दुनिया की नजर से

 जरा सी कोमलता क्या अपना ली,

वजूद ही खतरे में आने लगा..

मैंने जो जाना सबको अपना सा..

अपनो को भी मैं पराया सा लगने लगा


मेरी खामोशियों को कमजोरी समझने लगे,

वक्त बेवक्त अब तो सब मुझे आजमाने लगे।

मेरी अच्छाइयां-सच्चाइयां सबको चुभने लगी,

मेरी सुलझी-मीठी बात भी सबको कड़वी ही लगी।।


मैंने जो किया सब कुछ न्योछावर सरलता में,

लुटा दिया अपना दिल भी यूहीं सहजता में।

सब कुछ बस जैसे कोई छलावा सा हो गया,

रखा था जो ख्वाब दिल में आज पराया हो गया।।


मैं भी बस देख रहा हूँ दुनिया के सारे आडम्बर,

चुप हूँ बेजुबान सा आज भी सब जानकर।

क्यों मैं बदल जाऊं आज किसी और की नजर से,

क्योंकि मिला लेता हूं नजर आईने में आज भी मैं खुद से।।

pari

Comments

Popular posts from this blog

कुछ कल्पनाओं के शहर

पहाड़ और पहाड़ी बचाओ

व्यथा आज पहाड़ की