देवभूमी मा बणु की आग

सभी छोड्यू मा हुयीं आग आग, डांडा काठां सारी धार,
किलै हुयूँ च यू धुँआरोल, जंगलों में लगणि आग किलै बार बार।
क्वी त बताओ मि भी दिदो, किलै कना तुम यू घपरोल,
जीव जन्तु, प्राकृतिक संपदा अर जन मानस फर लगणु जोल।

किलै हुयां अपणा ही बैरी, किलै अपड़ा हतुन आग छा लगाणा,
जंगलु मा आग लगै रोज रोज, किलै बणु थै मिटाणा।
नि मिलणी क्वी खुशी तुमथै, नि हूणी क्वी आस गाणी,
सुख संपदा मिटी जाली, सुखी जालु पहाड़ कु पाणि।

सोचा जरा भलु कै दिदो, क्या होलु जब बण नि राला,
नौना नौनी तुमरा तब, कख बटी कि खुशहाल राला।
मिटी जाली पछ्यांण हमरी, दुनिया वला ठठा लगाला,
चेति जावा अभी भी दिदो, तब सुपन्यो म ही बण राला।

पौड़ी हो या अल्मोड़ा दिदो, सर्या गढ़वाल बटी कुमों तक,
फुकेणा छिन बण हमरा, चेता नि क्या तुम अभी तलक।
आबो हवा अर पाणि अब त, हूण लग्युं सब प्रदूषित,
कनु कै आलु क्वी यख तब, कनु कै होलु हमरू राज्य बिकसित
pari

© ® Pari....

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