मौका परस्त लोग जहाँ के
मानवता का अंत नहीं तो और क्या हो सकता है मौतों की मंडी में भी क्या पैसों का व्यापार चलता है। मजबूरी में पड़े है मानव आज इस महामारी में, कुछ बहसी लगें है आज भी दलाली की तैयारी में।। फर्क नहीं पड़ता कि कोई मरता है या फिर जीता है, 10 रुपये का मास्क भी यहाँ 300 में बिकता है। जोड़ लिये है ढेरों पैसे, लाशों की तुमने दलाली में, लेकिन याद रखो जेब नहीं होती कफ़न की सिलाई में। कहीं ऑक्सीजन, कहीं एम्बुलैंस, कहीं बिस्तर बिक रहे, गरीबी की मार में कहीं लोग सड़कों में भी मर हैं रहे। आज का दिन कट गया, कल क्या मंज़र होगा पता नहीं, आशाओं के दीप जल रहे, जीवन दीपक का पता नहीं।। मेरी भी अभिलाषा है कि मेरा भी प्रयास बना रहे, मुश्किल की इस घड़ी में हर धरतीवासी टिका रहे। क्या अमीर क्या गरीब, मुश्किल घड़ी नहीं जानती है, इंसानियत बनी रहे बस, मुसिबत तो आती जाती है।। ©®Pari✍️