एक संकल्प, नयी भोर की ओर

राह भटक कर देख लिया, गाँव छोड़ कर देख लिया,
माँ बाप छोड़ कर शहर चला, घर बार छोड़ कर देख लिया।
नाम कमाने मैं निकल पड़ा था, रात में नींद दिन का चैन छोड़ दिया,
आज बरसों बाद एहसास हुआ है, इतना सब छोड़ मैंने क्या पा लिया।।

किराये के कमरे में रहता हूँ, परिवार का चेहरा देखने को तरसता हूँ,
कभी खाना खाता हूं यहाँ, तो कभी भूखे ही काम पर जाता हूँ।
न पड़ोसी मुझे जानता है आज भी, न मैं अपनी दिनचर्या से खुश रहता हूँ,
सोचा था जो बरसों पहले बड़ी समझ से, आज खुद की गलती पर रोता हूँ।।

न होली मनती अपनो संग आज, न दीवाली पर दीप जलते हैं,
आज रहकर सबसे दूर यारो, रिस्ते भी बस मतलव पर चलते हैं।
जन्म हो या भले मृत्यु किसी की, सुखदुःख साझा करने का वक्त नही,
रिश्तों में रह गया आज बस दिखावा, कोई जिये मरे आज किसी को फर्क नहीं।।

निकल पड़े आज सभी एक साथ, शुरू हो रखी सबमें एक दौड़ नयी,
कहने को सब दौड़ते साथ साथ, लेकिन एक दूसरे की तनिक भी फिक्र नही।
जीना छोड़ दिया हँसना-रोना छोड़ दिया, खुद को मशीन जैसा बना लिया,
शायद आज यही वो वजह है दोस्तो, जो कहती है यार मेरे पास वक्त नही।।

आज एक सोच, एक समझ है आयी, जब वक्त नही आज भी फिर क्या हुयी कमायी,
कल पापा दूर थे मुझसे आज मैं हूँ, कल फिर शायद परिवार में कोई और होगा,
फिर इतनी दौड़ भाग करके भी, मैंने कौन सा समय को है बदला,
कल भी मैं दूर था सबसे फिर, आज ऐसा मैंने बरसों में क्या है बदला।।

लेकिन आज फिर एक समझ बदली है, कोशिश करना आप भी बदलोगे,
मुझे आज समझ आयी है, शायद आपकी अगली पीढ़ी समझेगी।
अपनी जड़ें छोड़कर पेड़ भला, कितने दिन तक हरा भरा है रह पाया,
हमने भी सिर्फ खोया है, छोड़ जड़ो को अपनी सुख चैन को भी गवाया।।

करता हूँ आज फिर सबका आवाहन, चलो लौट चलो फिर अपनो संग,
करते है शुरुवात समय से, चलो लौट चलते है सच्ची ज़िंदगी संग।
छोड़ शहरों की झूठी शान आज, मुख मोड़ लो अपने गाँव की ओर,
कह दो झूठी पहचान को टा-टा, और लौट चलते है नयी भोर की ओर।।
Pari

© ® Pari....

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