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वो आखिरी खत तुम्हारा

वो आखिरी खत तुम्हारा, वो आखिरी पैगाम तुम्हारा, वो न मिल पाने की बेबसी, वो लिखना बेहिसाब प्रेम तुम्हारा। वो समाज की बंदिशों में बंधकर भी, फिक्रमंद रहना तुम्हारा, वो आखिर लिखावट लाल स्याही से, वो अलविदा कहना तुम्हारा। हर बात याद है तुमको, जैसे आज भी वहीं हो ठहरी तुम, मै हर बार ही नासमझ निकला, और मुझे हर पल ही समझाती तुम। वो पहली मुलाकात अजनबी वाली, वो मेरा तुम्हे देखते रह जाना, लिखा था तुमने वो लम्हा भी, वो लाखों की भीड़ में तनहा सा हो जाना। बहाने ढूंढकर था करता अब मैं, हर तरफ बस तलाश इक तुम्हारी, न नाम ही था मालूम मुझे तब, न पते की थी कोई जानकारी। वो शायराना अंदाज मेरा, हर शायरी में बस तारीफ तुम्हारी, लिखा था दूसरे ही पन्ने में, इंतज़ार था मुलाकात का तुमको भी हमारी। हुई थी ख्वाहिश मुकम्मल फिर, 12वें दिन दूसरी मुलाकात से, महसूस किया था मैने भी, मुस्कुराई थी तुम भी उस दिन दिल से। फिर न जाने कब खास हो गए हम, हम जैसे किसी अजनबी से, लिखा था तुमने ये भी, पास हो अधिक तुम मेरी दिल में धड़कन से। वो बारिश का दिन था याद है, वादा मुलाकात का था तेरा भी, तूफान भी था भारी आज, साथ फिर थी चमकती बिजली भी...

फिर वो फरवरी नहीं आई

पहली मुलाकात का वो गुलाब याद आता है, तुझे दिया वो मेरा प्रीत वाला कार्ड याद है। तुम कितनी खूबसूरत हो कहा था मैने याद है मुझे, तेरी वो खूबसूरत दबे होठों की मुस्कान याद है मुझे। वो आखिरी बेंच स्कूल का, वो तीसरी पंक्ति में तुम थी, वो पांचवीं घंटी स्कूल की, वो बेरुखी भरी निगाहें तब थी। वो 30 में से 27 मिनट देखना तुम्हें, वो गुस्साई नाक याद है, फिर तेरा थोड़ा सकुचा के देखना और वो सुकून याद है। वो पहली बार तुम्हारा मुझे देखकर मुस्कुराना, वो सहेलियों संग फिर नजरअंदाज कर चले जाना, इक पल को तो बस ऐसा लगा जैसे सब सिमट गया है फिर दूर जाकर तेरा वो पलटकर देखना आज भी याद है। एक सप्ताह बाद की वो मुलाकात थोड़ी असहज तो थी, लेकिन खूबसूरत इतनी की जैसे कब से अधूरी सी थी। पहली मुलाकात की खाली क्लास आज भी याद आती है, तेरे गाल की वो लाली और पहली बार की वो छुवन याद आती है। पहले दोस्त और फिर अनकही वो मोहब्बत खूबसूरत थी, वो स्कूल जाने की ललक और तुझसे मिलने की चहक खूबसूरत थी। न जाने फिर कब वो आखिरी और तीसरी बेंच एक हो गई, संग तेरे फिर मेरी अकाउंटस भी जैसे केमिस्ट्री हो गई। तेरे संग समय बिताने की अब तो बस वजह तला...

मेरा उससे मिलना तन्हाई में..

कुछ पल जो मैं बैठा तन्हाई में, तुम आ गई ख्यालों में, थोड़ी सी शर्माई तुम और थोड़ी सी थी तुम मुस्कायी। इक पल तो बस ऐसा लगा तुम हो पास मेरे बैठे प्रिये, फिर दूजे ही पल जैसे मुझे अपनी फिर सुध आयी। देखा मैने इधर उधर, ढूंढा तुझे फिर किधर किधर, बस एक अकेला था मै, और तन्हाई थी फैली तब। फिर आया एक ख्याल मन में, तुझको भी लेकर। सपनों में है आती जो हकीकत में मिलेगी जाने कब। तेरा वो मुस्काता चेहरा, तेरी वो शर्माती आँखें, तेरी वो बातें अलबेली, तेरी वो गुस्साई आंखे। तेरी वो बेपरवाही संग, तेरी वो जल्दी बाजी। तेरा वो बिछड़न का डर, तेरी वो भीगी आंखे।  तनहाई तो तनहाई है, कुछ भी याद दिलाती है, भूले बिसरे ज़ख्मों को, अक्सर ही ताजा कर जाती है। जितना चाहो रहना दूर, यादें तो याद आ जाती हैं, तनहाई कहने को है बस, असल में तो तुझसे मिलाती है। माना तनहाई थोड़ी खराब है, लेकिन खुद से मिलने का मौका है, भूले बिसरे लम्हों को, फिर से जीने का एक सलीका है। अगर सीख लो तुम तनहाई में, खुद ही खुद से मिलना, तो फिर उससे बेहतर नहीं लगेगा, जीवन तुमको जीना। Pari ✍️ 

Pari की कल्पना (परिकल्पना)

