मैं और मेरी संस्कृति, बचाओ
जय भैरवनाथ जय बद्री बिशाल
जैसा कि अक्सर होता है कि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जी रहे होते हैं और कुछ सहज असहज घटनाएं हमारे आसपास होती है, उसमें से ज्यादातर पर हम ध्यान तक नही देते और आगे बढ़ जाते है... शायद वो ज्यादातर घटनाएं हमारी व्यक्तिगत जीवन पर असर नही डालती इसलिए हम उसपर ध्यान नही देते और आगे बढ़ जाते हैं..
आज सुबह ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ भी, लेकिन आदत से मजबूर मैंने कलम उठायी और लिखने लगा..हुआ यूं कि मैं रोज की तरह नौकरी से लौट रहा था और अक्सर मन्दिर या फिर घरों में भजन का शोर आता सुनाई देता है जो कि शायद लोगो को अच्छी अनुभूति करवाता है और साथ ही उनका भगवान के प्रति कर्तव्य पूरा होता है यह सोच होती होगी.. जैसा कि मैंने बताया मैं रोज की तरह नौकरी से सुबह लौट रहा था और आज मैंने रोजवाला नही बल्कि दूसरा रास्ता लिया कमरे में आने के लिए, और मेरे कानों में एक घर जो गढ़वाली परिवार "भंडारी जी" का है से आवाज सुनाई दी, लेकिन ये क्या ये भजन नही थे उसकी जगह एक गढ़वाली गीत गढरत्न श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जी का था और उसे सुन मैं जरा रूक गया..गीत के बोल चल रहे थे "कखन दयखण लठ्याला तीन जन्मभूमि या फीर"...और मेरे मन मे आया कि जिस तरह हम पलायान को विकास मान बैठे हैं, उसके चलते निश्चित ही हमारी आने वाली पीढ़ी अपने गाँव देवभूमी से अलग हो चुकी होगी और उसे अपना पैतृक गांव जो उसके पूर्वजों ने बहुत ही मेहनत और प्रेम से बसाया था उनका अस्तित्व खत्म हो जाएगा और हमारी आने वाली पीढ़ी की पहचान खो चुकी होगी और जैसा कि कहते है समय का पहिया होता है, तो वो घूमेगा तो जरूर लेकिन जब वो अपनी पुरानी अवस्था मे आएगा तो जहां आज भरे पूरे परिवार है वहाँ सिर्फ खण्डर और उजडापन होगा....मेरा अनुरोध है कि अभी भी बहुत देर नही हुयी है अगर हम आज एक कदम आगे बढ़े और स्वरोजगार एवं आपसी सहयोग से आगे बढ़े तो पहाड और हमारी संस्कृति सदैव के लिये हरीभरी रहेगी एवम न हमारे पूर्वज और न हमारी आने वाली पीढ़ी की पहचान खोयेगी..
धन्यबाद
Pari
🙏🏻🙏🏻
Love is life......Love is god....Love is everything
जैसा कि अक्सर होता है कि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जी रहे होते हैं और कुछ सहज असहज घटनाएं हमारे आसपास होती है, उसमें से ज्यादातर पर हम ध्यान तक नही देते और आगे बढ़ जाते है... शायद वो ज्यादातर घटनाएं हमारी व्यक्तिगत जीवन पर असर नही डालती इसलिए हम उसपर ध्यान नही देते और आगे बढ़ जाते हैं..
आज सुबह ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ भी, लेकिन आदत से मजबूर मैंने कलम उठायी और लिखने लगा..हुआ यूं कि मैं रोज की तरह नौकरी से लौट रहा था और अक्सर मन्दिर या फिर घरों में भजन का शोर आता सुनाई देता है जो कि शायद लोगो को अच्छी अनुभूति करवाता है और साथ ही उनका भगवान के प्रति कर्तव्य पूरा होता है यह सोच होती होगी.. जैसा कि मैंने बताया मैं रोज की तरह नौकरी से सुबह लौट रहा था और आज मैंने रोजवाला नही बल्कि दूसरा रास्ता लिया कमरे में आने के लिए, और मेरे कानों में एक घर जो गढ़वाली परिवार "भंडारी जी" का है से आवाज सुनाई दी, लेकिन ये क्या ये भजन नही थे उसकी जगह एक गढ़वाली गीत गढरत्न श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जी का था और उसे सुन मैं जरा रूक गया..गीत के बोल चल रहे थे "कखन दयखण लठ्याला तीन जन्मभूमि या फीर"...और मेरे मन मे आया कि जिस तरह हम पलायान को विकास मान बैठे हैं, उसके चलते निश्चित ही हमारी आने वाली पीढ़ी अपने गाँव देवभूमी से अलग हो चुकी होगी और उसे अपना पैतृक गांव जो उसके पूर्वजों ने बहुत ही मेहनत और प्रेम से बसाया था उनका अस्तित्व खत्म हो जाएगा और हमारी आने वाली पीढ़ी की पहचान खो चुकी होगी और जैसा कि कहते है समय का पहिया होता है, तो वो घूमेगा तो जरूर लेकिन जब वो अपनी पुरानी अवस्था मे आएगा तो जहां आज भरे पूरे परिवार है वहाँ सिर्फ खण्डर और उजडापन होगा....मेरा अनुरोध है कि अभी भी बहुत देर नही हुयी है अगर हम आज एक कदम आगे बढ़े और स्वरोजगार एवं आपसी सहयोग से आगे बढ़े तो पहाड और हमारी संस्कृति सदैव के लिये हरीभरी रहेगी एवम न हमारे पूर्वज और न हमारी आने वाली पीढ़ी की पहचान खोयेगी..
धन्यबाद
Pari
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© ® Pari....
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