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हकीकत बस यही थी....

होंठों पर मुस्कान रखी है, दिल का दर्द छुपा रहा हूँ, खामोशियां सजों रखी है, बस इंतज़ार कर रहा हूँ। यकीनन मेरी कोई बात, सुनी नहीं जायेगी जानता हूँ, बस इसी बात को लेकर, सब सुनते ही जा रहा हूँ। कितनी भी कोशिशें कर लूं, पर तुझे इल्म नहीं होगा, चाहे कोई भी गवाही दे दे, तुझे विश्वास नहीं होगा। सब कुछ जानकर भी मैं, तुझसे अनजान सा बना हूँ, न तुझे कद्र थी न होगी, फिर भी आस किये जा रहा हूँ। हर लम्हा बस बीत रहा है, ख्वाइशें सारी दफन हो चली, कभी थी मुझे भी तमन्ना कोई, सब जैसे स्वाहा हो चली। अब न कोई उम्मीद है, न दिल पर कोई असर होता है, न कोई खुशी अब हंसाती है, न कोई गम अब रुलाता है।। बेशक जहाँ में सब किराएदार है, फिर भी लगाव हो गया था, छोड़कर जाओगे मालूम था, फिर भी तुझसे प्यार हो गया था। तूने तो मुझे कराया था एहसास, कि अनजान है हम तेरे लिये, मैं ही नासमझ निकला, जो उम्मीद लगाये बैठा रहा तेरे लिये।। Pari

दुनिया की नजर से

 जरा सी कोमलता क्या अपना ली, वजूद ही खतरे में आने लगा.. मैंने जो जाना सबको अपना सा.. अपनो को भी मैं पराया सा लगने लगा मेरी खामोशियों को कमजोरी समझने लगे, वक्त बेवक्त अब तो सब मुझे आजमाने लगे। मेरी अच्छाइयां-सच्चाइयां सबको चुभने लगी, मेरी सुलझी-मीठी बात भी सबको कड़वी ही लगी।। मैंने जो किया सब कुछ न्योछावर सरलता में, लुटा दिया अपना दिल भी यूहीं सहजता में। सब कुछ बस जैसे कोई छलावा सा हो गया, रखा था जो ख्वाब दिल में आज पराया हो गया।। मैं भी बस देख रहा हूँ दुनिया के सारे आडम्बर, चुप हूँ बेजुबान सा आज भी सब जानकर। क्यों मैं बदल जाऊं आज किसी और की नजर से, क्योंकि मिला लेता हूं नजर आईने में आज भी मैं खुद से।। pari

मेरी खवाइश, तेरी खुशी

गुमसुम सा रहने लगा हूँ, शायद कहीं खोने लगा हूँ, जिस्म से तेरे पास हूँ, शायद दिल से दूर होने लगा हूँ। मेरी हर कोशिश नाकाम रही, तेरे सबसे करीब आने की, तेरी नजरों से मैं अब शायद, बेगाना होने लगा हूँ।। तू हरदम ही मेरे लिये खास है, तुझे इसका न एहसास है, मैं हो जाऊं कितना भी दूर, तू मेरे दिल के हमेशा पास है। मैं हूँ बेचैन बिन तेरे शोना, रहता हूँ तेरे लिए बेकरार, मैं तेरे लिये कुछ नहीं लेकिन, तू मेरे जीने का है आसार।।। मैं खुद को ही कोश लूँगा, लेकिन तुझे दर्द नहीं दूँगा, पतझङ में भी झूठी ही सही, अपने लिये बहार ढूंढ लूँगा। तुझे अब न कोई मलाल होगा, तेरा पग पग जैसे बहार होगा, तुझे मिलती रहे मुस्कुराहटें, चाहे मेरा कांटों का बसेरा होगा।। हे ईश्वर तू करना कुछ ऐसा, कि उसको सब खुशी मिल जाये, करे जो वो ख्वाइश कभी, पलक झपकते ही पूरी हो जाये। वो रहे फूलों में खेलती हरपल, न कोई गम से उसका वास्ता हो, मेरी है खवाइश एक ही, जन्मभर उसी संग मेरा हर रिश्ता हो।। ©®pari

