तुझसे है मोहब्ब्त

 मैं लिखता रहा तुझे, जैसे कोई खिलता गुलाब,

लेकिन पल पल लाती रही, तुम जीवन मे सैलाब।

मैं करता रहता था तेरा इंतज़ार उसी मोड़ पर,

तुम हरपल ही बदला करती थी, राह अपनी जनाब।।


याद मुझे आज भी, रखे तेरे वो किताबों में गुलाब,

रात रात भर जगना और खुली आँखों के वो ख्वाब।

तेरी चाल निराली थी, होठों की वो भोली मुस्कान,

हर अदा अनोखी थी और आंखें जैसे कोई शराब।।


वो दिन ही थे मेरे सभी, आज मेरा न मेरा रहा,

मैं हूँ खोया कहीं अब ऐसे, जैसे कोई वजूद न रहा।

हरपल है अब बस तेरा, मुझमे मेरा न कुछ बाकी रहा,

तू ही है मेरी रात और दिन, न कोई सूरज न चाँद अब रहा।


तुझमें खोकर ही रहता हूं अब, जैसे मछली को पानी हो मिला,

तेरी हर बात का है यकीं मुझे, न कोई तुझसे शिकवा और गिला।

मोहब्बत में तेरी हूँ जलता दिया, बिन तेरे जैसे हो अँधेरा भरा,

अब भी अगर मुझसे है तू खफा, फिर जहां में है क्या ही रखा..

Pari



Comments

Popular posts from this blog

कुछ कल्पनाओं के शहर

पहाड़ और पहाड़ी बचाओ

व्यथा आज पहाड़ की