है मेरी उसके नाम, कुछ भी नहीं अपने पास धरा। मेरी परीक्षा वो कभी भी करे, मै हरदम ही रहता तत्पर हूं, प्रेम में उसके मै डूबा प्रतिपल, उसी के लिए जैसे अब जीता हूं।। हर रोज उसकी याद है आती, नम आंखे अपनी छिपाता हूं, जान न सके कोई राज ये मेरा, आंखों में चश्मा लगाता हूं। मेरे प्रेम की वो परिभाषा, जीवन के मेरे है इक अभिलाषा, मैं बस उसको देखता हूं, वो पढ़ती है मेरे नयनों की भाषा।। अनेकों बार समझा चुका हूं, लेकिन वो कहां राजी होती है, मैं हूं उसके प्रेम में डूबा, वो बस इसे पागलपन बताती है। मेरी है नादानी या कुछ और, हर पल याद उसकी सताती है, मैं हूं तनहा आज भी यारो, वो बस ख्वाबों ख्यालों में आती है।। मेरे प्रेम को आजमा रही, मुझसे खेला वो करने है लगी, सब कुछ है न्यौछावर उसपर, सबको ढोंग वो बताने लगी। प्रेम है मेरा उससे अविरल, तन की भूख वो समझने लगी, दूर जाने पर सोचेगी वो, आज भले नासमझी है करने लगी।। यादों का पिटारा दे जाऊंगा, झोली में सितारे भर जाऊंगा। प्रेम करूंगा निश्छल अविरल, काया छूने का प्रयास नहीं करूंगा। प्रेम परीक्षा है अगर बिछड़न...

बिन तेरे अब कोई आस नहीं है "वैराग्य"

थोड़ा समय अवश्य लगता है, लेकिन फिल्म समझ में आ जाती है, हर बार नायक सही नहीं होता, कभी कभी कहानी बदलनी पड़ती है। सावन तो यूहीं बदनाम होता है, मौसम तो प्रेमिकाएं बदलती हैं, रंग बिरंगे धर के रूप, नायकों को ये निशदिन ही छलती हैं। बादल तो बरस कर चल देते हैं, बस रह जाती है बारिश तनहा, जैसे पतझड़ के आने पर, पेड़ सहे पत्तो का बिछड़ना। हर एक पत्ता टूट जाता है, खाली बच जाती है ठूंठ, तेरी विरह में मै भी लुट गया, खंडर पीछे गया बस छूट। आखिर कब तक विरह सहें, यादों के सहारे हम जियें, कौन सी देहली अब तन रगड़ें, कौन सी सजा अब हम सहें। आखिर कब तक तप करना होगा, कितने साल अभी जपना होगा। अब तो आ जा टीस मिटा जा, कब तनहा बिन तेरा रहना होगा।। ख्वाब भी सारे बिखर गए, अब तो बस एक आस बाकी है, दुनिया सारी पीछे छूटी, तेरे मिलन की बस प्यास बाकी है। अब तो बंधन तोड़ के आ जा, सारे झरोखे मोड के आ जा, तेरे लिए ही ये सांस बाकी है, तेरे मिलन को ये जान बाकी है।। अधिक लिखने का हाल नहीं है, प्रेम के अलावा कोई जाल नहीं है, कलम की स्याही बिखर गई है, कलम में अब वो ताकत नहीं है। मुझको अंतिम दर्शन दे जा, बिन तेरे जीना कोई आस नहीं...

तेरी यादों की बारात रुक गई

कुछ सुकूँ तो दिल को जरूर मिल गया है, तेरी मुस्कान का दीदार जो हो गया है। वर्षों से प्यासी थी जो आँखे एक झलक को, जैसे आज कोई अमृत रस पान हो गया है।। क्या कहूँ तुझे कैसा ये इंतज़ार था मेरा, बिन तेरे जैसे हर तरफ बस था अँधेरा। हर आस भी अब दम तोड़ने को थी जैसे, आने से तेरे एक जीवन प्राण मिला इसे। अगर होती कोई तपस्या तेरे मिलन को, हंस कर वर्षों किया करते हम भी तेरे लिए। दुवाओं के सिवा कोई विकल्प न था पास यारा, बस ताउम्र बस एक वही तो करते रहे। साथ जो छूट गया एक बार, फिर कहां मुलाकात होती है, दूर जाने के बाद तो बस, अपनी भी जैसे परायी होती है। आखिरी मुलाकात से लेकर आखिरी झुकी निगाहें तेरी। फिर सारे गम मेरे हो गए और खुशियां तमाम हो गई तेरी।। चल अब वादा कर की भूल जाएंगे हम एक दूजे को, अगर हुई मुलाकात तो समझेंगे अजनबी हम दोनों को। सारी यादों मुलाकातों को बस सीने में छुपाकर रखेंगे, सिले होंठों के साथ ही दुनियां को अलविदा हम कहेंगे।। Pari ✍️