बेजान हूँ तुम बिन
बामुश्किल से मुस्कुराने की कोशिश करता हूँ,
कुछ पलों के लिये खुश होने की कोशिश करता हूँ।
आता है वही दौर अश्रुओं का फिर लौटकर,
दिलाने मुझे मेरी किश्मत का गम याद फिर से।
कोशिश तो बहुत की हर किसी का खास होने की,
दबाकर हर गम अपना साथ सबके मुस्कुराने की।
लेकिन मैं भी लड़ता कब तक अपने नसीब से,
मांगकर जो लाया था ज़िन्दगी सिर्फ रुलाने की।।
सब रिस्तों को मैं अकेला तवज्जो देता रहा बस,
सबके होठों पर मुस्कुराहट लाने को लड़ता रहा बस।
मेरा अपना वजूद मिट गया, मैं बिसरा सा दिया गया,
जैसे मूरत हूँ मैं भी कोई बनी पुराने पाषाण की।।
मेरा गर्व मेरा अहम था जो वो भी रुठ गया,
मेरी मुस्कुराहट ही मुझे आँशु थमा गयी अब तो,
अब तो बिन एहसास जैसे बेजान हो गया हूँ,
जान है शरीर में लेकिन भावनाओं से बेजान हूँ।।
Pari
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