देवभूमी से प्रेम अतुल्य
देवभूमी के वासी हम, देवभूमी में रहते हैं,
सीमित साधनों में भी जीवन जी लेते हैं।
दुनिया की दौड़ धूप से दूर यहाँ,
भोजन में कन्द मूल भी चख लेते हैं।
साहस अतुल्य है जन जन में,
चुटकी में नदी पहाड़ चढ़ लेते हैं।
रिस्तों की कद्र हैं करते हम सब,
प्रेम में जीवन तक अर्पण कर देते हैं...
खुश्बू अलग है इस माटी की,
देशप्रेम कण कण में बसता है।
कहने की जरूरत नहीं पड़ती,
हर दूसरा लाल देश पे मरता है।।
अक्सर मुझसे यार मेरे पूछ लेते हैं,
देवभूमी की चाहत क्यों है कहते हैं।
मैं तो बस इतना सा कह सकता हूँ,
देवभूमी में ही तो जीवन को मैं पाता हूँ।।
Pari
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