गर्मी की आपबीती
अगर गर्मी का जो मौसम भी अपने दिल की बात किसी को कह पता, तो बिना कहे वह भी रह नहीं पाता। सबको झुलसा रही है गर्मी, अब मैं तो खुद भी झुलसा हूं जाता। तप रहा हूं रात दिन, चैन न कहीं अब स्वयं हूं पाता, तुम तो लगा लेते हो AC, कूलर, मेरी भला जहान में कौन सोचता।। पेड़ तुम काटो, सीमेंट तुम बिछाओ, इसमें मेरा भला क्या योगदान था, तुम झेलते अपने कर्मों का फल, देना मेरा क्यों फिर बलिदान था। कुछ मिनिट की गर्मी सहकर, तुम बिलों में अपने चले जाते हो, इसी तपती चुभती गर्मी में, मुझे अकेला छोड़ जाते हो। न कोई मेरा अब जोर चलेगा, मै यूहीं दिन दिन तपता रहूंगा, तुम अगर अभी ना सुधरे, रोज फिर तिल तिल मै मरूंगा। इसी गति से अगर जंगल, पेड़ कटेंगे, फिर सिर्फ सीमेंट के जंगल दिखेंगे, आज भला तुम खुश हो जाओ, भविष्य पीढ़ियां तुम्हे ताने देंगे। Pari ✍️