यूहीं तो होती नहीं होगी बरसात सावन में, किसी कहानी में इसका भी कोई किस्सा होगा। भरी आंखों से नीर बहते होंगे आसमां के शायद, टूटा जब दिल कोई उसका हिस्सा होगा.. मैं कहूं कि तुम पहली हो, तो ये झूठ हो भी सकता है, लेकिन तुम्हारे बाद अब कोई और हो नहीं सकता। तुमसे है मोहब्बत इतनी मेरी जान अगर यकीं मानो तो, तुम्हारे बाद और कोई मेरी मोहब्बत पा नहीं सकता। बताओ ताउम्र उसके एक शब्द के लिए तरसता रहा, कि कहे क्यों फिक्र करते हो तुम पूरी दुनिया की .. मैं हूं ना तुम्हारे साथ क्यों फ़िक्र तुम्हें किसी और की जब मेरा साथ और एहसास है तुम्हारे पास... हर एक बार निराली है, हर मुलाकात निराली है, जब जब मिला तुमसे, एक एक मुलाकात निराली है। बातों से तुम सहज भले, लहजा तेरा कुछ और ही है, चेहरा तेरा फूल सा कोई, निगाहों की झलक कुछ ही है। Pari✍️ 

प्रेयसी या हो तुम पत्नी या फिर दोनों.?

प्रेम की है अनुभूति अटल, प्रेम है जिसका संपूर्ण निश्छल, पत्नी है वो या प्रेयसी बताओ, बहता है जिसका प्रेम अविरल। मानव जीवन का अनूठा वो संगम, करती आहें उसकी कलकल, स्वयं तो है जैसे ठहरी वो, पर बहता है प्रेम उसका जैसे कोई जल।। प्रथम चुंबन हो उसका चाहे, या हो प्रथम उसका आलिंगन, ठहरा है मेरा तो प्रतिपल, न जाने क्यों उसपर ये मन। आभास हो उसके होठों का या उसका वो कोमल सा बदन, एहसास है मुझको आज भी लेकिन, उसका वो सादा भोलापन। आंखों की वो सकुचाहट और होठों की भीनी मुस्कान, बारिश की वो मोटी बूंदे और उसमें उसका वो सूखापन। आंखों में शर्म थी उसके और बदन में थी कोई जैसे सिकुड़न, रह गया था देखते ही उसको, आ गया था उसपर मेरा मन। प्रेम का वो आभास था पहला, पहली हो जैसे सावन की बारिश, भीनी भीनी बूंदे वो ऐसी, जैसे की हो मैने कोई ख्वाइश। क्या था वो मै समझ न पाया, प्रेम था उसका या मेरी आजमाइश, जो भी था जैसा भी था, लेकिन पूर्ण हुई मेरी एक ख्वाइश। अलग ही थी वो अनुभूति उसकी, अलग ही था वो अपनापन, अलग नशा था उसका मुझको, अलग ही था वो मेरा लड़कपन। कौन थी वो कहां से थी आई, जैसे भेजी हो कोई पारियों की रानी, एक बार तो सोच...

एक दोस्त बड़ी निराली है...!

थोड़ी नटखट थोड़ी भोली भाली सी, एक दोस्त है मेरी बड़ी निराली सी। अक्सर वो मुझसे मिलती है मन की अपने सब कहती है थोड़ा है गुस्सैल भले, लेकिन मुस्कान भी उसकी प्यारी है। एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। अभी मिला हूं उससे, बस कुछ दिन का है साथ हमारा, फिर भी ऐसे मिलती है जैसे सालों का हो कोई नाता प्यारा। व्यवहार उसका बड़ा सादा है, जैसे है वैसे दिखती है, मस्त मौला है उसका मन, खुलकर वो जीवन जीती है एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। कभी सताती, कभी बताती, कभी वो गुमसुम सी हो जाती। फिक्र है करती न जाने किसकी, लेकिन चेहरे को शांत है रखती। इधर उधर की नहीं है करती, लेकिन खबर वो सबकी है रखती, स्वाद है उसकी बातों में, करती बातें वो मतवाली है, एक दोस्त मेरी बड़ी निराली है। एहसास है उसको जिम्मेदारी का, रिश्तो में रखती है तालमेल, किससे कैसे रहना है, कौन है कैसा, जानती दुनिया के है सारे खेल। अंदर बाहर का समन्वय, रखती सब जग से है पूरा मेल, गोरे रंग का उसे भ्रम नहीं, स्वयं रंग में थोड़ी काली है। मेरी एक दोस्त बड़ी निराली है। Pari✍️

गलती हर बार मेरी ही

क्यूं भला मैं बदला सा दिख रहा, क्यों मेरा मिजाज बिगड़ा, सवाल था उसका फिर वही, काश उसने पूछा होता खुद से कभी। मैं दुनिया से लड़कर भी उसी का था, वो एक खुद से भी न लड़ सकी, फिर भी मैं गलत मेरी गलती, वो तो बस मासूम ही रही तब भी। मैं जितना पास जाने की कोशिश करूं, वो दूर दूर हो जाती है, मेरी चाहत को वो न जाने, क्यों खुद से ही ठुकराती है। आज मोहब्बत है उससे मेरी, वो दूरी बनाने लगी है न जाने क्यों, मैं बदल गया अगर तो, फिर सवाल होगा कि तुम ऐसे क्यों। यकीनन मर्द ही गलत होता है, ऐसा नज़रिया है जमाने भर का, लेकिन ख्वाइश तो होती है, कुछ तो अधिकार होंगे न उसके भी। बस बहाने बना वो अलग हो जाते हैं और दोष फिर वही हम पाते हैं, शायद हम भी गलत हों, क्योंकि स्वयं के अधिकार की बात करते हैं। ए मर्द तेरी कोई औकात नहीं है, तू बस पिसने को मात्र आया है, तू निभाता रह फर्ज अपने, और खो जाना फिर कहीं जहां में। तेरी चाहत बस दबी रहेगी, तू बस पिसते ही रहना चक्की में, और फिर हो जाना गुम ढूंढ कोई बिल दुनिया की मस्ती में।। Pari✍️