बस यूहीं ख्याल में

न जाने कौन सी वो बात है, न जाने कौन से वो जज्बात है... किताब खुली फिर भी लब्ज चुप है, न जाने कौन सी ये शब्दावली है... एक पल भी गुजरा तो क्या, एक नया पल वो भी दे गया.... मैं समझने में गलती कर बैठा. वो तो इशारे भर में बहुत कुछ कह गया... बेजुबान सा था मैं सामने उसके, वो जैसे कोई ज्वालामुखी हो.. मेरी सारी कोशिश नाकाम रही... जैसे मैं कातिल वो वकील हो... न लब्ज चाहिए कहने को, बस निगाहें सब बयां कर जाती है.. जो देख लू तुझे मैं नजर भर को.. तेरी हर बात जैसे मुझे अपनी लगती है.. जुबां कुछ कह दे तो भुलाना मुमकीन है, मेरी कलम के शब्दों को मिटाना न मुमकिन है.. मैं कह भी दूं झूठ दुनियां से शायद कभी, तुझको झूठ लिखना मेरी कलम का नामुमकिन है.. Pari

तुझसे है मोहब्ब्त

 मैं लिखता रहा तुझे, जैसे कोई खिलता गुलाब, लेकिन पल पल लाती रही, तुम जीवन मे सैलाब। मैं करता रहता था तेरा इंतज़ार उसी मोड़ पर, तुम हरपल ही बदला करती थी, राह अपनी जनाब।। याद मुझे आज भी, रखे तेरे वो किताबों में गुलाब, रात रात भर जगना और खुली आँखों के वो ख्वाब। तेरी चाल निराली थी, होठों की वो भोली मुस्कान, हर अदा अनोखी थी और आंखें जैसे कोई शराब।। वो दिन ही थे मेरे सभी, आज मेरा न मेरा रहा, मैं हूँ खोया कहीं अब ऐसे, जैसे कोई वजूद न रहा। हरपल है अब बस तेरा, मुझमे मेरा न कुछ बाकी रहा, तू ही है मेरी रात और दिन, न कोई सूरज न चाँद अब रहा। तुझमें खोकर ही रहता हूं अब, जैसे मछली को पानी हो मिला, तेरी हर बात का है यकीं मुझे, न कोई तुझसे शिकवा और गिला। मोहब्बत में तेरी हूँ जलता दिया, बिन तेरे जैसे हो अँधेरा भरा, अब भी अगर मुझसे है तू खफा, फिर जहां में है क्या ही रखा.. Pari

कहानी अधूरी सी

एक किस्सा था जो कहानी बन न सका, अरमानों को जैसे पूरा होने का मौका न मिला। मोहब्बत बहुत थी उसको भी हमसे यकीनन, न बताने और न जताने का मौका मिल सका!! कोई दूर रहकर भी पास हो गया, न चाहकर भी ज़िन्दगी का हिस्सा हो गया। जब जब वो हुआ दूर मुझसे कभी, जैसे कस्तियों का कहीं साहिल खो गया.. कोई अपना है कहीं दूर किसी शहर में, ख्वाबों में आता है वो सुबह दोपहर में, हर किसी के नसीब में उस जैसा नहीं होता, वो तो मिलता है किसी किसी को ईश्वर की मेहर में... ©®Pari

रिश्ते निभा रहा हूँ...!!!

न जाने क्यों आज भी, खामोश ही जी रहा हूँ, हर आँसूं को बस यूहीं पिये जा रहा हूँ। इस सबको मेरी मजबूरी मत जान लेना, मैं तो बस खामोश, रिश्तों को निभा रहा हूँ।। घुटन है साँसों में, रिश्ते-नाते टूट रहें हैं अहम की लड़ाई में, अपने छूट रहे हैं। फिर भी कोशिश सबको जोड़ने की कर रहा हूँ, मैं तो बस खामोश, रिश्तों को निभा रहा हूँ।। मेरी ख्वाईश मेरे सपनों की कोई कीमत नहीं अब, मेरा वजूद भी बस कहने भर को है अब। औरों की खुशी में बस अब खुशी ढूंढ़ रहा हूँ, मैं तो बस खामोश, रिश्तों को निभा रहा हूँ।। कट ही जायेगी ये जिंदगी अब यूहीं, ख्वाइशों को अपनी अब विराम दे रहा हूँ, कैसे बयाँ करूँ दिल की बेबसी को, मैं तो कांटों में भी बस मुस्कुरा रहा हूँ।। ज़िन्दा हूँ जब तक, ज़िम्मेदारी निभा रहा हूँ हर इल्जाम खामोशी से सहे जा रहा हूँ, जिन्दगी की कड़वाहट थोड़ी कम हो जाये, इसी कोशिश में आज भी गुड़ खा रहा हूँ।। अब मत कहना ये मैं क्या कर रहा हूँ, मैं तो बस खामोश, रिश्तों को निभा रहा हूँ।। Pari